गांव के सरकारी स्कूल से छत्तीसगढ़ के डीजीपी तक… आईपीएस अरुण देव गौतम की कहानी
Rajesh Lahoti | May 16, 2026, 18:05 IST
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अरुण देव गौतम को छत्तीसगढ़ पुलिस का नया डीजीपी बनाया गया है। यूपी के छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों, संवेदनशील चुनावों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में तीन दशक का अनुभव हासिल किया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई सम्मान मिले हैं।
छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में जब भी शांत, रणनीतिक और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले अफसरों की चर्चा होती है, तो उनमें एक नाम सबसे ऊपर आता है अरुण देव गौतम। वे उन अफसरों में गिने जाते हैं जिन्हें सरकार अक्सर सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए चुनती रही। नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर संवेदनशील चुनावों तक और पुलिस मुख्यालय से लेकर गृह विभाग तक अरुण देव गौतम का पूरा सफर कठिन फैसलों और बड़े ऑपरेशनों के बीच गुजरा है। अरुण देव अब छत्तीसगढ़ के डीजीपी बनाए गए हैं। यह सिर्फ एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि तीन दशक लंबे अनुभव और भरोसे की पहचान भी है।
उत्तरप्रदेश के कानपुर के पास फतेहपुर जिले के छोटे से गांव अभयपुर में 2 जुलाई 1967 को जन्मे अरुण देव गौतम का शुरुआती जीवन बेहद साधारण माहौल में बीता। गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू हुई। संसाधन सीमित थे, लेकिन पढ़ाई के प्रति लगन मजबूत थी। दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई उन्होंने इलाहाबाद के राजकीय इंटर कॉलेज से पूरी की। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया। राजनीति शास्त्र में एमए करने के बाद उनकी अकादमिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय कानून में एमफिल की डिग्री हासिल की। किताबों और प्रशासनिक समझ का यही मिश्रण आगे चलकर उनकी पुलिसिंग शैली की पहचान बना।
अरुण देव गौतम ने यूपीएससी परीक्षा पास कर 1992 बैच में आईपीएस सेवा जॉइन की। 12 अक्टूबर 1992 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपनी सर्विस शुरू की। उस समय उनका कैडर मध्यप्रदेश था, क्योंकि तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था। प्रशिक्षु आईपीएस के रूप में उनकी पहली महत्वपूर्ण पोस्टिंग जबलपुर में हुई। इसके बाद वे बिलासपुर में सीएसपी बने। कवर्धा में एसडीओपी और भोपाल में एडिशनल एसपी के रूप में भी उन्होंने काम किया। मध्यप्रदेश पुलिस की 23वीं बटालियन के कमांडेंट रहते हुए उन्होंने फोर्स मैनेजमेंट और ऑपरेशनल सिस्टम पर मजबूत पकड़ बनाई। एसपी के रूप में उनका पहला जिला राजगढ़ था। असली पहचान उन्हें तब मिली जब वर्ष 2000 में अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर चुन लिया।
छत्तीसगढ़ में उनकी पोस्टिंग का इतिहास बताता है कि सरकार उन्हें अक्सर उन्हीं जगहों पर भेजती थी जहां हालात सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होते थे। वे कोरिया, रायगढ़, जशपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और बिलासपुर जैसे जिलों के एसपी रहे। हर जिले में उनकी कार्यशैली अलग दिखी, लेकिन एक चीज समान रही सख्त प्रशासन और शांत रणनीति। वर्ष 2009 में राजनांदगांव में हुए नक्सली हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में एसपी विनोद चौबे समेत 29 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। उस दौर में राजनांदगांव पुलिस का मनोबल टूट चुका था। ऐसे समय में अरुण देव गौतम को वहां डीआईजी बनाकर भेजा गया। यह पोस्टिंग सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं थी, बल्कि एक संकटग्रस्त जिले को दोबारा खड़ा करने की जिम्मेदारी थी।
![Arun Dev Gautam]()
25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी हमले ने छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था दोनों को हिला दिया था। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या के बाद बस्तर की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी। इसी दौर में अरुण देव गौतम को बस्तर आईजी बनाकर भेजा गया। कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव भी होने थे। नक्सल खतरे के बीच चुनाव कराना आसान नहीं था, लेकिन उस समय सुरक्षा रणनीति और फोर्स मैनेजमेंट में उनकी भूमिका को काफी अहम माना गया।
मैदान में लंबा अनुभव लेने के बाद अरुण देव गौतम ने पुलिस मुख्यालय में भी कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं। वे सीआईडी, प्रशासन, वित्त एवं योजना, मुख्यमंत्री सुरक्षा जैसे विभागों में पदस्थ रहे। आईजी बनने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स की जिम्मेदारी संभाली। फिर बिलासपुर रेंज के आईजी बने। रेलवे, प्रशिक्षण, भर्ती और ट्रैफिक शाखा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व भी उन्होंने किया। पिछले कुछ वर्षों में वे राज्य के गृह सचिव के तौर पर भी बेहद प्रभावशाली भूमिका में रहे। इसके साथ ही जेल और परिवहन विभाग का अतिरिक्त दायित्व भी उनके पास रहा।
अरुण देव गौतम सिर्फ राज्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वर्ष 2002 में संघर्षग्रस्त कोसोवा में संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत उन्होंने काम किया। वहां सेवा देने के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र पदक से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वर्ष 2010 में उन्हें सराहनीय सेवाओं के लिए भारतीय पुलिस पदक मिला। फिर 2018 में विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया।
आईपीएस अरुण देव गौतम उन अफसरों में गिने जाते हैं जो कम बोलते हैं, लेकिन फैसले स्पष्ट लेते हैं। उनकी छवि एक ऐसे अधिकारी की रही है जो फाइल और फील्ड दोनों पर समान पकड़ रखते हैं। गांव के सरकारी स्कूल से निकलकर देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में जगह बनाना, फिर नक्सल प्रभावित राज्यों में तीन दशक तक काम करना और अंततः राज्य पुलिस की कमान हासिल करना … यह सफर सिर्फ एक अफसर की कहानी नहीं, बल्कि लगातार अनुशासन, धैर्य और प्रशासनिक क्षमता का उदाहरण भी है।
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IPS Arun Dev Gautam
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जहां संकट, वहां अरुण देव गौतम
Arun Dev Gautam
झीरम कांड के बाद बस्तर की कमान
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डीजीपी अरुण देव गौतम
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