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News in Short
- पहलाजानी IVF सेंटर में बच्चा बदलने का आरोप।
- सुप्रीम कोर्ट ने FIR कर जांच के दिए निर्देश।
- HC के फैसले को पलट रायपुर SSP को निर्देश।
- रायपुर CMHO ने जांच के लिए बनाई थी कमेटी।
- जांच कमेटी के 6 डॉक्टरों पर पक्षपात का लगा आरोप।
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ में चाइल्ड स्वेपिंग के आरोप मामले में SC ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने रायपुर के SSP को स्पष्ट निर्देश दिया है कि पहले मामले में जुड़े सभी लोगों पर FIR दर्जकर जांच की जाए। कोर्ट के अनुसार मामला पहली नजर में चाइल्ड स्वैपिंग से जुड़ा लग रहा है, जो मानवाधिकार का उल्लंघन है। पीड़ित पक्ष के वकील का आरोप है, मेडिकल बोर्ड ने टेस्ट ट्यूब बेबी एंड सेरोगेसी सेंटर के दस्तावेजो के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। पीड़ित पक्ष की नहीं सुनी। रायपुर SSP डॉ. लाल उमेंद सिंह ने कहा है कि कोर्ट के निर्देश के आधार पर कार्रवाई होगी।
रायपुर एसएसपी करेंगे जांच
याचिकाकर्ता के वकील जितेंद्र शर्मा के अनुसार मामले में स्थानीय स्तर पर लीपापोती की गई। जो रिपोर्ट तैयार किया गया उसके आधार पर हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता को न्याय नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नवजात बच्चे की अदला-बदली के आरोपों पर FIR की मांग खारिज कर दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने रायपुर SSP को इससे जुड़े सभी लोगों के खिलाफ FIR करके जांच करने के निर्देश दिए है।
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क्या है पूरा मामला?
मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के माता लक्ष्मी नर्सिंग होम एवं पहलजनी टेस्ट ट्यूब बेबी और सरोगेसी सेंटर से जुड़ा है। याचिकाकर्ता उषा सिंह ने आरोप लगाया कि IVF प्रक्रिया के बाद 25 दिसंबर 2023 को उन्होंने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। इनमें एक लड़का और एक लड़की थी। आरोप है कि अस्पताल में नवजात बेटे की अदला-बदली कर दी गई और उसकी जगह एक अन्य बच्ची सौंप दी गई। उषा सिंह का कहना है कि क्लिनिक झूठे दस्तावेज पेश कर रहा है।
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रिपोर्ट से बढ़ा संदेह
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि DNA जांच में एक बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता से मेल नहीं खाता। वह बच्चा न तो मां का जैविक संतान है, न पिता का। इस आधार पर उन्होंने एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट और तथ्यों के आधार पर याचिका खारिज की।
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पक्षपात करने का लगा आरोप
बच्चा बदलने का आरोप रायपुर CMHO तक पहुंचा। CMHO ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजीव वोरा की अध्यक्षता में 6 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम गठित की। कमेटी ने जांच के दौरान DNA रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। आरोप है कि डॉक्टरों ने IVF सेंटर के दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की, जो सेंटर के पक्ष में थी।
दस्तावेजों में भी छेड़छाड़ का आरोप
HC के आदेश से असंतुष्ट होकर पीड़ित दंपती ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने बाहरी डोनर के स्पर्म के उपयोग की सहमति नहीं दी थी। अस्पताल द्वारा पेश किया गया सहमति पत्र संदिग्ध व कथित रूप से छेड़छाड़ किया हुआ है। उनका आरोप है कि पहलाजानी क्लीनिक में अपने बचाव में दस्तावेजों में भी छेड़छाड़ की है।
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अस्पताल पक्ष की दलील
SC में अस्पताल और अन्य प्रतिवादियों ने कहा कि माता-पिता की सहमति से बाहरी डोनर का उपयोग किया गया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शिकायत देर से की गई, जिससे यह रणनीति प्रतीत होती है। अस्पताल ने कहा कि डॉक्टरों का बच्चे की अदला-बदली करने का कोई कारण या लाभ नहीं था।
बड़े रैकेट का हो सकता है खुलासा
शिकायतकर्ता उषा सिंह का कहना है कि लंबी लड़ाई के बाद आया इस आदेश से हममे न्याय की उम्मीद जगी है। ये हमारे मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है। सही तरीके से जांच होगी तो न केवल हमें न्याय मिलेगा बल्कि एक बड़े रैकेट का भी खुलासा हो जाएगा।
23 जनवरी से बदलेगी व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार रायपुर एसपी मामले की एफआईआर कर जांच करेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 23 जनवरी से रायपुर में पुलिस व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। जिसमें रायपुर मे आयुक्त प्रणाली लागू हो जाएगी। रायपुर एसपी जैसा पोस्ट नहीं होगा। जिसके आधार पर एफआईआर प्रक्रिया फंस सकती है। हालांकि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस व्यवस्था से कुछ खास फर्क नहीं पड़ने वाला। हो सकता है पदनाम को लेकर कुछ समय लगे। लेकिन पुलिस प्रमुख को एफआईआर करवानी ही होगी।
दूरगामी असर वाला फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आईवीएफ और सरोगेसी से जुड़े मामलों में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे निजी अस्पतालों और फर्टिलिटी सेंटर्स की जवाबदेही बढ़ेगी। साथ ही, एआरटी एक्ट के सख्त अनुपालन का रास्ता भी खुलेगा। यह आदेश उन माता-पिता के लिए उम्मीद की किरण है, जो चिकित्सा लापरवाही या अनियमितताओं के शिकार होते हैं।
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