सुरों की मल्लिका आशा ताई को भाया था रायपुर का स्वाद, चीला-फरा से जुड़ा खास रिश्ता
RAIPUR : संगीत की दुनिया में अपनी अनूठी आवाज़ और बहुमुखी प्रतिभा के लिए मशहूर रहीं आशा भोंसले का छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बेहद खास और दिलचस्प रिश्ता रहा है। यह रिश्ता सिर्फ उनके यादगार स्टेज परफॉर्मेंस तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की संस्कृति, लोगों और खासतौर पर पारंपरिक व्यंजनों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। आशा ताई को छत्तीसगढ़ का मशहूर व्यंजन ‘चीला’ इतना पसंद आया कि उन्होंने इसकी सादगी और स्वाद की खुलकर तारीफ की।
छत्तीसगढ़ में लाइव कंसर्ट
रायपुर में उनके कई लाइव कॉन्सर्ट हुए। लेकिन बलबीर सिंह जुनेजा स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम आज भी शहरवासियों की यादों में ताज़ा है। उस शाम स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था और हर कोई सिर्फ एक झलक पाने और उनकी आवाज़ सुनने के लिए बेताब था। जैसे ही आशा ताई मंच पर आईं, पूरा माहौल तालियों और उत्साह से गूंज उठा।
जब सुरों के साथ गूंजा स्वाद का जिक्र
आशा भोंसले अपने संगीत के साथ-साथ अपने खान-पान के शौक के लिए भी जानी जाती थीं। देश-विदेश के व्यंजनों का स्वाद चखने वाली आशा ताई को छत्तीसगढ़ का देसी और पारंपरिक खाना बेहद पसंद आया। खासकर ‘चीला’जो चावल या दाल के घोल से बनाया जाता है, वो उनके दिल को छू गया। इसके साथ परोसा जाने वाला फरा भी उन्हें काफी पसंद आया।
बताया जाता है कि अपने प्रवास के दौरान उन्होंने इन व्यंजनों का स्वाद बड़े चाव से लिया और कहा कि सादगी में भी असली स्वाद छुपा होता है। यही वजह है कि रायपुर का यह देसी खाना उनके दिल के करीब हो गया।
स्टेडियम में गूंजे सदाबहार नगमे
रायपुर के कॉन्सर्ट में जब दर्शकों ने अपने पसंदीदा गानों की फरमाइश की, तो आशा ताई ने भी दिल खोलकर उन्हें पूरा किया। ‘दम मारो दम’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ और ‘दिल चीज़ क्या है’ जैसे सुपरहिट गीतों ने माहौल को जादुई बना दिया। हर गाने के साथ दर्शक झूम उठे और पूरा स्टेडियम सुरों की लहर में डूब गया।
1983 में भी हुआ था आयोजन
इससे पहले 1983 में भी रायपुर के कोटा स्टेडियम में उनका कार्यक्रम हुआ था, जिसने उस समय भी लोगों के दिलों में खास जगह बनाई थी। वहीं 1992 में उनकी एक और यात्रा ने इस रिश्ते को और मजबूत किया।
सादगी और संस्कृति ने जीता दिल
आशा भोंसले सिर्फ संगीत की दुनिया की ही नहीं, बल्कि संस्कृति को समझने और अपनाने वाली कलाकार भी हैं। रायपुर में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने यहां के लोगों की सरलता, आत्मीयता और मेहमाननवाज़ी की जमकर तारीफ की थी। उन्होंने स्थानीय कलाकारों और संगीत प्रेमियों से भी मुलाकात की और छत्तीसगढ़ी लोक कला के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। यही नहीं, उन्होंने शहर के मंदिरों और आध्यात्मिक स्थलों का भी दौरा किया, जो उनके आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।
रायपुर से जुड़ी मीठी यादें
आशा ताई के निधन से पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर छा गई है। लोगों की आंखें नाम हैं और वो आशा ताई के छत्तीसगढ़ प्रेम को याद कर रहे हैं। ताई की रायपुर यात्राओं की यादें यहां के लोगों के दिलों में एक बार फिर तैर गईं। उनके सुरों के साथ-साथ ‘चीला’ के प्रति उनका प्यार इस बात का प्रतीक है कि कला और संस्कृति का रिश्ता सिर्फ मंच तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह दिल और स्वाद तक भी पहुंचता है।
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