लैब निजी हाथों में, फिर भी सरकार ने खरीदे 10 करोड़ के रीएजेंट
Harrison Masih | Jun 25, 2026, 22:51 IST
छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में रीजेंट खरीदी पर सवाल
छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में लैब संचालन को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। सरकारी अस्पतालों की लैब सेवाएं निजी एजेंसियों को सौंपने की प्रक्रिया के बीच करीब 10 करोड़ रूपए की रीएजेंट खरीदी की गई है।
छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में जांच व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सरकारी अस्पतालों की लैब संचालन व्यवस्था में बड़े बदलाव के बाद अब रीएजेंट खरीदी को लेकर विवाद सामने आया है। आरोप है कि जब प्रदेश के कई अस्पतालों में लैब संचालन निजी एजेंसियों को सौंप दिया गया है, तब भी सरकार ने करीब 10 करोड़ रूपए की रीएजेंट खरीदी कर ली।
मामला सरकारी अस्पतालों में जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले रिएजेंट और मशीनों से जुड़ा है। सवाल उठ रहा है कि जब लैब का संचालन निजी कंपनियों के जरिए किया जा रहा है, तो सरकारी स्तर पर इतनी बड़ी मात्रा में रीएजेंट खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी?
स्वास्थ्य विभाग ने प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में लैब सेवाओं को पीपीपी मॉडल के तहत निजी एजेंसियों को सौंपने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत निजी एजेंसियों को मशीन, तकनीकी स्टाफ और जांच व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दी गई है।
वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग द्वारा रीएजेंट खरीदी का निर्णय लिया गया। इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि यदि निजी एजेंसी को लैब संचालन की जिम्मेदारी दी गई है तो रीएजेंट की आपूर्ति और प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए।
21 जनवरी को
जानकारी के अनुसार, सरकार ने 21 जनवरी को कैबिनेट बैठक में प्रदेश की लैब व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। इसमें लैब संचालन का काम पीपीपी मॉडल के तहत निजी एजेंसियों को सौंपने की दिशा में फैसला लिया गया।
इसके बाद सवाल उठे कि जब व्यवस्था निजी एजेंसी के हाथों में जाने वाली थी, तो कुछ ही समय बाद रीएजेंट खरीदी की प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ाई गई।
मामले में आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग ने करीब 10 करोड़ रूपए की रीएजेंट खरीदी की। इसे लेकर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि क्या खरीदी प्रक्रिया को पर्याप्त समीक्षा के बाद मंजूरी दी गई या जल्दबाजी में फैसला लिया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि रीएजेंट की खरीदी सीधे तौर पर लैब संचालन मॉडल से जुड़ी होती है। यदि लैब का संचालन बदल रहा है तो खरीदी की जरूरत और मात्रा का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए था।
इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल सरकारी संसाधनों को लेकर भी है। प्रदेश के कई अस्पतालों में पहले से सरकारी मशीनें उपलब्ध हैं और वहां नियमित कर्मचारी जांच व्यवस्था संभाल रहे थे।
अब निजी एजेंसी के आने के बाद सरकारी मशीनों का उपयोग कैसे होगा? मौजूद स्टाफ की भूमिका क्या रहेगी? खरीदे गए रीएजेंट का इस्तेमाल कहां होगा?
इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
स्वास्थ्य विभाग का उद्देश्य बेहतर और तेज जांच सुविधा उपलब्ध कराना है, लेकिन इस व्यवस्था को लेकर कर्मचारियों और विशेषज्ञों में चिंता है।
उनका कहना है कि यदि निजी एजेंसी को पूरी जिम्मेदारी दी गई है तो संसाधनों के दोहरे इस्तेमाल से बचना चाहिए। वहीं सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि खरीदे गए रीएजेंट का उपयोग मरीजों के हित में हो और सरकारी धन की बर्बादी न हो।
जानकारी के अनुसार प्रदेश के कई अस्पतालों में सरकारी लैब व्यवस्था को धीरे-धीरे बंद कर निजी एजेंसी के माध्यम से जांच शुरू करने की तैयारी है।
योजना के तहत जिला अस्पतालों में लैब व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी निजी मॉडल लागू किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जांच व्यवस्था में भी परिवर्तन की तैयारी है।
इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया और नीति पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और कर्मचारी संगठनों की ओर से भी इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग उठ सकती है।
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार इस रीएजेंट खरीदी को लेकर क्या सफाई देती है और खरीदे गए संसाधनों का उपयोग किस तरह किया जाता है।
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मामला सरकारी अस्पतालों में जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले रिएजेंट और मशीनों से जुड़ा है। सवाल उठ रहा है कि जब लैब का संचालन निजी कंपनियों के जरिए किया जा रहा है, तो सरकारी स्तर पर इतनी बड़ी मात्रा में रीएजेंट खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी?
लैब संचालन निजी हाथों में, फिर रीएजेंट खरीदी क्यों?
वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग द्वारा रीएजेंट खरीदी का निर्णय लिया गया। इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि यदि निजी एजेंसी को लैब संचालन की जिम्मेदारी दी गई है तो रीएजेंट की आपूर्ति और प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए।
21 जनवरी को कैबिनेट में लिया गया फैसला
इसके बाद सवाल उठे कि जब व्यवस्था निजी एजेंसी के हाथों में जाने वाली थी, तो कुछ ही समय बाद रीएजेंट खरीदी की प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ाई गई।
रीएजेंट खरीदी में जल्दबाजी का आरोप
विशेषज्ञों का कहना है कि रीएजेंट की खरीदी सीधे तौर पर लैब संचालन मॉडल से जुड़ी होती है। यदि लैब का संचालन बदल रहा है तो खरीदी की जरूरत और मात्रा का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए था।
सरकारी मशीनों और स्टाफ का क्या होगा?
अब निजी एजेंसी के आने के बाद सरकारी मशीनों का उपयोग कैसे होगा? मौजूद स्टाफ की भूमिका क्या रहेगी? खरीदे गए रीएजेंट का इस्तेमाल कहां होगा?
इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
मरीजों को फायदा या व्यवस्था पर बोझ?
उनका कहना है कि यदि निजी एजेंसी को पूरी जिम्मेदारी दी गई है तो संसाधनों के दोहरे इस्तेमाल से बचना चाहिए। वहीं सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि खरीदे गए रीएजेंट का उपयोग मरीजों के हित में हो और सरकारी धन की बर्बादी न हो।
लैब बंद होने की भी तैयारी
योजना के तहत जिला अस्पतालों में लैब व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी निजी मॉडल लागू किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जांच व्यवस्था में भी परिवर्तन की तैयारी है।
स्वास्थ्य विभाग पर उठ रहे सवाल
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार इस रीएजेंट खरीदी को लेकर क्या सफाई देती है और खरीदे गए संसाधनों का उपयोग किस तरह किया जाता है।
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