छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिना सहमति नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट पर रोक
Umeshwari Baghel | Jul 02, 2026, 16:55 IST
जबरन नार्को टेस्ट पर रोक
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति का नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट उसकी स्वतंत्र सहमति के बिना नहीं कराया जा सकता। सहमति ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज होगी।
समझें क्या है पूरा मामला
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। टेस्ट कराने से पहले तय कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का पालन करना जरूरी होगा।
रायगढ़ पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है। उनके खिलाफ कोई ठोस प्रमाण होने की जानकारी भी नहीं दी गई। इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें लगातार थाने बुलाया और लंबे समय तक बैठाकर रखा।
याचिका में आरोप लगाया गया कि करीब 18 दिनों तक उन्हें बिना उचित नोटिस के पूछताछ के लिए बुलाया जाता रहा। उनके मोबाइल फोन भी कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना जब्त कर लिए गए। इसके बाद उन्हें रायपुर ले जाकर नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने का दबाव बनाया गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इन जांचों के लिए न तो उनकी स्वतंत्र सहमति ली गई और न ही किसी सक्षम न्यायिक अधिकारी से अनुमति प्राप्त की गई।
मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज करनी होगी सहमति
मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना होगा कि सहमति स्वेच्छा से दी गई है। व्यक्ति पर पुलिस, जांच एजेंसी या किसी अन्य पक्ष का दबाव नहीं होना चाहिए। टेस्ट से पहले व्यक्ति को जांच की प्रकृति, प्रक्रिया और संभावित प्रभावों की जानकारी देना भी आवश्यक होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लिखित हस्ताक्षर को सहमति नहीं माना जा सकता। सहमति सूचित, स्वतंत्र और बिना दबाव के होनी चाहिए। कानूनी सुरक्षा के बिना कराया गया टेस्ट व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी फैसले का उल्लेख
कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइन और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में मौजूद सुरक्षा प्रावधानों का पालन करने को भी कहा। इन नियमों का उद्देश्य जांच और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना है।
आत्म-अभिशंसन से संरक्षण का अधिकार
ऐसी जांचों में व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। इसी कारण न्यायिक निगरानी, कानूनी सलाह और स्वतंत्र सहमति को जरूरी माना गया है।
मामले की सच्चाई पर कोर्ट ने नहीं दी राय
इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ में पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने से पहले तय प्रक्रिया का पालन करना होगा। बिना स्वतंत्र सहमति और न्यायिक निगरानी के किसी भी व्यक्ति को ऐसी जांच के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
सहमति संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र और पूरी जानकारी के साथ होनी चाहिए।
सहमति सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज की जाएगी।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी फैसले और NHRC गाइडलाइन का पालन जरूरी बताया।
जबरन वैज्ञानिक जांच संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन हो सकती है।
मामला रायगढ़ के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र की हत्या जांच से जुड़ा है।
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस पर बिना नोटिस लगातार बुलाने और मोबाइल जब्त करने का आरोप लगाया।
हाईकोर्ट ने हत्या मामले की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की।
FAQ
- क्या पुलिस बिना सहमति नार्को टेस्ट करा सकती है?
नहीं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट बिना स्वतंत्र सहमति के नहीं कराया जा सकता। - सहमति किसके सामने दर्ज होगी?
संबंधित व्यक्ति की सहमति सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज होगी। मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि सहमति दबाव में नहीं दी गई है। - हाईकोर्ट ने किन नियमों के पालन का निर्देश दिया है?
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी फैसले, NHRC की गाइडलाइंस और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सुरक्षा प्रावधानों का पालन जरूरी बताया है।
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