1500 साल पुरानी विरासत सिरपुर के लिए वैश्विक पहचान की पहली सीढ़ी, अब विश्व धरोहर बनने की तैयारी
VINAY VERMA | Oct 21, 2026, 16:51 IST
यूनेस्को की सूची में शामिल हुआ सिरपुर
Raipur. छत्तीसगढ़ की प्राचीन नगरी सिरपुर अब दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। महासमुंद जिले में महानदी के तट पर बसे सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है। यह विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा नहीं है, लेकिन उस दिशा में एक अहम पड़ाव जरूर है।
अब सवाल यह है कि करीब डेढ़ हजार साल पुरानी इस ऐतिहासिक नगरी को वैश्विक पहचान दिलाने वाली खासियतें क्या हैं और इस उपलब्धि से छत्तीसगढ़ को क्या फायदा मिल सकता है?
सिरपुर को प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तियों और अनूठी स्थापत्य कला के कारण खास माना जाता है। प्राचीन समय में श्रीपुर के नाम से पहचाना जाने वाला यह नगर दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। पांडुवंशी शासकों के शासनकाल में यहां धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और व्यापारिक गतिविधियां फली-फूलीं। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं के अवशेष एक साथ मिलते हैं। यही धार्मिक सहअस्तित्व सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।
सातवीं शताब्दी का लक्ष्मण मंदिर सिरपुर की सबसे चर्चित ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। ईंटों से बना यह मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। मंदिर की नक्काशी, प्रवेश द्वार और पौराणिक दृश्यों का शिल्प तत्कालीन कलाकारों की दक्षता दिखाता है। इसके अलावा सुरंग टीला, गंधेश्वर महादेव मंदिर, राम मंदिर और प्राचीन राजमहल के अवशेष इस नगरी के लंबे इतिहास की कहानी बताते हैं।
सिरपुर कभी बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा। यहां आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार और तीवरदेव महाविहार जैसे स्थलों के अवशेष मिले हैं। पुरातात्विक उत्खननों में दो हजार से अधिक पुरावशेष मिलने का उल्लेख है। इनमें प्रतिमाएं, सिक्के, आभूषण बनाने के उपकरण, मिट्टी के बर्तन और दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं शामिल हैं। ये अवशेष बताते हैं कि सिरपुर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कला, शिक्षा, व्यापार और शहरी जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र था।
यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि सिरपुर को विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा मिल गया है। यह उस प्रक्रिया का शुरुआती महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें किसी स्थल की वैश्विक महत्व वाली विशेषताओं को सामने रखा जाता है। आगे विस्तृत नामांकन, संरक्षण की योजना और तय मानकों के अनुरूप मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसलिए असली चुनौती अब सिरपुर की विरासत को सुरक्षित रखने और उसकी अंतरराष्ट्रीय अहमियत को ठोस प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करने की है।
अगर सिरपुर को आगे चलकर विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है, तो देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण बढ़ सकता है। इससे होटल, होमस्टे, परिवहन, स्थानीय खानपान, हस्तशिल्प और गाइड सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। सिरपुर को बौद्ध पर्यटन परिपथ से जोड़ने की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं। हालांकि, इन फायदों के लिए बेहतर सड़क संपर्क, साफ-सफाई, पर्यटक सुविधाएं, प्रचार और विरासत संरक्षण पर लगातार काम करना होगा।
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत सिरपुर के ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण कर चुके हैं। उन्होंने इसके संरक्षण और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयासों को प्राथमिकता देने की बात कही थी। अब अस्थायी सूची में जगह मिलने के बाद निगाहें आगे की कार्रवाई पर रहेंगी। क्या सिरपुर को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल बनाने के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित होंगी? क्या पुरातात्विक धरोहरों को नुकसान से बचाने के लिए मजबूत प्रबंधन होगा? सिरपुर की असली सफलता तभी होगी, जब वैश्विक पहचान के साथ उसकी विरासत सुरक्षित रहे और स्थानीय लोगों को भी इसका फायदा मिले।
आखिर सिरपुर ही क्यों खास
लक्ष्मण मंदिर की अलग पहचान
बौद्ध विरासत भी मजबूत आधार
अस्थायी सूची का मतलब समझिए
पर्यटन बढ़ा तो रोजगार भी
पहचान के साथ जिम्मेदारी भी
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