105 करोड़ का हेलीकॉप्टर टेंडर, फिर भी नहीं मिला एक भी दावेदार
Rajesh Lahoti | Jun 13, 2026, 19:36 IST
छत्तीसगढ़ में हेलीकाप्टर टेंडर फेल 2026
सरकार प्रशासनिक पहुंच को मजबूत करने के लिए 105 करोड़ रुपए की लागत से नया हेलीकॉप्टर वेट लीज पर लेने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए जारी ग्लोबल टेंडर की पहली समयसीमा में कोई कंपनी आगे नहीं आई, जिसके बाद विभाग ने इसे बढ़ाकर 17 जून कर दिया है।
छत्तीसगढ़ सरकार प्रशासनिक पहुंच को तेज करने, दूरस्थ इलाकों तक वरिष्ठ अधिकारियों की आवाजाही आसान बनाने और आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए नया हेलीकॉप्टर किराए पर लेने की तैयारी कर रही है।
इसके लिए विमानन संचालनालय (Directorate of Aviation) ने करीब 105 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाला ग्लोबल टेंडर जारी किया था। लेकिन इतनी बड़ी राशि और आकर्षक दिखने वाले इस अनुबंध के बावजूद पहली बार में कोई भी कंपनी आगे नहीं आई। पहले इस टेंडर की आखरी तारीख 3 जून रखी गई थी।अब विभाग को शुद्धिपत्र जारी कर टेंडर की समयसीमा 17 जून तक बढ़ानी पड़ी है।
टेंडर के अनुसार सरकार एक अत्याधुनिक, वातानुकूलित और वीआईपी सुविधाओं से लैस हेलीकॉप्टर चाहती है। इसमें कम से कम आठ लोगों के बैठने की क्षमता होनी चाहिए ताकि मुख्यमंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और सुरक्षा कर्मी एक साथ यात्रा कर सकें। हेलीकॉप्टर का उपयोग मुख्य रूप से बस्तर, सरगुजा और अन्य दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशासनिक दौरे, संवेदनशील इलाकों के निरीक्षण और आपातकालीन परिस्थितियों में किया जाना है।
सरकार ने इसे वेट लीज मॉडल पर लेने का फैसला किया है। यानी हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने वाली कंपनी ही पायलट, इंजीनियर, तकनीकी स्टाफ, रखरखाव, बीमा और संचालन की पूरी जिम्मेदारी संभालेगी। सरकार केवल सेवा का उपयोग करेगी और तय शर्तों के अनुसार भुगतान करेगी।
यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है। आमतौर पर 105 करोड़ रुपए के सरकारी अनुबंध में कई कंपनियां रुचि दिखाती हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। आशंका है कि टेंडर की तकनीकी शर्तों ने संभावित प्रतिभागियों की संख्या सीमित कर दी हो। भारत में ऐसी कंपनियां बहुत ज्यादा नहीं हैं जो ट्विन इंजन, वीआईपी कॉन्फिगरेशन वाले हेलीकॉप्टर को लंबे समय तक वेट लीज मॉडल पर उपलब्ध करा सकें।
इसके अलावा सरकार ने कंपनियों के लिए अनुभव और वित्तीय क्षमता से जुड़ी शर्तें भी रखी हैं। एविएशन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि किसी टेंडर में पात्र कंपनियों की संख्या बहुत कम हो जाए तो प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और कई बार बोली प्रक्रिया ही सफल नहीं हो पाती।
जानकारों का कहना है कि पहली नजर में 105 करोड़ रुपए की राशि काफी बड़ी लगती है, लेकिन एविएशन सेक्टर का गणित अलग होता है। हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने वाली कंपनी को तीन वर्षों तक मशीन, पायलट, इंजीनियर, स्पेयर पार्ट्स, बीमा और नियमित रखरखाव की जिम्मेदारी निभानी होगी।
इसके अलावा हेलीकॉप्टर को अधिकांश समय उपलब्ध रखना होगा, भले ही उसका उपयोग हो या न हो। ऐसे में कंपनियां केवल उड़ान घंटों की लागत नहीं, बल्कि पूरे संचालन तंत्र का खर्च जोड़कर निर्णय लेती हैं। यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियों ने आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन करने के बाद बोली लगाने में रुचि नहीं दिखाई होगी।
इस टेंडर ने एक पुरानी बहस को भी फिर से जिंदा कर दिया है। यदि सरकार को लंबे समय तक हेलीकॉप्टर की आवश्यकता है, तो क्या उसे किराए पर लेने के बजाय खरीद लेना चाहिए? एविएशन क्षेत्र के जानकारों के अनुसार इसी श्रेणी का नया ट्विन इंजन, आठ सीट वाला हेलीकॉप्टर लगभग 45 से 60 करोड़ रुपए के बीच खरीदा जा सकता है।
हालांकि खरीदने के बाद उसका रखरखाव, बीमा, पायलट, तकनीकी स्टाफ और अन्य संचालन खर्च अलग से जोड़ना पड़ता है।सरकार का तर्क यही है कि वेट लीज मॉडल में तकनीकी जिम्मेदारियां निजी कंपनी पर रहती हैं और सरकारी मशीनरी को अलग एविएशन सिस्टम खड़ा नहीं करना पड़ता। आलोचकों का कहना है कि यदि वर्षों तक लगातार किराए पर हेलीकॉप्टर लिया जाता रहेगा तो कुल खर्च खरीद लागत से कहीं ज्यादा हो सकता है।
हेलीकॉप्टर को लेकर राजनीतिक बहस भी शुरू होना तय माना जा रहा है, क्योंकि टेंडर में वीआईपी सुविधाओं का स्पष्ट उल्लेख है। हालांकि सरकार का पक्ष यह है कि यह हेलीकॉप्टर आपदा प्रबंधन, आपातकालीन निरीक्षण और त्वरित प्रशासनिक पहुंच के लिए भी होगा। बस्तर जैसे क्षेत्रों में कई बार सड़क मार्ग से पहुंचने में घंटों लग जाते हैं, जबकि हेलीकॉप्टर से वही दूरी कुछ ही समय में तय की जा सकती है।
विमानन संचालनालय ने अब शुद्धिपत्र जारी कर निविदा की समयसीमा बढ़ा दी है। इसका मतलब है कि सरकार अभी भी इच्छुक कंपनियों को मौका देना चाहती है, लेकिन यदि दूसरी बार भी पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं मिलती, तो सरकार को टेंडर की शर्तों की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
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इसके लिए विमानन संचालनालय (Directorate of Aviation) ने करीब 105 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाला ग्लोबल टेंडर जारी किया था। लेकिन इतनी बड़ी राशि और आकर्षक दिखने वाले इस अनुबंध के बावजूद पहली बार में कोई भी कंपनी आगे नहीं आई। पहले इस टेंडर की आखरी तारीख 3 जून रखी गई थी।अब विभाग को शुद्धिपत्र जारी कर टेंडर की समयसीमा 17 जून तक बढ़ानी पड़ी है।
सरकार को कैसा हेलीकॉप्टर चाहिए
सरकार ने इसे वेट लीज मॉडल पर लेने का फैसला किया है। यानी हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने वाली कंपनी ही पायलट, इंजीनियर, तकनीकी स्टाफ, रखरखाव, बीमा और संचालन की पूरी जिम्मेदारी संभालेगी। सरकार केवल सेवा का उपयोग करेगी और तय शर्तों के अनुसार भुगतान करेगी।
पहली बार में क्यों नहीं मिली बोली
इसके अलावा सरकार ने कंपनियों के लिए अनुभव और वित्तीय क्षमता से जुड़ी शर्तें भी रखी हैं। एविएशन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि किसी टेंडर में पात्र कंपनियों की संख्या बहुत कम हो जाए तो प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और कई बार बोली प्रक्रिया ही सफल नहीं हो पाती।
क्या 105 करोड़ रुपए भी कम पड़ रहे हैं
इसके अलावा हेलीकॉप्टर को अधिकांश समय उपलब्ध रखना होगा, भले ही उसका उपयोग हो या न हो। ऐसे में कंपनियां केवल उड़ान घंटों की लागत नहीं, बल्कि पूरे संचालन तंत्र का खर्च जोड़कर निर्णय लेती हैं। यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियों ने आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन करने के बाद बोली लगाने में रुचि नहीं दिखाई होगी।
खरीदना सस्ता या किराये पर लेना
हालांकि खरीदने के बाद उसका रखरखाव, बीमा, पायलट, तकनीकी स्टाफ और अन्य संचालन खर्च अलग से जोड़ना पड़ता है।सरकार का तर्क यही है कि वेट लीज मॉडल में तकनीकी जिम्मेदारियां निजी कंपनी पर रहती हैं और सरकारी मशीनरी को अलग एविएशन सिस्टम खड़ा नहीं करना पड़ता। आलोचकों का कहना है कि यदि वर्षों तक लगातार किराए पर हेलीकॉप्टर लिया जाता रहेगा तो कुल खर्च खरीद लागत से कहीं ज्यादा हो सकता है।
सिर्फ वीआईपी सुविधा या प्रशासनिक जरूरत
विमानन संचालनालय ने अब शुद्धिपत्र जारी कर निविदा की समयसीमा बढ़ा दी है। इसका मतलब है कि सरकार अभी भी इच्छुक कंपनियों को मौका देना चाहती है, लेकिन यदि दूसरी बार भी पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं मिलती, तो सरकार को टेंडर की शर्तों की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
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