बस्तर ओलंपिक बना बदलाव का सबसे बड़ा मंच, नक्सलियों ने हथियार छोड़कर अपनाई सद्भावना की राह

The Sootr | Dec 23, 2025, 15:13 IST
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बस्तर ओलंपिक ने नक्सल प्रभावित इलाके में एक नए बदलाव की शुरुआत की है। 2025 में लाखों युवाओं ने इसमें भाग लिया, नक्सलियों ने भी हथियार छोड़कर खेल में भाग लिया।

Raipur. छत्तीसगढ़ का बस्तर लंबे समय तक ऐसे इलाके के रूप में जाना गया, जहां डर, हिंसा और अनिश्चितता रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे। नक्सली हिंसा ने न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि शिक्षा, खेल, रोजगार और सामाजिक जीवन को भी पीछे धकेल दिया। गांवों में शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था। बच्चों के सपने सीमित थे और युवाओं के सामने रास्ते कम दिखाई देते थे। विकास की बात होती थी, लेकिन वह केवल कल्पना जैसी लगती थी।

पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर बदलने लगी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने सुरक्षा के साथ सामाजिक और मानवीय पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया है। इसी सोच का सबसे मजबूत और जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है बस्तर ओलंपिक। यह आयोजन अब बस्तर के सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन चुका है।

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कठिन प्रयोग, जिसने भरोसा जीत लिया

जब वर्ष 2024 में बस्तर ओलंपिक की शुरुआत हुई थी, तब कई लोगों को संदेह था। सवाल उठ रहे थे कि क्या दशकों तक हिंसा झेल चुके इलाकों में इतना बड़ा खेल आयोजन सफल हो पाएगा। क्या गांवों से युवा निकलकर मैदान तक आएंगे। क्या खेल बंदूक की जगह ले पाएगा?

पहले ही साल इन सवालों का जवाब मिल गया। हजारों युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मैदानों में जोश दिखा और गांवों में उत्साह। यही वजह रही कि वर्ष 2024 में बस्तर ओलंपिक को एशिया के सबसे बड़े जनजातीय खेल आयोजनों में गिना गया। वर्ष 2025 में यह आयोजन और ज्यादा भव्य, व्यापक और असरदार होकर सामने आया।

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रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी ने बदली धारणा

25 अक्टूबर से शुरू हुए बस्तर ओलंपिक 2025 में लगभग 3 लाख 90 हजार खिलाड़ियों ने रजिस्ट्रेशन कराया। ब्लॉक, जिला और संभाग स्तर पर चरणबद्ध तरीके से प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। यह संख्या अपने आप में बताती है कि बस्तर के युवाओं में भरोसा और आत्मविश्वास तेजी से बढ़ा है।

यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जहां युवा अब खुद को समाज से जुड़ा महसूस कर रहे हैं। खेल ने उन्हें पहचान दी, मंच दिया और भविष्य की ओर देखने का हौसला दिया।

युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की पहल

बस्तर ओलंपिक का मकसद नक्सल प्रभावित और आदिवासी युवाओं को हिंसा व भटकाव से दूर रखना है। खेलों के जरिए युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ा गया। गांव-गांव तक यह संदेश पहुंचा कि बंदूक का रास्ता जीवन को अंधेरे में ले जाता है, जबकि खेल का रास्ता आगे बढ़ने का अवसर देता है। मैदानों में खेलते युवा यह साबित करते दिखे कि बस्तर बदलाव चाहता है। बल्ला, भाला और फुटबॉल थामे युवा उस भविष्य की तस्वीर बन गए, जिसमें हिंसा की जगह उम्मीद है।

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11 खेल विधाओं में किया प्रदर्शन

बस्तर ओलंपिक 2025 में 11 खेल विधाओं को शामिल किया गया है, इनमें एथलेटिक्स, कबड्डी, फुटबॉल, हॉकी, तीरंदाजी, वॉलीबॉल, खो-खो, बैडमिंटन, कराटे, वेटलिफ्टिंग और रस्साकशी शामिल रहीं।

इस आयोजन की खास बात यह रही कि बस्तर की पारंपरिक खेल संस्कृति को आधुनिक खेलों के साथ एक मंच पर जगह मिली। इससे स्थानीय प्रतिभाओं को राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता मिला। कई युवा पहली बार बड़े मैदान, रेफरी और तय नियमों के बीच खेले।

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महिला भागीदारी ने रचा नया इतिहास

बस्तर ओलंपिक 2025 में महिला खिलाड़ियों की भागीदारी ने खास ध्यान खींचा। कई जिलों में महिला खिलाड़ियों की संख्या पुरुषों से अधिक रही। यह बस्तर में सामाजिक बदलाव का साफ संकेत है। आदिवासी समाज की बेटियां आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरीं और अपने खेल से पहचान बनाई। दिव्यांग खिलाड़ियों को भी समान अवसर दिया गया। आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि समाज में लौटने और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का रास्ता खुला है।

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अमित शाह का संदेश

बस्तर ओलंपिक 2025 के समापन समारोह में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने आयोजन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। जगदलपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा भी उपस्थित रहे।

अमित शाह ने कहा कि सरकार ने तय किया है कि 31 मार्च 2026 से पहले देश से लाल आतंक समाप्त किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बस्तर ओलंपिक 2025 में हम इस लक्ष्य के बहुत करीब खड़े हैं। शाह ने यह भी कहा कि अगले वर्ष बस्तर ओलंपिक 2026 तक पूरे भारत और छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा।

उन्होंने यह भरोसा भी जताया कि दिसंबर 2030 तक बस्तर संभाग देश का सबसे अधिक विकसित आदिवासी संभाग बनेगा। कांकेर, कोंडागांव, बस्तर, सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिलों को विकास की नई दिशा दी जाएगी।

आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी बनी मिसाल

शाह ने बताया कि बस्तर ओलंपिक 2025 में 700 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सलियों ने खिलाड़ी के रूप में भाग लिया। यह दृश्य पूरे देश के लिए मजबूत संदेश है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद के रास्ते पर चलकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो जाता है, जबकि मुख्यधारा में लौटकर वे सम्मान और भविष्य दोनों पा सकते हैं।

शाह ने कहा कि इन खिलाड़ियों ने भय की जगह आशा चुनी, विभाजन की जगह एकता का रास्ता अपनाया और विनाश की जगह विकास को चुना। उन्होंने यह भी कहा कि बस्तर की जनजातीय संस्कृति पूरे देश की सबसे समृद्ध विरासत है।

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खेल से रोजगार और अधोसंरचना को बढ़ावा

बस्तर ओलंपिक के चलते खेल अधोसंरचना में सुधार हुआ। ट्रेनिंग सेंटर, मैदान और स्थानीय सुविधाओं का विस्तार किया गया। आयोजन से जुड़े प्रबंधन, परिवहन और सेवाओं के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार मिला। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को राज्य की खेल अकादमियों और विशेष प्रशिक्षण योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसका उद्देश्य बस्तर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करना है।

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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सोच

छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बस्तर ओलंपिक को बस्तर के समग्र विकास की रणनीति के रूप में देखा है। उद्घाटन अवसर पर उन्होंने कहा था कि यह आयोजन युवाओं को बंदूक नहीं, खेल का मैदान देने का प्रयास है। सरकार की नीति साफ रही कि खेल के माध्यम से युवाओं को पहचान, आत्मविश्वास और भविष्य दिया जाए।

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संघर्ष से संभावनाओं की ओर

बस्तर ओलंपिक 2025 ने यह साबित किया है कि बदलाव संभव है। यह आयोजन बस्तर को संघर्ष के क्षेत्र से निकालकर संभावनाओं के क्षेत्र में ले जाने की मजबूत नींव बन चुका है। यदि यह पहल इसी निरंतरता के साथ आगे बढ़ती रही, तो बस्तर देश के सामने खेल, शांति और सामाजिक परिवर्तन का एक प्रेरक मॉडल बन सकता है।
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