एमपी-सीजी, राजस्थान में पढ़ाई पर जीडीपी का महज 3 फीसदी खर्चा, तीनों राज्यों के 14 परसेंट स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट ही नहीं

Arun Tiwari | Apr 14, 2026, 15:03 IST
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मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। नई रिपोर्ट के अनुसार इन राज्यों में शिक्षा पर GSDP का केवल 3-4% ही खर्च किया जा रहा है, जो गुणवत्ता सुधार के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।

Raipur. नया शिक्षा सत्र शुरू हुआ है, इसलिए हम बात कर रहे हैं पढ़ाई-लिखाई की। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में शिक्षा की हालत बहुत ठीक नहीं है। यह सवाल लोकसभा में भी उठ चुका है। द सूत्र ने इन तीनों राज्यों की कुछ बेसिक बातों को लेकर पड़ताल की।

बुनियादी मुद्दे यानी पढ़ाई-लिखाई पर कितना खर्च हो रहा है। क्या सभी स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट हैं। ऐसे कितने स्कूल हैं जो सिंगल टीचर के हवाले हैं। द सूत्र की पड़ताल में सामने आया है कि राज्य की जीएसडीपी का तीन से चार प्रतिशत ही पढ़ाई पर खर्च हो रहा है।

वहीं 13 से 14 प्रतिशत ऐसे स्कूल हैं जहां पर गर्ल्स टॉयलेट या तो नहीं है या फिर हैं तो चालू हालत में नहीं। हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां पर सिंगल टीचर ही है। यह जानकारी 2021 के यूडाइस के आंकड़ों के आधार पर सामने आई है।

सरकारी स्कूलों की हकीकत :

नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारी स्कूल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी, सीमित बजट और शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएं इन राज्यों की शिक्षा व्यवस्था की कमजोर तस्वीर पेश कर रही हैं। हालात ऐसे हैं कि पढ़ाई पर खर्च कम है और कई स्कूल अब भी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं।

द सूत्र की पड़ताल में सामने आया है कि इन तीनों राज्यों में शिक्षा पर जीएसडीपी (GSDP) का महज 3 से 4 प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम राशि में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना मुश्किल है।

शिक्षा पर जीएसडीपी का इतना खर्च :

छत्तीसगढ़ - 4.61 प्रतिशत
एमपी - 3.22 प्रतिशत
राजस्थान - 3.61 प्रतिशत

लड़कियों के लिए टॉयलेट की कमी :

सबसे चिंताजनक स्थिति स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट को लेकर सामने आई है। तीनों राज्यों में 12 से 14 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां या तो लड़कियों के लिए शौचालय ही नहीं है या फिर वे उपयोग के लायक नहीं हैं। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में 12 से 14 प्रतिशत स्कूल इस समस्या से जूझ रहे हैं।

यह स्थिति खासतौर पर छात्राओं की शिक्षा पर सीधा असर डालती है। कई बार इस वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं, जिससे ड्रॉपआउट रेट बढ़ने का खतरा बना रहता है।

इतने स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट नहीं :
छत्तीसगढ़ - 12 प्रतिशत
एमपी - 14 प्रतिशत
राजस्थान - 13 प्रतिशत

सिंगल टीचर स्कूलों की बड़ी संख्या :

शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक ही शिक्षक के भरोसे पूरी पढ़ाई चल रही है। आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा एक-शिक्षकीय स्कूल मध्यप्रदेश में हैं। उसके बाद राजस्थान का नंबर आता है। छत्तीसगढ़ में स्कूल और शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण के बाद सिंगल टीचर स्कूल की संख्या कम हो गई है।

सरप्लस शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में भेजा गया है जो शिक्षक विहीन थे या जहां पर शिक्षकों की कम संख्या थी। यह स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर असर डालती है। एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं को संभालना पड़ता है, जिससे छात्रों को उचित ध्यान नहीं मिल पाता।

सिंगल टीचर स्कूल :
छत्तीसगढ़ - 1861
एमपी - 16630
राजस्थान - 10878

स्कूल और शिक्षकों का अनुपात :

तीनों राज्यों में स्कूलों और शिक्षकों की संख्या भी एक महत्वपूर्ण संकेत देती है। छत्तीसगढ़ के स्कूलों में 1 लाख 88 हजार शिक्षक हैं। मध्यप्रदेश के स्कूलों में 3 लाख 93 हजार शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि राजस्थान में 4 लाख 45 हजार शिक्षक हैं।

इसके बाद भी बड़े पैमाने पर शिक्षकों की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के 57 हजार पद खाली हैं। कई ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में स्कूल अब भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं।

इतने स्कूल और इतने टीचर :

छत्तीसगढ़ - 48827 स्कूल, 188578 शिक्षक
एमपी - 92250 स्कूल, 393210 शिक्षक
राजस्थान - 70155 स्कूल, 445073 शिक्षक

विदेशों की ओर रुख कर रहे छात्र :

शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों के बीच एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है। 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। इस दौरान 10,493 छात्र बांग्लादेश, 8,950 ऑस्ट्रेलिया और 2,796 छात्र आर्मेनिया पढ़ने के लिए गए। यह आंकड़े बताते हैं कि बेहतर शिक्षा और अवसरों की तलाश में छात्र देश के बाहर भी जा रहे हैं, जो घरेलू शिक्षा व्यवस्था के प्रति भरोसे पर सवाल खड़े करता है।

2019-20 में यहां पढ़ने गए छात्र :

बांग्लादेश - 10493
ऑस्ट्रेलिया - 8950
आर्मेनिया - 2796

निष्कर्ष :

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बजट बढ़ाने के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। स्कूलों में शौचालय, पर्याप्त शिक्षक और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।

सरकारी स्कूलों की यह स्थिति साफ संकेत देती है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा की गुणवत्ता और प्रभावित हो सकती है। नए सत्र के साथ उम्मीद की जा रही है कि सरकारें इन मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान देंगी और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।

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