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News In Short
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही माना
- पहली शादी के रहते जन्मे बच्चों को ही पिता की वैध संतान माना जाएगा।
- बिना तलाक दूसरी शादी या संबंध को कानून मान्यता नहीं देता।
- बच्चों की पहचान और अधिकार कानून के आधार पर तय होंगे।
- मामला बिलासपुर और मुंगेली जिले से जुड़ा था।
News In Detail
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक कानून से जुड़े एक अहम मामले में साफ कर दिया है कि शादी और बच्चों की पहचान भावनाओं या दावों से नहीं, बल्कि कानून से तय होती है। कोर्ट ने कहा कि अगर पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई है, तो उस दौरान या बाद में की गई दूसरी शादी को कानून नहीं मानता।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे हालात में बच्चों की पहचान और उनके अधिकार उसी शादी से जुड़े माने जाएंगे, जो कानून के हिसाब से वैध है। यानी पहली शादी के दौरान जन्मे बच्चे ही कानूनी तौर पर मान्य होंगे।
क्या था मामला
यह मामला बिलासपुर और मुंगेली इलाके से जुड़ा हुआ था। इसमें दो महिलाओं ने अदालत में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि उनकी मां एक कारोबारी की वैध पत्नी थीं और इसलिए उन्हें उसकी संतान के रूप में कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की थी कि अदालत उनकी मां को उस कारोबारी की कानूनी पत्नी घोषित करे।
फैमिली कोर्ट ने क्या कहा
फैमिली कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी दस्तावेज, गवाहों के बयान और अन्य सबूतों की जांच की। जांच के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची कि महिला की पहली शादी कभी कानूनी रूप से खत्म ही नहीं हुई थी। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि कानून के अनुसार पहली शादी के दौरान जन्मे बच्चों को ही वैध संतान माना जा सकता है।
हाईकोर्ट में अपील और अंतिम फैसला
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट ने पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की और पाया कि निचली अदालत का फैसला कानून के अनुसार सही है।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए दो टूक कहा कि पहली शादी के रहते किया गया दूसरा विवाह या कोई अन्य संबंध कानून की नजर में मौजूद ही नहीं माना जा सकता।
कानून क्या कहता है
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कानून की स्थिति को भी आसान शब्दों में स्पष्ट किया
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत बिना वैध तलाक दूसरी शादी को मान्यता नहीं मिलती
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अनुसार वैध विवाह से जन्मे बच्चों को कानून पूरी सुरक्षा देता है।
इन कानूनों के रहते किसी के व्यक्तिगत दावे से बच्चों की पहचान या अधिकार नहीं बदले जा सकते।
बच्चों के अधिकारों पर साफ संदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला अधिकारों को लेकर पूरी तरह स्पष्ट संदेश देता है। अदालत ने कहा कि बच्चों की पहचान भावनात्मक रिश्तों से नहीं, बल्कि कानून की ठोस व्यवस्था से तय होगी। पहली शादी से जन्मे बच्चों के अधिकारों पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता और उन्हें पूरा कानूनी संरक्षण मिलेगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक पारिवारिक विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि यह भी बताता है कि कानून निजी रिश्तों से ऊपर होता है। शादी की वैधता और बच्चों की पहचान को लेकर अदालत ने बिल्कुल साफ और निर्णायक बात कही है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा और बच्चों के कानूनी अधिकारों को मजबूती देगा।
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