बिना परीक्षा दिए ही बच्चों की मार्कशीट में भर दिए ग्रेड, 13 लाख छात्रों की पढ़ाई पर उठे सवाल

Harrison Masih | Oct 31, 2026, 10:36 IST
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<strong>परीक्षा नहीं, पढ़ाई नहीं, फिर भी मार्कशीट में ग्रेड, छत्तीसगढ़ में सामने आई शिक्षा विभाग की बड़ी चूक</strong>
परीक्षा नहीं, पढ़ाई नहीं, फिर भी मार्कशीट में ग्रेड, छत्तीसगढ़ में सामने आई शिक्षा विभाग की बड़ी चूक

छात्रों ने परीक्षा नहीं दी, शिक्षकों ने पेपर नहीं लिया और न ही मूल्यांकन हुआ। इसके बावजूद बच्चों की मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई और परीक्षा की व्यवस्था को लेकर यह मामला सामने आया है। मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत शुरू किए गए तीन नए विषयों से जुड़ा है।

इन विषयों में फिजिकल एजुकेशन, आर्ट्स एजुकेशन और बिजनेस एजुकेशन शामिल हैं। जानकारी के मुताबिक, इन विषयों की परीक्षा कई स्कूलों में नहीं हुई। फिर भी बच्चों को ग्रेड दे दिए गए। यह गड़बड़ी सत्र 2024-25 और 2025-26 में सामने आई है। इससे प्रदेश के करीब 13 लाख छात्रों की पढ़ाई और मूल्यांकन पर सवाल खड़े हो गए हैं।

समझें क्या है पूरा मामला

  • छत्तीसगढ़ के 11 जिलों के 50 स्कूलों में पड़ताल में ये मामल सामने आया है।
  • तीन नए विषयों की परीक्षा नहीं ली गई। ये हैं शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा।
  • सत्र 2024-25 में तीसरी और छठवीं में ऐसा हुआ है ।
  • सत्र 2025-26 में चौथी और सातवीं में भी यही गड़बड़ी सामने आई।
  • शिक्षकों के मुताबिक मार्कशीट में कॉलम पहले से थे, इसलिए ग्रेड भर दिए गए।

बिना परीक्षा के कैसे दे दिए गए ग्रेड?

सत्र 2024-25 में तीसरी और छठवीं के बच्चों के लिए इन नए विषयों की लिखित परीक्षा नहीं ली गई थी। इसके बावजूद मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए।

यही स्थिति सत्र 2025-26 में भी देखने को मिली। इस बार चौथी और सातवीं के बच्चों के साथ ऐसा हुआ।

अगस्त और सितंबर में स्कूलों में तिमाही परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके लिए बाकायदा टाइम-टेबल भी जारी किया गया था। लेकिन इस समय-सारणी में तीनों नए विषयों को शामिल नहीं किया गया था।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब परीक्षा हुई ही नहीं, तो बच्चों को ग्रेड किस आधार पर दिए गए?

एनईपी के तहत कौन से नए विषय जोड़े गए?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP के तहत बच्चों को पढ़ाई के साथ अन्य गतिविधियों और कौशल से जोड़ने की योजना बनाई गई है।

इसी के तहत सरकारी स्कूलों में तीन नए विषय शुरू किए गए हैं।

1. शारीरिक शिक्षा और कल्याण

इस विषय में बच्चों को खेल, योग, पोषण और स्वस्थ जीवनशैली के बारे में सिखाया जाना है। इसका मकसद बच्चों को शारीरिक रूप से स्वस्थ रखना है।

2. कला शिक्षा

इस विषय में संगीत, रंगमंच, कठपुतली, चित्रकला और मूर्तिकला जैसी चीजें शामिल हैं। इसके अलावा ग्राफिक डिजाइन और फोटोग्राफी की जानकारी भी दी जानी है।

3. व्यावसायिक शिक्षा

इस विषय में बच्चों को कामकाज से जुड़े हुनर सिखाने की योजना है। इसमें बागवानी, ऑटोमोबाइल सर्विसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, अकाउंटिंग, बैंकिंग और रिटेल जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

इन विषयों का पाठ्यक्रम राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने तैयार किया है। पाठ्यपुस्तक निगम ने दो शैक्षणिक सत्रों में कुल 66.96 लाख किताबें छापीं और जिलों तक पहुंचाईं।


50 स्कूलों की जांच में क्या सामने आया?

इस मामले की पड़ताल के लिए 11 जिलों के 50 सरकारी स्कूलों की जानकारी जुटाई गई।

इसमें रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार और जांजगीर के स्कूल शामिल थे। इसके अलावा जगदलपुर, बीजापुर, जशपुर, नारायणपुर, दुर्ग और धमतरी के स्कूलों की भी जांच की गई।

इस दौरान शिक्षकों से पूछा गया कि नए विषयों की परीक्षा कैसे हुई और बच्चों को ग्रेड किस आधार पर दिए गए।

जांच में पता चला कि कई स्कूलों में इन विषयों की परीक्षा ही नहीं ली गई थी। इसके बाद भी मार्कशीट में ग्रेड दर्ज थे।

शिक्षकों ने क्या बताया?

कई शिक्षकों ने बताया कि मार्कशीट में तीनों नए विषय पहले से लिखे हुए थे। उनके सामने ग्रेड भरने के लिए अलग-अलग कॉलम भी दिए गए थे।

ऐसे में उन्होंने कॉलम खाली छोड़ने के बजाय उनमें ग्रेड भर दिए।

कुछ शिक्षकों ने यह भी कहा कि आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं किया जाता। इसलिए इन विषयों की परीक्षा नहीं होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।

हालांकि, इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर बच्चों की परीक्षा नहीं हुई, तो उनकी पढ़ाई और समझ का आकलन कैसे किया गया?


स्कूलों में शिक्षक नहीं, तो बच्चों को किसने पढ़ाया?

इस पूरे मामले में एक और अहम बात सामने आई है। कई सरकारी स्कूलों में इन नए विषयों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक ही नहीं हैं।

कला शिक्षा में संगीत, चित्रकला और दूसरी कलाओं की जानकारी देने वाले शिक्षक कम हैं।

शारीरिक शिक्षा के लिए भी पर्याप्त शारीरिक प्रशिक्षण शिक्षक यानी PTI उपलब्ध नहीं हैं।

इसी तरह व्यावसायिक शिक्षा के लिए अलग-अलग कामों के जानकार शिक्षकों की जरूरत है। लेकिन कई स्कूलों में ऐसे विशेषज्ञ मौजूद नहीं हैं।

ऐसे में सवाल है कि जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं थे, तो बच्चों को इन विषयों की पढ़ाई किसने कराई? और अगर पढ़ाई नहीं हुई, तो मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?

तीन दस्तावेजों से सामने आई गड़बड़ी

इस मामले में तीन अहम दस्तावेज सामने आए हैं।

पहला दस्तावेज: बच्चों की मार्कशीट

पिछले सत्र की मार्कशीट में तीनों नए विषयों के नाम और ग्रेड भरने के लिए कॉलम मौजूद थे। शिक्षकों ने बताया कि बिना लिखित परीक्षा लिए ही इन कॉलम में ग्रेड दर्ज किए गए।

दूसरा दस्तावेज: परीक्षा का टाइम-टेबल

सितंबर में हुई तिमाही परीक्षा के लिए लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने समय-सारणी जारी की थी। इसमें दूसरे विषयों की परीक्षा का जिक्र था। लेकिन शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा शामिल नहीं थे।

कुछ शिक्षकों ने इसी बात की जानकारी दी थी। इसके बाद मामले की पड़ताल शुरू हुई।

तीसरा दस्तावेज: SCERT की बैठक

तीसरा दस्तावेज एससीईआरटी की बैठक से जुड़ा है। इसमें इन नए विषयों को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात कही गई है। इस दस्तावेज पर समिति के 8 सदस्यों के हस्ताक्षर भी बताए गए हैं।


डीपीआई और जिला शिक्षा विभाग के बीच कहां हुई चूक?

इस मामले में परीक्षा नहीं होने की एक वजह जिम्मेदारी को लेकर साफ निर्देशों की कमी भी बताई गई है।

जानकारी के मुताबिक, लोक शिक्षण संचालनालय यानी DPI को लग रहा था कि इन विषयों की परीक्षा भी दूसरे विषयों की तरह जिला स्तर पर कराई जाएगी।

दूसरी तरफ जिला शिक्षा अधिकारी डीपीआई के निर्देशों का इंतजार करते रहे।

इस तरह परीक्षा कराने की जिम्मेदारी को लेकर दोनों स्तरों पर स्पष्टता नहीं रही। इसका असर स्कूलों में परीक्षा व्यवस्था पर पड़ा।

अधिकारियों ने क्या कहा?

एससीईआरटी के उप संचालक और पाठ्यक्रम शाखा के प्रभारी कौस्तुभ चटर्जी ने कहा कि कला और योग जैसे विषयों को भी दूसरे विषयों की तरह अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

उन्होंने बताया कि इनकी किताबें भी स्कूलों तक पहुंचाई गई हैं। उनके मुताबिक, बच्चों का परिणाम परीक्षा और मूल्यांकन के आधार पर ही तैयार होना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर बिना मूल्यांकन के ही बच्चों को ग्रेड दिए जा रहे हैं, तो पाठ्यक्रम तैयार करने का क्या फायदा है?

वहीं, लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक अशोक बंजारा ने भी कहा कि जब विषय पाठ्यक्रम में शामिल हैं और उनकी किताबें स्कूलों को दी गई हैं, तो उनकी परीक्षा भी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर प्रश्नपत्र तैयार करके परीक्षा कराई जा सकती है।

उनके मुताबिक, कुछ शिक्षक अपनी कमियां छिपाने के लिए अलग-अलग बहाने बना रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में दोबारा स्पष्ट निर्देश जारी करवाए जाएंगे।

Refrence: दैनिक भास्कर
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