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NEWS IN SHORT
- छत्तीसगढ़ के ऑल इंडिया सिविल सर्विसेस प्रतियोगिता में जीतने वाले खिलाड़ियों को ईनाम नहीं मिलता।
- खिलाड़ियों को वेतन कटने से बचाने के लिए अपने अर्जित अवकाश की बलि देनी पड़ती है।
- खेल एवं युवा कल्याण विभाग टीम चयन, ट्रेनिंग और ट्रायल की पूरी जिम्मेदारी संभालता है।
- कई विभागों में वेतन वृद्धि और वर्किंग डे मानने से इनकार किया जाता है।
- सिलेक्शन प्रक्रिया अव्यवस्थित और फेयर नहीं, पहले से चयन की संभावना रहती है।
NEWS IN DETAIL
ऑल इंडिया सिविल सर्विसेस प्रतियोगिता में जीतने वाले खिलाड़ियों छग में ईनाम ही नहीं मिलता। इतना ही नहीं खिलाड़ियों को अपना वेतन कटने से बचाने के लिए अपने अर्जित अवकाश की बली देनी पड़ती है।
यह सबकुछ कई सालों से चल रहा है। हमने जब इस बारे में जानने की कोशिश की तो और भी कई गड़बड़ियां सामने आईं। प्रतियोगिता 19 अलग-अलग खेलों आयोजित की जाती है।
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खेल विभाग समस्या की जड़
दरअसल देश के सिविल सेवा के अधिकारियों के लिए हर साल एक राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतियोगिता आयोजित होती है।
इसमें ऑल इंडिया सर्विसेस के अधिकारी यानी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस के अधिकारी भी शामिल होते हैं।
यह आदेश सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से विभागों को जारी करना होता है लेकिन सलेक्टशन, ट्रेनिंग कैंप, टीम बनाने, कोच-मैनेजर सलेक्शन से लेकर टीम भेजने तक की जिम्मेदारी खेल एवं युवा कल्याण अपने कंधोें पर ले लेता है।
इसके आदेश के आधार पर खिलाड़ी खेलने तो चले जाते हैं लेकिन विभाग आदेश को मानने के लिए मना कर देते हैं।
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ईनाम में वेतन वृद्धि नहीं मिलती
ऑल इंडिया टूर्मामेंट में फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड आने वाले खिलाड़ियों को नियमानुसार एक वेतनवृद्धि मिलती है लेकिन स्वास्थ्य, पंचायत, पीएचई, संस्कृति एवं पुरातत्व, आदिम जाति, राजस्व जैसे लगभग सभी विभाग ईनाम के रुप में वेतनवृद्धि तो दूर खेल वाले दिनों को वर्किंग डे मानने से इंकार कर देते हैं।
मजबूरन खिलाड़ियों को अपनी अर्जित अवकाश कटवाना पड़ता है। विभागों का कहना है कि अवकाश, वेतनवृद्धि संबंधित आदेश के लिए सामान्य प्रशासन के नियम पालन करने होते हैं। खेल एवं युवा कल्याण विभाग के नहीं..।
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सिलेक्शन में भी गड़बड़ी
खिलाड़ी सिलेक्शन में भी गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं। चेतन बघेल का कहना है कि इतने आनन फानन और अव्यवस्था के बीच सिलेक्शन प्रक्रिया अपनाई जाती है कि देखकर ही लगता है कि खिलाड़ियों का चयन पहले से हो चुका है यह केवल खानापूर्ति की प्रक्रिया है।
ट्रायल देने वाले की पूल बनाते हैं, रेफरशिप करते हैं। ऐसे में फेयर सिलेक्शन की उम्मीद कहां तक की जा सकती है।
आनन-फानन में कैंप
बैडमिंटन के पूर्व नेशनल प्लेयर और कोच विद्याभूषण दुबे बताते हैं कि खेल एवं युवा कल्याण विभाग के द्वारा प्रदेश के सीमित कर्मचारी तक ट्रायल की सूचना दी जाती है, जबकि ट्रायल की जानकारी समस्त जिला कलेक्टर से माध्यम से दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा जिस तरह से पुलिस विभाग और नगरी निकाय विभागों में सिविल सर्विसेज एक्ट लागू नहीं होता इस तरह से महाविद्यालय के स्पोर्ट्स टीचर और प्रोफेसर लोगों पर भी सर्विसेज एक्ट लागू नहीं होता।
बावजूद इसके इन्हें सिविल सर्विसेज टूर्नामेंट में पार्टिसिपेट करने का अवसर दिया जाना विधि विरुद्ध है।
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