सरकारी स्कूल से रायपुर पुलिस कमिश्नर तक…सादगी से भरी आईपीएस डॉ. संजीव शुक्ला की कहानी
Harrison Masih | May 29, 2026, 19:37 IST
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रायपुर के साधारण परिवार से निकलकर आईपीएस अधिकारी डॉ. संजीव शुक्ला आज रायपुर के पहले पुलिस कमिश्नर बन गए हैं। कॉमर्स और रिसर्च बैकग्राउंड के बावजूद उन्होंने पुलिस सेवा को चुना और 1990 में डीएसपी के रूप में करियर शुरू किया।
रायपुर के एक साधारण शिक्षक परिवार में जन्मा वह लड़का, जिसने सरकारी स्कूल की बेंचों पर बैठकर पढ़ाई की… जिसने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए घंटों लाइब्रेरी में समय बिताया… जिसने बस्तर के थानों से लेकर राजधानी की कानून व्यवस्था तक हर चुनौती को करीब से देखा… वही आज रायपुर का पहला पुलिस कमिश्नर बन चुका है। यह कहानी है 2004 बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. संजीव शुक्ला की, जिनकी पहचान सिर्फ एक पुलिस अफसर के तौर पर नहीं, बल्कि बेहद शांत, रणनीतिक और जमीन से जुड़े अधिकारी के रूप में भी होती है। उनकी पूरी यात्रा यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सरकारी स्कूल से पढ़ने वाला छात्र भी प्रदेश की सबसे बड़ी पुलिस जिम्मेदारी तक पहुंच सकता है। उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2010 में राष्ट्रपति का सराहनीय सेवा पदक मिला। इसके बाद वर्ष 2023 में राष्ट्रपति का विशिष्ट सेवा पदक भी मिल चुका है।
डॉ. संजीव शुक्ला के पिता पीएल शुक्ला महासमुंद में शिक्षक थे, जबकि मां शांता शुक्ला कॉलेज में प्रोफेसर रहीं। घर में शिक्षा, अनुशासन और सादगी का माहौल था। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई और मेहनत का महत्व समझाया गया। उनकी दो बड़ी बहनें हैं, जिनमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट बनीं। परिवार में हमेशा पढ़ाई को सबसे बड़ी ताकत माना गया। यही वजह रही कि संजीव शुक्ला ने कभी भी आसान रास्ता चुनने की कोशिश नहीं की। आज के दौर में जब बड़े अफसरों की पढ़ाई महंगे स्कूलों और बड़े शहरों से जोड़ी जाती है, तब संजीव शुक्ला की कहानी अलग दिखाई देती है। उनकी पूरी स्कूली शिक्षा सरकारी संस्थानों में हुई। रायपुर के महाराणा प्रताप शासकीय स्कूल से उन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई की। इसके बाद छठवीं से बारहवीं तक उन्होंने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में अध्ययन किया। कॉलेज की पढ़ाई रायपुर के दुर्गा कॉलेज से हुई। उन्होंने बीकॉम और एमकॉम की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने पीएचडी भी पूरी की। यही कारण है कि उनके नाम के आगे डॉ.जुड़ा। कॉमर्स और रिसर्च बैकग्राउंड के बावजूद उनका झुकाव प्रशासनिक और पुलिस सेवा की ओर था। पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की।
सन 1988 में उन्होंने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी। उस समय उन्होंने वैकल्पिक विषय के तौर पर फॉरेन ब्रिटिश हिस्ट्री और यूरोपियन हिस्ट्री जैसे कठिन विषय चुने। पहले ही प्रयास में उन्होंने परीक्षा पास कर ली। डीएसपी पद के लिए उनकी रैंक तीसरी आई। यह उपलब्धि उस दौर में बेहद बड़ी मानी जाती थी। उनकी हाइट भी इंटरव्यू बोर्ड में चर्चा का विषय बनी। इंटरव्यू के दौरान उनसे मजाकिया अंदाज में पूछा गया कि लोग आपकी लंबाई देखकर आपको रास्ते में घूरते होंगे। संजीव शुक्ला ने बेहद सहजता और आत्मविश्वास से जवाब देकर इंटरव्यू बोर्ड को प्रभावित किया।
सन 1990 में उन्होंने डीएसपी के रूप में पुलिस सेवा जॉइन की। सागर पुलिस प्रशिक्षण अकादमी से ट्रेनिंग के बाद उनकी पहली पोस्टिंग बस्तर संभाग के किरंदुल थाने में बतौर ट्रेनी थाना प्रभारी हुई। यह वह दौर था जब बस्तर बेहद चुनौतीपूर्ण क्षेत्र माना जाता था। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और नक्सल प्रभाव वाले इलाके में काम करना हर अधिकारी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन डॉ.संजीव शुक्ला ने शुरुआत से ही फील्ड पुलिसिंग में खुद को साबित करना शुरू कर दिया। वे कोंटा में एसडीओपी रहे। इसके बाद भानुप्रतापपुर, भिलाई, इटारसी, नरसिंहपुर, कोरबा और भोपाल में सीएसपी के रूप में सेवाएं दीं। अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उनकी पोस्टिंग को काफी महत्वपूर्ण माना गया।
सन 2000 में जब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का विभाजन हुआ, तब कई अधिकारियों के सामने कैडर चुनने का सवाल था। डॉ. संजीव शुक्ला ने छत्तीसगढ़ कैडर चुना। यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, बल्कि उस प्रदेश से जुड़ाव का भी था, जहां उन्होंने पढ़ाई की और अपनी पहचान बनाई। विभाजन के बाद उनकी पोस्टिंग राजनांदगांव में हुई। वर्ष 2001 में डीएसपी से प्रमोशन के बाद उनकी पहली पोस्टिंग दुर्ग जिले में एडिशनल एसपी के रूप में हुई। वे लगातार करीब सात साल तक दुर्ग में पदस्थ रहे। पुलिस विभाग में किसी अधिकारी का इतने लंबे समय तक एक जिले में बने रहना आसान नहीं माना जाता। लेकिन उनकी कार्यशैली और प्रशासनिक पकड़ के कारण उन्हें लगातार जिम्मेदारियां मिलती रहीं। इस दौरान उन्होंने अपराध नियंत्रण, औद्योगिक सुरक्षा और संवेदनशील मामलों में प्रभावी भूमिका निभाई।
वर्ष 2008 में उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया। वे पुलिस अधीक्षक मुख्यमंत्री सुरक्षा बनाए गए। मुख्यमंत्री सुरक्षा की जिम्मेदारी बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसमें सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि हर गतिविधि पर पैनी नजर रखना भी जरूरी होता है। डॉ. संजीव शुक्ला करीब ढाई साल तक इस पद पर रहे। उन्हें वर्ष 2013 में आईपीएस अवार्ड मिला और 2004 बैच आवंटित हुआ। वे जशपुर और राजनांदगांव जैसे महत्वपूर्ण जिलों के पुलिस अधीक्षक रह चुके थे। जशपुर में उन्होंने डेढ़ साल तक पुलिस अधीक्षक के रूप में काम किया। इसके बाद वे राजनांदगांव के एसपी बनाए गए और लगभग तीन साल तक वहां पदस्थ रहे। राजनांदगांव उस समय नक्सल और सीमा सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील जिला माना जाता था। यहां उनकी कार्यशैली की काफी चर्चा हुई। इसके बाद वे रायगढ़ के पुलिस अधीक्षक बनाएं गए। इसके बाद वे रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और दुर्ग के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक भी रहे। हर जिले में उनकी पहचान एक सख्त लेकिन शांत अधिकारी की बनी।
दुर्ग एसएसपी रहने के बाद उनकी पोस्टिंग उत्तर बस्तर रेंज कांकेर में उप पुलिस महानिरीक्षक यानी डीआईजी के रूप में हुई। नक्सल प्रभावित इलाके में पुलिसिंग किसी युद्ध से कम नहीं मानी जाती। यहां लगातार रणनीति, धैर्य और स्थानीय नेटवर्क की जरूरत होती है। डॉ.संजीव शुक्ला ने यहां भी जमीनी स्तर पर पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया।
आईजी प्रमोट होने के बाद उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस राज्य पुलिस अकादमी के डायरेक्टर भी रहे। यहां उन्होंने नई पीढ़ी के पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण और आधुनिक पुलिसिंग पर काम किया। इसके बाद वे स्टेट सीआईडी के पुलिस महानिरीक्षक बनाए गए। संवेदनशील मामलों की मॉनिटरिंग और जांच में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। दिसंबर 2023 में प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद जनवरी 2024 में उन्हें बिलासपुर रेंज का पुलिस महानिरीक्षक नियुक्त किया गया। करीब दो साल तक उन्होंने बिलासपुर रेंज की कमान संभाली। कानून व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और प्रशासनिक अनुशासन को लेकर उनकी कार्यशैली की काफी चर्चा हुई।
रायपुर में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद सरकार ने संजीव शुक्ला को राजधानी का पहला पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया। यह जिम्मेदारी बेहद बड़ी मानी जा रही है, क्योंकि राजधानी रायपुर तेजी से बढ़ता हुआ शहर है। साइबर अपराध, ट्रैफिक, वीआईपी मूवमेंट और शहरी कानून व्यवस्था जैसी चुनौतियां यहां अलग स्तर की हैं। सरकार ने ऐसे अधिकारी पर भरोसा जताया, जिसने थाने से लेकर पुलिस मुख्यालय तक हर स्तर पर काम किया हो।
डॉ. संजीव शुक्ला को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए कई बड़े सम्मान भी मिल चुके हैं। उन्हें वर्ष 2010 में राष्ट्रपति का सराहनीय सेवा पदक मिला। इसके बाद वर्ष 2023 में राष्ट्रपति का विशिष्ट सेवा पदक भी प्रदान किया गया। मानव तस्करी के खिलाफ प्रभावी कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2015 में एफआईसीसीआई नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें डीजीपी आईटीबीपी और डीजी डिस्क जैसे सम्मान भी प्राप्त हुए।
डॉ. संजीव शुक्ला की पहचान उन अफसरों में होती है, जो बिना ज्यादा प्रचार के काम करना पसंद करते हैं। वे कम बोलते हैं, लेकिन फैसले स्पष्ट रखते हैं।सरकारी स्कूल से निकलकर पीएचडी करने वाला छात्र… जिसने बस्तर के थानों में पुलिसिंग सीखी… जिसने नक्सल इलाकों में काम किया… जिसने मुख्यमंत्री सुरक्षा संभाली… और जिसने प्रदेश के बड़े जिलों की कानून व्यवस्था देखी… वही आज रायपुर पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम का सबसे बड़ा चेहरा है। डॉ. संजीव शुक्ला की कहानी सिर्फ एक आईपीएस अफसर की नहीं, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जो बताती है कि साधारण शुरुआत भी असाधारण मंजिल तक पहुंच सकती है।
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