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NEWS IN SHORT
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज की
- अवैध संतान भी पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार
- सीआरपीसी धारा 125 को बताया कल्याणकारी प्रावधान
- पति को बेटे के लिए भरण-पोषण देना अनिवार्य
- फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट ने सही ठहराया
NEWS IN DETAIL
हाईकोर्ट का अहम फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति-पत्नी विवाद से जुड़े एक मामले में पति की याचिका खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अवैध संतान भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार होती है।
मामला बेमेतरा जिले के एक युवक से जुड़ा है, जिसकी शादी 22 अप्रैल 2016 को हुई थी। इसके बाद 18 मई 2016 को गौना की रस्म हुई और पत्नी ससुराल आई। गौना के केवल पांच महीने बाद, 22 अक्टूबर 2016 को पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया।
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पति का आरोप और रिश्ता टूटना
पति ने आरोप लगाया कि गौना से पहले दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं बने थे, इसलिए बच्चा उसका नहीं है। इसी आधार पर उसने पत्नी से रिश्ता तोड़ लिया और उसे अपनाने से इनकार कर दिया।
पत्नी ने भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण का आदेश दिया।
हालांकि, तलाक के मामले में कोर्ट ने माना कि पत्नी शादी से पहले गर्भवती थी और इसे पति के प्रति क्रूरता करार देते हुए तलाक की डिक्री जारी की।
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भरण-पोषण पर विवाद
तलाक के बाद पति ने सीआरपीसी धारा 127 के तहत भरण-पोषण बंद करने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने पत्नी का भरण-पोषण बंद कर दिया, लेकिन बच्चे के लिए प्रति माह 1,000 रुपए देने का आदेश बरकरार रखा।
पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि जब बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है, तो भरण-पोषण क्यों दिया जाए। हाईकोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि बच्चे को संरक्षण देना कानून की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
Sootr Knowledge
- सीआरपीसी धारा 125 बच्चों और महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून
- इस धारा का उद्देश्य भिखारी या बेसहारा होने से बचाना
- जैविक पिता न होने पर भी कानूनी जिम्मेदारी तय हो सकती है
- फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों का दृष्टिकोण अलग-अलग हो सकता है
- ऐसे फैसले सामाजिक न्याय को मजबूत करते हैं
IMP FACTS
- कोर्ट: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
- धारा: सीआरपीसी 125 और 127
- बच्चा जन्म: 22 अक्टूबर 2016
- मासिक भरण-पोषण: ₹1,000
- फैसला: पति की याचिका खारिज
आगे क्या
- पति को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना होगा
- सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प खुला
- भरण-पोषण की राशि पर पुनर्विचार की याचिका संभव
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला बच्चों के अधिकारों को मजबूत करता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि बच्चे की स्थिति चाहे जैसी हो, उसे संरक्षण और भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय सामाजिक न्याय और मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण है।
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