प्लेसमेंट कर्मचारी चलाएंगे मंत्रालय? भर्ती नहीं, बैकडोर एंट्री से भरेंगे खाली पद

VINAY VERMA | Jun 19, 2026, 16:13 IST
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छत्तीसगढ़ मंत्रालय में बाबुओं की कमी 2026
छत्तीसगढ़ मंत्रालय में बाबुओं की कमी 2026

छत्तीसगढ़ मंत्रालय में बाबुओं की भारी कमी है। 245 पद खाली हैं, जिन्हें परीक्षा की जगह प्लेसमेंट और संविदा के जरिए भरने की तैयारी चल रही है। कर्मचारी इसे बैकडोर एंट्री का खेल बता रहे हैं। पूरी प्रक्रिया पर विवाद खड़ा हो गया है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • जुलाई 2025 में भेजी गई भर्ती अटकी
  • व्यापम 11 महीने में परीक्षा नहीं करा पाया
  • आउटसोर्सिंग के नाम पर बैकडोर एंट्री का खेल
  • चहेती प्लेसमेंट एजेंसी को फायदा पहुंचाने की तैयारी

छत्तीसगढ़ मंत्रालय में बढ़ता संकट

छत्तीसगढ़ मंत्रालय में कर्मचारियों का संकट गहराता जा रहा है। लगभग 83 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। 11 महीने पहले मंत्रालय ने व्यापम को भर्ती का प्रस्ताव भेजा था। व्यापम ने आवेदन मंगवाए, लेकिन परीक्षा लेकर प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका।

अब इसे ही आधार बनाकर सरकार संविदा और आउटसोर्सिंग के जरिए बाबुओं की भर्ती करने जा रही है। कर्मचारी और अधिकारियों में आक्रोश है। इधर सरकार सारा ठीकरा व्यापम पर फोड़कर अपना बचाव कर रही है।

कितने पद खाली?

कनिष्ठ सचिवालय सहायक के सीधी भर्ती के 293 स्वीकृत पदों में केवल 48 कर्मचारी कार्यरत हैं। 245 पद खाली पड़े हैं। यानी सिर्फ 17 प्रतिशत स्टाफ के सहारे मंत्रालय चल रहा है।

इनमें से 145 पदों को संविदा और आउटसोर्सिंग से भरने की तैयारी चल रही है। सवाल यह है कि जब लंबे समय से पद खाली थे, तब नियमित भर्ती समय पर क्यों नहीं कराई गई?

11 महीने पहले भेजा प्रस्ताव

सरकार का कहना है कि जुलाई 2025 में 100 पदों की भर्ती का प्रस्ताव व्यापम को भेजा गया था। करीब 11 महीने गुजर गए। भर्ती प्रक्रिया आज भी अधूरी है। अभ्यर्थी इंतजार कर रहे हैं।

सवाल यही उठ रहा है कि व्यापम भी सरकार के अधीन है। यदि परीक्षा नहीं हो पाई तो जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या यह प्रशासनिक विफलता नहीं मानी जानी चाहिए?

नियमित भर्ती छोड़ संविदा का रास्ता

अब सरकार 145 पदों को संविदा और आउटसोर्सिंग से भरने की तैयारी कर रही है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इस संबंध में बैठक भी हो चुकी है। तर्क दिया जा रहा है कि मंत्रालय का काम प्रभावित हो रहा है।

इसलिए वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि यदि नियमित भर्ती ही अंतिम समाधान है, तो फिर संविदा की जरूरत क्यों पड़ रही है?

क्या पैसे बचाने की कवायद?

सूत्रों के अनुसार आउटसोर्स कर्मचारियों को 10 से 15 हजार रुपए तक भुगतान होगा। वहीं नियमित कर्मचारी को 45 से 50 हजार रुपए तक वेतन देना होगा। यानी सरकार का खर्च काफी कम हो जाएगा।

लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है। क्योंकि मंत्रालय कोई सामान्य कार्यालय नहीं है। यहां कैबिनेट नोट बनते हैं। गोपनीय फाइलें संचालित होती हैं। नीतियों और फैसलों का मसौदा तैयार होता है।

ऐसे में क्या कुछ हजार रुपए बचाने के लिए गोपनीयता से समझौता किया जाएगा? क्या संवेदनशील काम अस्थायी कर्मचारियों को सौंपना उचित होगा?

प्रमोशन चैनल पर भी खतरा

मंत्रालयीन कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र सिंह राजपूत का कहना है कि कनिष्ठ सचिवालय सहायक मंत्रालय का आधारभूत पद है। यहीं से कर्मचारी आगे बढ़ते हैं। वरिष्ठ सचिवालय सहायक, अनुभागीय अधिकारी और अवर सचिव बनते हैं।

यही पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की नींव है। यदि संविदा व्यवस्था बढ़ती है तो प्रमोशन चैनल प्रभावित होगा। भविष्य में उच्च पदों पर कर्मचारियों की कमी हो सकती है। गोपनीयता भंग होने का खतरा भी बढ़ सकता है।

प्लेसमेंट एजेंसी के लिए पिछला दरवाजा?

प्रदेश अधिकारी कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष करन सिंह अटेरिया का कहना है कि समय पर भर्ती करवाना शासन की जिम्मेदारी है। ऐसा नहीं होता तो यह शासन की नाकामी है।

उनका कहना है कि प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए भर्ती से सरकार और एजेंसी को फायदा हो सकता है। लेकिन युवाओं और कर्मचारियों का नुकसान होगा। भर्ती परीक्षा ही सबसे पारदर्शी रास्ता है।

युवाओं की जगह 70 साल के रिटायर्ड क्यों?

प्रदेश में लाखों युवा नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में रिटायर्ड कर्मचारियों को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? इसका जवाब सरकार को देना होगा।

प्रस्ताव में 70 वर्ष तक के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को संविदा पर रखने का विकल्प भी रखा गया है। यहीं से विवाद और गहरा गया है। कई कर्मचारी नेता इसे बैकडोर एंट्री का रास्ता बता रहे हैं।

अस्थायी व्यवस्था या स्थायी खेल?

सरकार कह रही है कि यह नियुक्तियां तब तक रहेंगी, जब तक नियमित भर्ती पूरी नहीं हो जाती। दूसरी तरफ अच्छा काम करने वालों का कार्यकाल बढ़ाने की बात भी कही जा रही है।

यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। यहीं से संदेह पैदा हो रहा है कि कहीं अस्थायी व्यवस्था को स्थायी मॉडल बनाने की तैयारी तो नहीं है।

निष्कर्ष

मंत्रालय में कर्मचारियों की कमी वास्तविक है। लेकिन समाधान के नाम पर संविदा और आउटसोर्सिंग नए विवाद खड़े कर रही है।

अब सरकार को साफ करना होगा कि यह व्यवस्था मजबूरी है या बैकडोर भर्ती का नया मॉडल। क्योंकि सवाल केवल भर्ती का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और गोपनीयता का भी है।

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