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Photograph: (the sootr)
BASTAR.छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में चल रही एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया विवाद का कारण बन गई है। बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से बस्तर के आदिवासी समुदाय के वोटर्स को नुकसान हो सकता है।
पूर्व विधायक ने 25 नवंबर 2025 को याचिका दायर की। याचिका में कहा कि एसआईआर का वर्तमान रूप बस्तर के आदिवासी मतदाताओं के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। खासकर उन जनजातियों के लिए जिनके पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं।
क्यों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे पूर्व विधायक मनीष कुंजाम?
पूर्व विधायक कुंजाम ने 25 नवंबर को अपनी याचिका Supreme Court में दाख़िल की है। जो अब चर्चा का विषय बन गई है। उनका कहना है कि बस्तर की जनजातियां और उनकी जीवनशैली इस कठिन प्रक्रिया के लिए तैयार नहीं है।
दस्तावेज़ों की कमी: कुंजाम कहते हैं कि बस्तर घना जंगल क्षेत्र है। पहाड़ी और जंगली इलाक़ों में रहने वाले आदिवासी पहचान संबंधी कागज नहीं दे पाएंगे।
BLO की पहुंच से बाहर: याचिका में बताया गया है कि कई गांव तो इतने अंदर हैं कि BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) तक पहुंचना मुश्किल है। यहां ग्रामीण भी आसानी से पहुंच नहीं पाते हैं।
सलवा जुडूम का दर्द: उन्होंने यह भी बताया कि सलवा जुडूम के वक़्त 644 गांव विरान हो गए थे। लोगों के घर जल गए थे, जिस कारण उनके पास आज कागज़ नहीं है।
फॉर्म भरने की मुश्किल: पूर्व विधायक का कहना है कि यह फॉर्म भरना ही अपने आप में एक बहुत कठिन काम है। खासकर कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए।
यह सब मिलकर एक ऐसी स्थिति बना रहा है जहां लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट सकते हैं। यह उनकी सबसे बड़ी चिंता है।
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लाखों मतदाताओं के अधिकारों पर संकट
पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने याचिका में भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को पार्टी बनाया है। वह कहते हैं कि मताधिकार किसी भी नागरिक का सबसे मूल संवैधानिक अधिकार होता है। इस अधिकार की सुरक्षा करना चुनाव आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। SIR की इस प्रक्रिया से यह अधिकार कमज़ोर हो रहा है, जो सही नहीं है।
अगर SIR के नियमों में लचीलापन, राहत और व्यावहारिकता लाई जाना चाहिए। अभी की प्रक्रिया से बस्तर के आदिवासियों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
सलवा जुडूम का असर
मनीष कुंजाम ने यह भी बताया कि सलवा जुडूम के दौरान बस्तर के 644 गांव खाली हो गए थे। हजारों घर जलाए गए और कई परिवारों के पास कोई पहचान पत्र या अन्य दस्तावेज नहीं है। इसके चलते बस्तर के आदिवासियों को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में कठिनाई हो रही है। कई गांव पहाड़ियों और जंगलों में स्थित हैं, जहां तक BLO नहीं पहुंच सकते।
क्या है एसआईआर प्रक्रिया?
एसआईआर एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया है, जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों की तैयारियों के तहत वोटर्स की सूची की सटीकता को सुनिश्चित करने के लिए लागू किया जाता है। हालांकि, कुंजाम का कहना है कि बस्तर में एसआईआर प्रक्रिया का पालन करना आदिवासी लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कल
मनीष कुंजाम की याचिका पर सुनवाई 1 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में होगी। इस सुनवाई के दौरान कोर्ट से कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं। जो बस्तर क्षेत्र में चल रही एसआईआर प्रक्रिया की दिशा को तय करेंगे।
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