CAG की रिपोर्ट! अधूरे फंड और 61 प्रतिशत खाली पदों से चल रही पंचायत व्यवस्था
VINAY VERMA | Jul 18, 2026, 13:08 IST
CAG की रिपोर्ट 2026
CAG की रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की पंचायती राज व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पंचायतों में 61% पद खाली हैं। ग्राम सभा, वित्तीय प्रबंधन और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में कई खामियां सामने आई हैं।
समझें क्या है पूरा मामला
- 61% पद पंचायती राज संस्थाओं में खाली।
- 3,243.46 करोड़ कम मिला वित्त आयोग का हिस्सा।
- 36 ग्राम पंचायतों में ग्राम सभा का कोरम नहीं मिला।
- 1,278 पंचायत सचिवों की कमी दर्ज।
- 5.18 करोड़ की पेनाल्टी ठेकेदारों से नहीं वसूली गई।
विधानसभा में पेश रिपोर्ट ने पंचायती राज व्यवस्था की कई परतें खोल दी हैं। कहीं कर्मचारियों की भारी कमी है, कहीं ग्राम सभाएं नियमों के बिना चल रही हैं, तो कहीं पंचायतों को मिलने वाला हजारों करोड़ रूपए का हिस्सा ही नहीं मिला।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायती राज संस्थाओं में स्वीकृत पदों के मुकाबले 61 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। वहीं राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा के मुकाबले स्थानीय निकायों को 3,243.46 करोड़ रूपए कम दिए गए।
गांव की सरकार कैसे चलेगी?
बाकी 1,388 पद खाली हैं। यानी छह में से लगभग चार पद रिक्त हैं। हालात ग्राम पंचायतों में भी बेहतर नहीं हैं। यहां 1,278 पंचायत सचिवों की कमी दर्ज की गई। ऐसे में सरकारी योजनाओं की निगरानी, भुगतान और विकास कार्यों पर असर पड़ना तय माना गया है।
3,243 करोड़ कम मिले, विकास कैसे होगा?
इतना ही नहीं, पंचायतों को भू-राजस्व, भू-राजस्व उपकर और उत्पाद शुल्क अधिभार जैसे तय राजस्व स्रोतों से एक रुपया भी नहीं मिला। लघु खनिज रॉयल्टी और स्टाम्प शुल्क से भी केवल 398.20 करोड़ रूपए का ही भुगतान किया गया।
यानी गांवों के विकास की गाड़ी बिना ईंधन के दौड़ाने की कोशिश होती रही।
ग्राम सभा हुई, लेकिन नियम गायब
हैरानी की बात यह है कि नियम टूटते रहे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई पंचायतों ने निर्धारित प्रारूप में वार्षिक लेखे भी तैयार नहीं किए। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े हो गए।
29 विषय दिए, अधिकार नहीं दिए
इससे पंचायतें कागजों पर अधिकार मिलने के बावजूद वास्तविक निर्णय लेने में कमजोर बनी रहीं। दूसरी ओर, 2018 से 2023 के बीच जिला योजना समितियों की बैठकें तक नहीं हुईं। यानी जिला स्तर पर विकास योजनाओं का समन्वय पांच साल तक ठप पड़ा रहा।
डिजिटल सिस्टम आया, काम अब भी रजिस्टर में
ऑनलाइन लेखांकन केवल केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान तक सीमित है। उधर, शहरी निकायों में भी आधुनिक डबल एंट्री अकाउंटिंग सिस्टम पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। यानी डिजिटल शासन का दावा अभी अधूरा है।
शहरों में भी लापरवाही, करोड़ों की वसूली अटकी
इससे संभावित किराया राजस्व का नुकसान हुआ। वहीं जांजगीर-नैला और अकलतरा की जल प्रदाय परियोजनाओं में देरी के बावजूद ठेकेदारों से 5.18 करोड़ रूपए की निर्धारित क्षतिपूर्ति राशि वसूल नहीं की गई। इससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा।
सीएजी की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि गांवों को मजबूत बनाने की व्यवस्था अभी भी कई मोर्चों पर कमजोर है। पैसा कम मिला, कर्मचारी नहीं मिले, योजनाओं की निगरानी ढीली रही और जवाबदेही भी तय नहीं हुई।
अब सवाल यह है कि विधानसभा में रिपोर्ट पेश होने के बाद सरकार इन कमियों को दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।
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