हसदेव पर तीसरा हमला! खनन के लिए अडानी को मंजूरी, हाई कंजर्वेशन ज़ोन में 4.48 लाख पेड़ों की बलि
VINAY VERMA | May 28, 2026, 15:40 IST
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छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में 1,742.6 हेक्टेयर क्षेत्र में नई कोयला खदान को मंजूरी मिल गई। इसके तहत लगभग 4.48 लाख पेड़ काटे जाएंगे। अडानी समूह खनन संचालन करेगा।
NEWS IN SHORT
- हसदेव अरण्य के 1,742.6 हेक्टेयर जंगल में खनन को मंजूरी
- करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की मंजूरी
- अडानी समूह करेगा खनन संचालन
- हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों पर असर की आशंका
- आदिवासी संगठनों और पर्यावरण समूहों का लगातार विरोध
NEWS IN DETAIL
यह मंजूरी राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड यानी RVUNL को मिली है। खनन सरगुजा जिले के केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में होगा। खनन का संचालन अडानी समूह करेगा। यह हसदेव में तीसरी बड़ी कोयला परियोजना होगी। पहले से परसा और पीईकेबी खदानें चल रही हैं।
कभी नो-गो ज़ोन, अब खुला खनन का रास्ता
वन सलाहकार समिति यानी FAC ने 8 मई की बैठक में स्टेज-1 मंजूरी दे दी। दलील दी गई कि राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की जरूरत है। कहा गया कि मौजूदा कोल ब्लॉक पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए नई खदान जरूरी है।
अडानी करेगा खनन, राजस्थान को कोयला
करीब 9 मिलियन टन अतिरिक्त कोयले की जरूरत बताई गई है। इसी तर्क के आधार पर जंगल डायवर्ट करने की मंजूरी मिली। हालांकि विरोध करने वाले सवाल पूछ रहे हैं। क्या बिजली के लिए जंगल खत्म करना ही एकमात्र रास्ता है? क्या ‘हाई कंजर्वेशन ज़ोन’ सिर्फ कागजों तक सीमित है?
चरणबद्ध कटाई का दावा
लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ता कह रहे हैं कि जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है। सदियों में बना प्राकृतिक तंत्र दोबारा खड़ा नहीं होता। कटे हुए साल जंगलों की भरपाई पौधे लगाकर नहीं हो सकती।
हाथियों के रास्ते में नई दीवार
राज्य सरकार ने खुद माना है कि यहां हाथियों की आवाजाही होती है। इसके अलावा स्लॉथ भालू, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी और जंगली सूअर भी पाए जाते हैं।
FAC की बैठक के मिनट्स में साफ लिखा गया है कि खदान हाथियों की आवाजाही को प्रभावित कर सकती है। यानी सरकार को खतरे का अंदाजा है। फिर भी मंजूरी दी गई। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि कॉरिडोर टूटने का मतलब है मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ना। गांवों में हाथियों की घुसपैठ बढ़ सकती है। फसल नुकसान और जान का खतरा भी बढ़ेगा।
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आदिवासियों का सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी बात सुनी ही नहीं गई। जंगल बचाने के वादे किए गए। फिर एक-एक कर खदानों को मंजूरी दी जाती रही।
जंगल की भरपाई या सिर्फ कागजी इलाज?
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क्या विस्थापन का दर्द कागजों में खत्म हो जाता है? हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह हसदेव नदी और बांगो बांध का जलग्रहण क्षेत्र है। इसे टाइगर कॉरिडोर के रूप में भी देखा जाता है।अब यहां तीसरी बड़ी कोयला खदान आने जा रही है। और सवाल फिर वही खड़ा है। देश को कोयला चाहिए या बचा हुआ जंगल?
FAQ
- हसदेव अरण्य में खनन क्यों किया जा रहा है?
राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की जरूरत पूरी करने के लिए नई खदान का रास्ता खोला गया है। - कितने पेड़ काटे जाएंगे?
करीब 4.48 लाख पेड़ चरणबद्ध तरीके से काटे जाएंगे। - क्या यह क्षेत्र सुरक्षित है?
यह हाई कंजर्वेशन ज़ोन और हाथी कॉरिडोर के पास है, इसलिए पर्यावरण और वन्यजीवों पर असर की चिंता है। - स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भूमिका क्या रही?
आदिवासी और पर्यावरण समूह लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने खनन को मंजूरी दे दी।
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