News Strike : दलित और अल्पसंख्यक इंजीनियरिंग से सत्ता तक पहुंचे थलापति विजय! मप्र का रुख करेंगे तो कांग्रेस-बीजेपी का क्या होगा ?
Harish Divekar | May 07, 2026, 07:00 IST
Photograph: (the sootr)
तमिलनाडु के सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी पार्टी TVK के साथ विधानसभा चुनावों में बंपर जीत हासिल की है। उनके इस चुनावी दांव ने कांग्रेस और बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। क्या विजय मध्य प्रदेश में दलित वोटों का समीकरण बदल देंगे?
News Strike.
आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए, तो बात बिगड़ जाए..
हां... हां.. मैं जानता हूं कि गाने में बात बन जाए है... और, मैं कह रहा हूं कि बात बिगड़ जाए। पर आप... आप जैसा कोई पर फोकस कीजिए। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही नहीं चाहती हैं कि आप यानी कि आम आदमी पार्टी जैसा कोई दोबारा सत्ता में एंट्री करे और उनके लिए खतरा बन जाए। लेकिन अब थलापति विजय ने उनका ये खतरा बढ़ा दिया है। थलापति विजय की पार्टी ने भी पॉलिटिक्स में वैसी ही जीत के साथ एंट्री ली है, जैसी जीत के साथ कई साल पहले अरविंद केजरीवाल सत्ता में आए थे। खास बात ये है कि दलित सीटों पर भी विजय को बड़ी जीत मिली है। ऐसे में अगर विजय पैन इंडिया पार्टी बनने की कोशिश करते हैं और मप्र में आते हैं तो क्या दलित सीटों का समीकरण गड़बड़ा नहीं देंगे।
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थलापति विजय और उनकी पार्टी टीवीके की जीत के चर्चे हर तरफ है। थलापति बन कर विजय ने जिस तरह फिल्मों पर राज किया। अब वैसे ही तमिलनाडु की राजनीति पर राज करने को तैयार हैं। उनके बारे में आपने बहुत कुछ पढ़ और सुन भी लिया होगा। उनकी नेटवर्थ, उनकी फैमिली और उनकी लव लाइफ सब कुछ। आप कुछ अगर नहीं जानते होंगे तो वो ये कि थलापति विजय पॉलिटिक्स में अरविंद केजरीवाल का इतिहास दोहरा रहे हैं। उस पर लंबी चर्चा से पहले आपको अरविंद केजरीवाल का इतिहास चंद सेकंड में याद दिला देता हूं।
अरविंद केजरीवाल साल 2013 में पहली बार दिल्ली का चुनाव जीते। लेकिन उनके पास मेजोरिटी से कुछ कम सीटें थीं। इसलिए कांग्रेस के साथ मजबूरन सरकार बनाई। लेकिन फिर खुद ही 49 दिनों बाद सरकार से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दिल्ली में दोबारा चुनाव हुए और केजरीवाल फुल मेजोरिटी के साथ सत्ता में पहुंचे। एक बार आप पार्टी दिल्ली क्या काबिज हुई। उसके कदम थमे नहीं। दिल्ली के बाद पंजाब में भी आप की सरकार बनी। इसके अलावा कुछ प्रदेशों में विधायक और सांसद भी बने।
आप के परफोर्मेंस को देखकर ये भी कहा जाने लगा कि जो लोग बीजेपी से ऊब रहे हैं वो कांग्रेस की जगह अब आप को चुन रहे हैं। कांग्रेस को तो ये डर था ही कि आप उसके वोटर्स छीन रही है। ये डर बीजेपी को भी सताने लगा। यानी आम आदमी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए खतरा बन चुकी थी। इसके बाद कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए कि आम आदमी पार्टी का दिल्ली से सफाया हो गया। हाल ही में पार्टी के चंद सांसद बीजेपी का हिस्सा बन चुके हैं। और अगर मैं ये कहूं कि आम आदमी पार्टी अपने सबसे बुरे और कमजोर दौर से गुजर रही है तो भी कुछ गलत नहीं होगा।
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आम आदमी पार्टी के कमजोर होने से बीजेपी और कांग्रेस ने राहत की सांस जरूर ली होगी। लेकिन ये राहत ज्यादा दिन नहीं चल सकी। क्योंकि अब सुपरस्टार थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वैट्री कजगम की बंपर जीत ने सियासी हलकों में फिर वैसी हलचल मचा दी है, जैसी आम आदमी पार्टी ने 2013 में दिल्ली में मचाई थी। ये भी संयोग है कि आप की पहली सरकार भी कांग्रेस के समर्थन से बनी थी, और टीवीके को भी कांग्रेस ने समर्थन देने की पेशकश कर दी है। अब इन इत्तेफाकों से इतर बात करते हैं।
जैसा मैंने कहा कि अभी तो विजय की पार्टी की तमिलनाडु से शुरुआत है। आने वाले दिनों में क्या पता विजय पैन इंडिया मूवीज की तरह पैन इंडिया पार्टी बनने का मन बना ले और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों का रुख करे, तब क्या होगा। ये बात मैं बस यूं ही नहीं कर रहा हूं। सोशल मीडिया पर थलापति विजय के लिए जो ट्रेंड चल रहा है उसे देखकर आप भी शायद यही सोचेंगे।
इसके लिए आपको चंद ट्वीट दिखाता हूं. ट्विटर पर संदीप चौधरी कॉमेंट्री, वॉइस ऑफ बहुजन और द इक्वेलिटी जैसे ट्विटर हैंडल्स से एक ट्वीट हुआ है। ट्वीट का मजमून तकरीबन सेम है। जिसमें लिखा है कि भारत की कोई पार्टी सामान्य सीटों से दलितों को वोट नहीं देती। केवल आरक्षित सीटों से देती है। लेकिन टीवीके ने सामान्य सीटों से भी दलितों को उतारा और उसमें 26 या 28 जीते। ये आंकड़ा थोड़ा कंफ्यूज करने वाला है। इसलिए हमारी टीम ने सबसे पहले इसका फेक्ट चैक किया।
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थोड़ी तफ्तीश और चुनावी आंकड़ों की डीप स्टडी से ये तो क्लियर हो गया कि सामान्य सीट से दलितों की जीत का आंकड़ा एकदम सही नहीं है। हालांकि ये सच है कि विजय की पार्टी ने अनारक्षित सीटों से भी दलितों को उतारा। करीब 8 सामान्य सीट पर विजय ने दलित कैंडिडेट उतारने का एक्सपेरिमेंट किया। जिसमें उन्हें पचास फीसदी कामयाबी मिली। यानी कि उसमें से 4 जीते। इसके अलावा 44 आरक्षित सीटों में 24 पर विजय की पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है।
अल्पसंख्यक समुदाय ने भी टीवीके को अच्छा रिस्पॉन्स दिया है। 25 जीते हुए अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में 13 कैंडिडेट टीवीके के ही हैं। विजय खुद अल्पसंख्यक समुदाय के हैं शायद इसलिए इस तबके का साथ उन्हें आसानी से मिल गया। लेकिन दलितों ने जिस तरह टीवीके को रिस्पॉन्स दिया है। वो बीजेपी और कांग्रेस के लिए चिंता की बात हो सकता है। विजय ने न सिर्फ दलितों को टिकट दिए बल्कि 17 दलित नेताओं को जिला सचिव भी बनाया। जिससे उनका संगठन भी मजबूत हुआ.
विजय का यही एक्सपेरिमेंट बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नींद उड़ा सकता है या उड़ा भी चुका होगा। बेशक कांग्रेस अभी विजय के साथ है, लेकिन क्या यही साथ और एक्सपेरिमेंट मप्र में भी देखने को मिल सकता है। अगर दलितों का साथ पाकर विजय तमिलनाडू में जीत हासिल कर सकते हैं तो मप्र कितना दूर है। और, फिर विजय किसी भाषा या प्रदेश की सीमा में भी नहीं बंधे हैं।
उनकी पिछली कुछ फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें पैन इंडिया स्टार बनाया है। मप्र में भी उनके दीवाने उतने ही होंगे जितने रणबीर कपूर या रणवीर सिंह के होंगे। ऐसे में विजय का नाम यहां भी भीड़ खींचने के लिए काफी है। उस पर अगर वो सिर्फ दलित सीटों पर अपनी स्ट्रेटजी अपनाते हैं तो किंग मेकर बन ही सकते हैं।
अब यहां एक और सियासी समीकरण समझिए, मप्र में दलित वोटर्स की ताकत को कम नहीं माना जा सकता। मैं पहले भी बहुत बार बता चुका हूं कि करीब अस्सी सीटों पर दलित वोटर्स निर्णायक हैं। इसलिए बीजेपी ने दलितों का वोट हासिल करने के लिए पूरी ताकत झौंक दी थी। कांग्रेस भी दलित और आदिवासी वोटर्स के दम पर ही 2018 में सत्ता में वापसी कर सकी थी।
एक दौर ऐसा भी था जब यूपी से सटे इलाकों में बहुजन समाज पार्टी का दम नजर आता था, और उसके विधायक विधानसभा भी पहुंचा करते थे। और ताजा दौर में चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी प्रदेश में जोर मार रही है। मैंने आपको दामोदर यादव के बारे में भी बताया था कि कैसे वो क्राउड पुलर बनते जा रहे हैं। और बहुत आसानी से अपनी सादी सभाओं में भी भीड़ जुटा पा रहे हैं।
जब दामोदर यादव की खातिर सैकड़ों लोग आधी रात तक सभाओं में खड़े रह सकते हैं, तो फिर विजय के पास तो स्टार पावर है। वो सिर्फ तमिलनाडु के थलापति नहीं है। उन्हें मप्र के फैन्स भी थलापति ही मानते हैं। आज की तारीख में जरूर विजय का मप्र की राजनीति में प्रवेश करना एक कल्पना मात्र लग सकता है लेकिन ये नामुमकिन तो नहीं है। हो सकता है कांग्रेस ही विजय को मप्र में एंट्री दिलाए और दलित वोटर्स को फिर एकजुट करे। ऐसा हुआ तो भी विजय की पार्टी कांग्रेस पर हावी ही होगी और, बीजेपी के लिए खतरा बनेगी।
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जब तक विजय अपनी थलापति और पैन इंडिया इमेज को कैश करवा पाते हैं तब तक उनका जादू फैन्स के सिर चढ़ कर बोलेगा ही। उस पर वो खुद अल्पसंख्यक हैं। सोने पर सुहागा होने के लिए तो इतना ही काफी था। उन्होंने तो पहले चुनाव में दलित वोटर्स का दिल भी जीत लिया है। सोने पर सुहागा होने के आगे कुछ और होता तो विजय वो हो भी चुके होते।
जिस वोटबैंक की खातिर बीजेपी ने कई सौ करोड़ के इवेंट या कार्यक्रम कर डाले हैं और कांग्रेस उस वोटबैंक की खातिर संघर्षरत है। उसे विजय ने सिर्फ अपनी स्ट्रेटजी से हासिल कर लिया है। उन्हें न जाति जनगणना की जरूरत पड़ी न मोहब्बत की दुकान चलाने की जरूरत पड़ी न किसी बड़ी दलित हस्ति की जयंती मनाने की जरूरत पड़ी। सिर्फ एक सोशल इंजीनियरिंग से विजय ने राजनीति की दिशा बदलने की मिसाल पेश की है। इसी स्ट्रेटजी के साथ वो मध्यप्रदेश में आते हैं तो सियासी तस्वीर कैसी होगी। ये बीजेपी और कांग्रेस को अभी से सोचना शुरू कर देना चाहिए।
आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए, तो बात बिगड़ जाए..
हां... हां.. मैं जानता हूं कि गाने में बात बन जाए है... और, मैं कह रहा हूं कि बात बिगड़ जाए। पर आप... आप जैसा कोई पर फोकस कीजिए। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही नहीं चाहती हैं कि आप यानी कि आम आदमी पार्टी जैसा कोई दोबारा सत्ता में एंट्री करे और उनके लिए खतरा बन जाए। लेकिन अब थलापति विजय ने उनका ये खतरा बढ़ा दिया है। थलापति विजय की पार्टी ने भी पॉलिटिक्स में वैसी ही जीत के साथ एंट्री ली है, जैसी जीत के साथ कई साल पहले अरविंद केजरीवाल सत्ता में आए थे। खास बात ये है कि दलित सीटों पर भी विजय को बड़ी जीत मिली है। ऐसे में अगर विजय पैन इंडिया पार्टी बनने की कोशिश करते हैं और मप्र में आते हैं तो क्या दलित सीटों का समीकरण गड़बड़ा नहीं देंगे।
News Strike: सोशल मीडिया पर जबरदस्त एक्टिव कांग्रेस, जमीन पर गायब, क्या ऐसे लड़ेगी आदिवासी, किसानों की लड़ाई?
विजय पॉलिटिक्स में अरविंद केजरीवाल का इतिहास दोहरा रहे
अरविंद केजरीवाल साल 2013 में पहली बार दिल्ली का चुनाव जीते। लेकिन उनके पास मेजोरिटी से कुछ कम सीटें थीं। इसलिए कांग्रेस के साथ मजबूरन सरकार बनाई। लेकिन फिर खुद ही 49 दिनों बाद सरकार से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दिल्ली में दोबारा चुनाव हुए और केजरीवाल फुल मेजोरिटी के साथ सत्ता में पहुंचे। एक बार आप पार्टी दिल्ली क्या काबिज हुई। उसके कदम थमे नहीं। दिल्ली के बाद पंजाब में भी आप की सरकार बनी। इसके अलावा कुछ प्रदेशों में विधायक और सांसद भी बने।
आप के परफोर्मेंस को देखकर ये भी कहा जाने लगा कि जो लोग बीजेपी से ऊब रहे हैं वो कांग्रेस की जगह अब आप को चुन रहे हैं। कांग्रेस को तो ये डर था ही कि आप उसके वोटर्स छीन रही है। ये डर बीजेपी को भी सताने लगा। यानी आम आदमी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए खतरा बन चुकी थी। इसके बाद कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए कि आम आदमी पार्टी का दिल्ली से सफाया हो गया। हाल ही में पार्टी के चंद सांसद बीजेपी का हिस्सा बन चुके हैं। और अगर मैं ये कहूं कि आम आदमी पार्टी अपने सबसे बुरे और कमजोर दौर से गुजर रही है तो भी कुछ गलत नहीं होगा।
News strike: तीन कांग्रेसियों को प्रदेश आकर पकड़ा, जमानत के बाद भी हिरासत में रखा, फटकार पड़ी तो कहा ‘सॉरी’
भारत में कोई भी पार्टी दलितों को सामान्य सीटों से चुनाव नहीं लड़वाती है, उन्हें केवल आरक्षित सीटों पर ही टिकट दिए जाते है।
लेकिन विजय ने दलितों को सामान्य सीटों पर भी टिकट दिए और इन सीटों से दलित समुदाय के पूरे 28 विधायक निर्वाचित होकर आए है।
विजय के नायक पेरियार और आंबेडकर है। pic.twitter.com/DO1CtQP1GB
— The Equality (@TheEqualityLab) May 5, 2026
भारत में कई राजनीतिक दल दलितों को सामान्य सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देते; उन्हें केवल आरक्षित सीटों पर ही टिकट दिए जाते हैं।
TVK पार्टी ने दलितों को सामान्य सीटों पर टिकट दिए, और दलित समुदाय से 28 विधायक चुने गए। जय भीम ✊ pic.twitter.com/K14QE7C4BI
— Sandeep Chaudhary Commentary (@NewsSChaudhary) May 6, 2026
सोशल मीडिया पर ट्रेंड में थलापति विजय
जैसा मैंने कहा कि अभी तो विजय की पार्टी की तमिलनाडु से शुरुआत है। आने वाले दिनों में क्या पता विजय पैन इंडिया मूवीज की तरह पैन इंडिया पार्टी बनने का मन बना ले और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों का रुख करे, तब क्या होगा। ये बात मैं बस यूं ही नहीं कर रहा हूं। सोशल मीडिया पर थलापति विजय के लिए जो ट्रेंड चल रहा है उसे देखकर आप भी शायद यही सोचेंगे।
इसके लिए आपको चंद ट्वीट दिखाता हूं. ट्विटर पर संदीप चौधरी कॉमेंट्री, वॉइस ऑफ बहुजन और द इक्वेलिटी जैसे ट्विटर हैंडल्स से एक ट्वीट हुआ है। ट्वीट का मजमून तकरीबन सेम है। जिसमें लिखा है कि भारत की कोई पार्टी सामान्य सीटों से दलितों को वोट नहीं देती। केवल आरक्षित सीटों से देती है। लेकिन टीवीके ने सामान्य सीटों से भी दलितों को उतारा और उसमें 26 या 28 जीते। ये आंकड़ा थोड़ा कंफ्यूज करने वाला है। इसलिए हमारी टीम ने सबसे पहले इसका फेक्ट चैक किया।
News Strike: ब्राह्मण नेताओं पर निशाना, कथावाचकों की खिलाफत, कैसे दलितों का चेहरा और Gen Z का फेवरेट बन रहे दामोदर यादव!
भारत में कोई पार्टी दलितों को सामान्य सीटों से टिकट नहीं देती, केवल आरक्षित सीटों से देती है।
लेकिन TVK ने सामान्य सीटों से दलितों को टिकट दी और परिणाम, दलित समुदाय से 26 विधायक सामान्य सीटों से चुने गए! 🔥
यही असली प्रतिनिधित्व है!
जय भीम ✊ pic.twitter.com/UOWhvDBH8G
— Voice of Bahujans (@VoiceOfBahujans) May 5, 2026
सामान्य सीट से दलितों को टिकट, विजय ने बदला ट्रेंड
अल्पसंख्यक समुदाय ने भी टीवीके को अच्छा रिस्पॉन्स दिया है। 25 जीते हुए अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में 13 कैंडिडेट टीवीके के ही हैं। विजय खुद अल्पसंख्यक समुदाय के हैं शायद इसलिए इस तबके का साथ उन्हें आसानी से मिल गया। लेकिन दलितों ने जिस तरह टीवीके को रिस्पॉन्स दिया है। वो बीजेपी और कांग्रेस के लिए चिंता की बात हो सकता है। विजय ने न सिर्फ दलितों को टिकट दिए बल्कि 17 दलित नेताओं को जिला सचिव भी बनाया। जिससे उनका संगठन भी मजबूत हुआ.
मप्र में भी देखने को मिल सकता है विजय का एक्सपेरिमेंट
उनकी पिछली कुछ फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें पैन इंडिया स्टार बनाया है। मप्र में भी उनके दीवाने उतने ही होंगे जितने रणबीर कपूर या रणवीर सिंह के होंगे। ऐसे में विजय का नाम यहां भी भीड़ खींचने के लिए काफी है। उस पर अगर वो सिर्फ दलित सीटों पर अपनी स्ट्रेटजी अपनाते हैं तो किंग मेकर बन ही सकते हैं।
मप्र में दलित वोटर्स 80 सीटों पर निर्णायक
एक दौर ऐसा भी था जब यूपी से सटे इलाकों में बहुजन समाज पार्टी का दम नजर आता था, और उसके विधायक विधानसभा भी पहुंचा करते थे। और ताजा दौर में चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी प्रदेश में जोर मार रही है। मैंने आपको दामोदर यादव के बारे में भी बताया था कि कैसे वो क्राउड पुलर बनते जा रहे हैं। और बहुत आसानी से अपनी सादी सभाओं में भी भीड़ जुटा पा रहे हैं।
जब दामोदर यादव की खातिर सैकड़ों लोग आधी रात तक सभाओं में खड़े रह सकते हैं, तो फिर विजय के पास तो स्टार पावर है। वो सिर्फ तमिलनाडु के थलापति नहीं है। उन्हें मप्र के फैन्स भी थलापति ही मानते हैं। आज की तारीख में जरूर विजय का मप्र की राजनीति में प्रवेश करना एक कल्पना मात्र लग सकता है लेकिन ये नामुमकिन तो नहीं है। हो सकता है कांग्रेस ही विजय को मप्र में एंट्री दिलाए और दलित वोटर्स को फिर एकजुट करे। ऐसा हुआ तो भी विजय की पार्टी कांग्रेस पर हावी ही होगी और, बीजेपी के लिए खतरा बनेगी।
🔴 News Strike: Damodar Yadav की सभा में बढ़ती भीड़, Scindia, Mishra और Shastri पर हमला
सोशल इंजीनियरिंग से विजय ने राजनीति की दिशा बदली
जिस वोटबैंक की खातिर बीजेपी ने कई सौ करोड़ के इवेंट या कार्यक्रम कर डाले हैं और कांग्रेस उस वोटबैंक की खातिर संघर्षरत है। उसे विजय ने सिर्फ अपनी स्ट्रेटजी से हासिल कर लिया है। उन्हें न जाति जनगणना की जरूरत पड़ी न मोहब्बत की दुकान चलाने की जरूरत पड़ी न किसी बड़ी दलित हस्ति की जयंती मनाने की जरूरत पड़ी। सिर्फ एक सोशल इंजीनियरिंग से विजय ने राजनीति की दिशा बदलने की मिसाल पेश की है। इसी स्ट्रेटजी के साथ वो मध्यप्रदेश में आते हैं तो सियासी तस्वीर कैसी होगी। ये बीजेपी और कांग्रेस को अभी से सोचना शुरू कर देना चाहिए।
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