हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- केवल आशंका और अनुमान के आधार पर न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं चल सकती
Rajesh Lahoti | Mar 09, 2026, 23:03 IST
Photograph: (the sootr)
बिलासपुर हाईकोर्ट ने पूर्व चीफ जस्टिस और अन्य न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायतें रद्द कर दीं। कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका और अनुमान पर आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।
BILASPUR। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पूर्व चीफ जस्टिस, एक वर्तमान हाइकोर्ट जस्टिस और राज्य की उच्च न्यायिक सेवा के कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत रद्द कर दी है।
अदालत ने कहा है कि केवल आशंका और अनुमान के आधार पर न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं चल सकती। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल किसी को परेशान करने, डराने या व्यक्तिगत अथवा सेवा संबंधी शिकायतों को आपराधिक मुकदमे का रूप देने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामला वर्ष 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टोल प्लाजा पर शिकायतकर्ता के पति के साथ कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया। उस समय शिकायतकर्ता के पति सुकमा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। इस घटना को लेकर एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उस एफआईआर में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि इसमें पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों, तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक वर्तमान हाइकोर्ट जस्टिस की कथित साजिश शामिल थी।
हाइकोर्ट ने शिकायत की जांच करते हुए पाया कि इसमें साजिश से जुड़ा कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य नहीं है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी के तहत साजिश सिद्ध करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने के लिए स्पष्ट सहमति या योजना बनी थी।
खंडपीठ ने कहा कि शिकायत में ऐसे किसी भी ठोस तथ्य का उल्लेख नहीं है। शिकायतकर्ता ने स्वयं यह कहा कि आरोप पत्र दाखिल नहीं होने के पीछे साजिश होने की आशंका है लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं दी गई।
बिलासपुर। सूरजपुर जिले में मुख्यमंत्री डीएवी पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल पर शिक्षा का अधिकार के तहत पढ़ने वाले बच्चों से निर्माण कार्य और पुताई कराई गई। जिसे लेकर हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शिक्षा सचिव से शपथपत्र के साथ जवाब मांगा है। मामले में सुनवाई 11 मार्च को होगी।
सूरजपुर जिले के तिलसिवां में मुख्यमंत्री डीएवी पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के परिजनों ने प्रिंसिपल के खिलाफ शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रिंसिपल ने आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों से स्कूल में निर्माण कार्य और पुताई कराई। परिजनों ने शिकायत की थी कि, आरटीई के तहत पढ़ने वाले छात्रों से स्कूल में सीमेंट, रेत और अन्य सामान से निर्माण का काम कराया जा रहा है।
बच्चों से कक्षाओं की पुताई भी करवाई गई। स्टूडेंट्स और परिजनों का कहना है कि जो छात्र काम करने से मना करते हैं, उन्हें टीसी काटने की धमकी दी जाती है। हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को संज्ञान में लिया और जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की है।
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अदालत ने कहा है कि केवल आशंका और अनुमान के आधार पर न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं चल सकती। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल किसी को परेशान करने, डराने या व्यक्तिगत अथवा सेवा संबंधी शिकायतों को आपराधिक मुकदमे का रूप देने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामला वर्ष 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टोल प्लाजा पर शिकायतकर्ता के पति के साथ कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया। उस समय शिकायतकर्ता के पति सुकमा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। इस घटना को लेकर एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उस एफआईआर में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि इसमें पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों, तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक वर्तमान हाइकोर्ट जस्टिस की कथित साजिश शामिल थी।
साजिश से जुड़ा कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य नहीं
खंडपीठ ने कहा कि शिकायत में ऐसे किसी भी ठोस तथ्य का उल्लेख नहीं है। शिकायतकर्ता ने स्वयं यह कहा कि आरोप पत्र दाखिल नहीं होने के पीछे साजिश होने की आशंका है लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं दी गई।
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सूरजपुर जिले के तिलसिवां में मुख्यमंत्री डीएवी पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के परिजनों ने प्रिंसिपल के खिलाफ शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रिंसिपल ने आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों से स्कूल में निर्माण कार्य और पुताई कराई। परिजनों ने शिकायत की थी कि, आरटीई के तहत पढ़ने वाले छात्रों से स्कूल में सीमेंट, रेत और अन्य सामान से निर्माण का काम कराया जा रहा है।
बच्चों से कक्षाओं की पुताई भी करवाई गई। स्टूडेंट्स और परिजनों का कहना है कि जो छात्र काम करने से मना करते हैं, उन्हें टीसी काटने की धमकी दी जाती है। हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को संज्ञान में लिया और जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की है।
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