नक्सल केस में पुलिस गवाही पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Umeshwari Baghel | Jul 11, 2026, 16:13 IST
नक्सल मामलों पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल मामलों में पुलिस गवाही को लेकर अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल सरकारी गवाह होने से पुलिस अधिकारियों के बयान खारिज नहीं किए जा सकते। विश्वसनीय गवाही और अन्य सबूतों के आधार पर दोषसिद्धि कायम रह सकती है।
समझें क्या है पूरा मामला
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी नक्सलियों को विस्फोटक सामग्री पहुंचाने से जुड़े दो मामलों में की। कोर्ट ने आरोपियों की अपीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत की सजा को बरकरार रखा है।
नक्सल मामलों में पुलिस गवाही अहम
अदालत ने कहा कि किसी गवाह की विश्वसनीयता उसके पद से तय नहीं होती। गवाही की जांच उसके बयान की गुणवत्ता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए।
अगर पुलिस अधिकारी का बयान स्पष्ट है और जब्त सामग्री सहित दूसरे प्रमाण उसका समर्थन करते हैं तो उस पर विश्वास किया जा सकता है।
भैरमगढ़ मामले में सजा कायम
पुलिस के अनुसार आरोपी की निशानदेही पर अन्य विस्फोटक सामग्री भी मिली थी। मामले में ट्रायल कोर्ट ने विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोपी को सजा सुनाई थी।
आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को पर्याप्त माना। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सबूतों से अपराध की कड़ी जुड़ती है। इसके बाद अदालत ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
डेटोनेटर मिलने पर आरोपी नहीं दे सका जवाब
अदालत ने माना कि गुप्त सूचना के आधार पर हुई कार्रवाई और बरामदगी मामले को मजबूत बनाती है। आरोपी की निशानदेही पर मिली सामग्री भी उसके खिलाफ महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हुई।
UAPA से राहत का नहीं मिला फायदा
अदालत ने कहा कि हर कानून के तहत अपराध को अलग-अलग साक्ष्यों के आधार पर देखा जाता है। यदि विस्फोटक रखने या उपयोग से जुड़ा अपराध साबित होता है तो संबंधित कानून के तहत सजा जारी रह सकती है।
बेलपोच्चा जंगल केस में भी अपील खारिज
अदालत ने माना कि आरोपी प्रतिबंधित माओवादी संगठन की गतिविधियों में सहयोग कर रहे थे। इसलिए उनकी सजा में बदलाव का कोई आधार नहीं है।
जांच प्रक्रिया को माना सही
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया। साथ ही दोषियों को बची हुई सजा पूरी करने के निर्देश दिए।
फैसले का महत्व
महत्वपूर्ण तथ्य
पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल
मामला: नक्सलियों को विस्फोटक सामग्री उपलब्ध कराने से जुड़े दो केस
पहला केस: बीजापुर जिले के भैरमगढ़ क्षेत्र का मामला
बरामदगी: इलेक्ट्रिक डेटोनेटर और अन्य विस्फोटक सामग्री
सजा: ट्रायल कोर्ट की 10 साल और 5 साल की सजा बरकरार
दूसरा केस: बेलपोच्चा जंगल क्षेत्र का मामला
बरामद सामग्री: इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर, जिलेटिन रॉड, कॉर्डेक्स वायर और बैटरियां
हाईकोर्ट का फैसला: दोनों आपराधिक अपीलें खारिज
मुख्य टिप्पणी: केवल सरकारी गवाह होने से पुलिस की गवाही अविश्वसनीय नहीं मानी जाएगी।
FAQ
- क्या पुलिस अधिकारियों की गवाही पर अदालत भरोसा कर सकती है?
हां। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर पुलिस गवाही विश्वसनीय है और अन्य सबूतों से उसकी पुष्टि होती है तो अदालत उस पर भरोसा कर सकती है। - क्या सरकारी गवाह होने से पुलिस का बयान कमजोर हो जाता है?
नहीं। सिर्फ सरकारी कर्मचारी होने के आधार पर पुलिस अधिकारियों की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। - यह हाईकोर्ट फैसला किस मामले से जुड़ा है?
यह फैसला नक्सल मामलों में विस्फोटक सामग्री बरामदगी से जुड़े दो मामलों में दिया गया है।
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