RTE सीटों में भारी कटौती: छत्तीसगढ़ में 85 हजार से घटकर 26 हजार हुईं सीटें, 59 हजार बच्चों का भविष्य अधर में
Umeshwari Baghel | Oct 03, 2026, 21:43 IST
गरीब परिवारों के बच्चों के दाखिले पर संकट
छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार कानून यानी RTE के तहत गरीब परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में मिलने वाले मुफ्त दाखिले को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने दावा किया है कि प्रदेश में RTE के तहत उपलब्ध सीटों की संख्या में बड़ी कटौती की गई है।
एसोसिएशन के मुताबिक पहले करीब 85 हजार सीटें उपलब्ध थीं, जिन्हें घटाकर लगभग 26 हजार कर दिया गया है। इस बदलाव से करीब 59 हजार बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाई का मौका नहीं मिल पाया। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि RTE का मकसद गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने का अवसर देना है। ऐसे में सीटें कम होने से बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए हैं।
राजीव गुप्ता के अनुसार पहले प्रदेश में RTE के तहत करीब 85 हजार सीटों पर प्रवेश की व्यवस्था थी। अब यह संख्या घटकर लगभग 26 हजार रह गई है। एसोसिएशन का दावा है कि इस कारण लगभग 59 हजार बच्चों को इस साल प्रवेश का मौका नहीं मिल सका।
उनका कहना है कि गरीब परिवार अपने बच्चों को बेहतर स्कूलों में पढ़ाने के लिए RTE पर निर्भर रहते हैं। कई परिवारों के लिए निजी स्कूलों की फीस देना संभव नहीं होता। ऐसे परिवारों के बच्चों को RTE के तहत मुफ्त प्रवेश मिलता है। सीटें कम होने से उनके सामने विकल्प भी कम हो गए हैं।
एसोसिएशन ने RTE की प्रवेश व्यवस्था में बदलाव पर भी सवाल उठाया है। राजीव गुप्ता का कहना है कि पहले बच्चों को नर्सरी स्तर से भी RTE के तहत प्रवेश दिया जाता था। अब व्यवस्था बदलकर सीधे कक्षा पहली से दाखिला देने की बात कही जा रही है।
उनके मुताबिक यह बदलाव बच्चों के शुरुआती सीखने पर असर डाल सकता है। एक बच्चा अगर नर्सरी से ही स्कूल में पढ़ रहा है तो कक्षा पहली तक पहुंचते-पहुंचते उसे तीन साल का शुरुआती अनुभव मिल जाता है। वहीं दूसरा बच्चा अगर सीधे पहली कक्षा में प्रवेश लेता है तो दोनों की तैयारी में अंतर हो सकता है।
एसोसिएशन का कहना है कि इस अंतर का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखाई दे सकता है। इसी वजह से नर्सरी स्तर पर प्रवेश की पुरानी व्यवस्था जारी रखने की मांग की जा रही है।
RTE सीटों में कमी का मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई है।
उन्होंने दावा किया कि शिक्षा विभाग ने कोर्ट में दिए जवाब में पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं होने की बात कही है। हालांकि यह दावा एसोसिएशन की ओर से किया गया है।
एसोसिएशन का कहना है कि आर्थिक कारण बताकर सीटें कम करना गरीब परिवारों के बच्चों के अवसरों को प्रभावित करता है। इसी आधार पर एसोसिएशन ने समानता के अधिकार से जुड़ा मुद्दा भी उठाया है।
राजीव गुप्ता के मुताबिक RTE के तहत निजी स्कूलों को सरकार की ओर से निर्धारित राशि दी जाती है। प्राथमिक स्तर पर एक बच्चे के लिए करीब 7 हजार रुपए सालाना दिए जाते हैं। वहीं मिडिल स्तर पर यह राशि करीब 14 हजार रुपए सालाना बताई गई है।
एसोसिएशन का कहना है कि यदि सरकार पर्याप्त बजट उपलब्ध कराए तो ज्यादा बच्चों को RTE के तहत प्रवेश दिया जा सकता है। संगठन चाहता है कि सीटों की संख्या पहले की तरह बढ़ाई जाए, ताकि ज्यादा गरीब बच्चों को इसका लाभ मिल सके।
प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के मुताबिक इस साल करीब 59 हजार बच्चों को RTE के तहत प्रवेश का मौका नहीं मिला। संगठन का कहना है कि इसका सीधा असर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ा है।
ऐसे परिवारों के लिए निजी स्कूलों की सामान्य फीस भरना मुश्किल होता है। RTE के जरिए उनके बच्चों को बिना फीस के निजी स्कूलों में पढ़ने का मौका मिलता है। सीटें कम होने से हजारों परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई को लेकर नई चिंता खड़ी हो गई है।
प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन को अब कोर्ट से राहत की उम्मीद है। संगठन चाहता है कि RTE की सीटों की संख्या बढ़ाई जाए और नर्सरी स्तर से प्रवेश की व्यवस्था पर भी दोबारा विचार किया जाए।
फिलहाल मामला अदालत में है। दूसरी ओर एसोसिएशन लगातार यह मांग कर रहा है कि गरीब परिवारों के बच्चों के लिए उपलब्ध सीटों में कटौती नहीं होनी चाहिए।
अब इस पूरे विवाद में आगे क्या फैसला होता है, इस पर अभिभावकों और निजी स्कूलों की नजर रहेगी। खास तौर पर उन परिवारों के लिए यह मामला अहम है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए RTE योजना पर निर्भर हैं।
FAQ
85 हजार से 26 हजार रह गईं सीटें
उनका कहना है कि गरीब परिवार अपने बच्चों को बेहतर स्कूलों में पढ़ाने के लिए RTE पर निर्भर रहते हैं। कई परिवारों के लिए निजी स्कूलों की फीस देना संभव नहीं होता। ऐसे परिवारों के बच्चों को RTE के तहत मुफ्त प्रवेश मिलता है। सीटें कम होने से उनके सामने विकल्प भी कम हो गए हैं।
नर्सरी में प्रवेश बंद होने पर भी आपत्ति
उनके मुताबिक यह बदलाव बच्चों के शुरुआती सीखने पर असर डाल सकता है। एक बच्चा अगर नर्सरी से ही स्कूल में पढ़ रहा है तो कक्षा पहली तक पहुंचते-पहुंचते उसे तीन साल का शुरुआती अनुभव मिल जाता है। वहीं दूसरा बच्चा अगर सीधे पहली कक्षा में प्रवेश लेता है तो दोनों की तैयारी में अंतर हो सकता है।
एसोसिएशन का कहना है कि इस अंतर का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखाई दे सकता है। इसी वजह से नर्सरी स्तर पर प्रवेश की पुरानी व्यवस्था जारी रखने की मांग की जा रही है।
मामला अब कोर्ट तक पहुंचा
उन्होंने दावा किया कि शिक्षा विभाग ने कोर्ट में दिए जवाब में पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं होने की बात कही है। हालांकि यह दावा एसोसिएशन की ओर से किया गया है।
एसोसिएशन का कहना है कि आर्थिक कारण बताकर सीटें कम करना गरीब परिवारों के बच्चों के अवसरों को प्रभावित करता है। इसी आधार पर एसोसिएशन ने समानता के अधिकार से जुड़ा मुद्दा भी उठाया है।
प्रति बच्चे कितना मिलता है भुगतान
एसोसिएशन का कहना है कि यदि सरकार पर्याप्त बजट उपलब्ध कराए तो ज्यादा बच्चों को RTE के तहत प्रवेश दिया जा सकता है। संगठन चाहता है कि सीटों की संख्या पहले की तरह बढ़ाई जाए, ताकि ज्यादा गरीब बच्चों को इसका लाभ मिल सके।
गरीब परिवारों पर सीधे असर का दावा
ऐसे परिवारों के लिए निजी स्कूलों की सामान्य फीस भरना मुश्किल होता है। RTE के जरिए उनके बच्चों को बिना फीस के निजी स्कूलों में पढ़ने का मौका मिलता है। सीटें कम होने से हजारों परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई को लेकर नई चिंता खड़ी हो गई है।
अब कोर्ट के फैसले पर नजर
फिलहाल मामला अदालत में है। दूसरी ओर एसोसिएशन लगातार यह मांग कर रहा है कि गरीब परिवारों के बच्चों के लिए उपलब्ध सीटों में कटौती नहीं होनी चाहिए।
अब इस पूरे विवाद में आगे क्या फैसला होता है, इस पर अभिभावकों और निजी स्कूलों की नजर रहेगी। खास तौर पर उन परिवारों के लिए यह मामला अहम है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए RTE योजना पर निर्भर हैं।
FAQ
- आरटीई के तहत सीटों की संख्या क्यों कम की गई है?
आरटीई के तहत सीटों की संख्या 85 हजार से घटकर 26 हजार कर दी गई है, जिसके कारण लगभग 59 हजार बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाई का अवसर नहीं मिल पाया है। इसी कमी को लेकर निजी स्कूल एसोसिएशन ने सवाल उठाए हैं। - प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन इस बदलाव पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि RTE का मकसद गरीब परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाई का मौका देना है। इससे बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए हैं। - क्या कोर्ट में इस मामले को लेकर कुछ की गई है?
हाँ, इस मुद्दे को लेकर प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने शिक्षा विभाग के उत्तर को लेकर सवाल उठाए हैं, जिसमें पैसे की कमी का हवाला दिया गया है।
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