छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: गिनती जनता की, खेल सिस्टम का

Rajesh Lahoti | May 02, 2026, 17:50 IST
Share
weekly-analysis-systems-mistakes-compensation-census
weekly-analysis-systems-mistakes-compensation-census

छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते गिनती तो लोगों की शुरू हुई, लेकिन खेल जमीन और पैसों का चलता रहा। कहीं सस्ता खाना खत्म हुआ तो कहीं सिस्टम की महंगी गलतियां सामने आईं। पुलिस अपनी ही गाड़ी के पीछे दौड़ती रही तो दवा लड़खड़ाती रही और फाइलें अपना रास्ता खुद बनाती रहीं।

इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ खबरें नहीं थीं। यह सिस्टम का लाइव प्रदर्शन था। एक तरफ सरकार घर-घर जाकर लोगों की गिनती करने निकली, तो दूसरी तरफ जमीन के टुकड़ों में मुआवजे की गिनती बढ़ती रही। कहीं कैंटीन में सब्सिडी खत्म हुई तो बहस शुरू हो गई, तो कहीं स्कूल के पेपर में एक शब्द ने पूरी पढ़ाई पर सवाल खड़ा कर दिया। पुलिस अपराधी पकड़ने निकली तो खुद कहानी बन गई, और अस्पतालों में सरकारी दवा भरोसे के लायक नहीं रही। इन सबके पीछे है वो सिस्टम जो अपनी हरकतों से रोजाना सरकारी व्यवस्था का मजाक बनाता है।

ड्यूटी से भागने नहीं देंगे

इस हफ्ते की शुरुआत ही आदेश से हुई और वो भी ऐसा आदेश जिसमें ना शब्द को ही सिस्टम से डिलीट कर दिया गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ कह दिया जनगणना ड्यूटी कोई विकल्प नहीं, आदेश है। और आदेश में बहस नहीं होती, पालन होता है। बेमेतरा के एक कर्मचारी ने सोचा था कि अदालत में जाकर राहत मिल जाएगी। लेकिन अदालत ने राहत नहीं, जिम्मेदारी थमा दी। मैसेज साफ़ था। सरकारी नौकरी है तो सरकार कभी-कभी आपको घर-घर भी भेजेगी ही। फिर चाहे वो चुनाव का मामला हो या फिर गिनती करने का। दिलचस्प बात यह है कि हर घर, हर दरवाजा, हर परिवार यानी सबकी गिनती होगी। अगर कोई कर्मचारी सोच रहा था कि सर, तबियत खराब है या सर, शादी में जाना है, तो उसके लिए भी सरकार ने स्पष्ट लाइन तैयार करके रखी है। डिजिटल जमाने में सेल्फ गणना का विकल्प जरूर दिया गया है, लेकिन असली भरोसा अब भी उस कर्मचारी पर है, जो धूप में पसीना बहाकर दरवाजा खटखटाएगा। सिस्टम ने साफ कर दिया कि अब काम टालने का नहीं, करने का वक्त है।

सरकार का गूगल फॉर्म

जनगणना के बाद सिस्टम को शायद एहसास हुआ कि गिनती सिर्फ लोगों की नहीं, पेंडिंग सरकारी मामलों की भी करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ के 900 से ज्यादा केस पेंडिंग हैं और अब इन्हें निपटाने के लिए स्पेशल लोक अदालत की तैयारी शुरू हो गई है। मुख्य सचिव का आदेश भी दिया - केस खोजो, छांटो और खत्म करो। इसके लिए सबसे आधुनिक हथियार निकाला गया गूगल फॉर्म। एक ओर जहां एक फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाने में हफ्तों लगा देती है, वहीँ अब उम्मीद है कि डिजिटल फॉर्म से सालों पुराने केस खत्म हो जाएंगे। वैसे मामला रोचक है। जिन मामलों में सालों से सुनवाई नहीं हुई, अब उन्हें तीन दिन की लोक अदालत में निपटाने का लक्ष्य है। जैसे कोई कहे-सालों से जमा कर्ज है? लेकिन कोई बात नहीं, तीन दिन में सब क्लियर कर देंगे। सरकार की मंशा पर हम सवाल कतई नहीं कर रहे हैं, लेकिन मशीनरी की रफ्तार पर जरूर है। कारण साफ़ है। यहां केस सिर्फ कागज नहीं, लोगों की जिंदगी होते हैं।

मरीज को नहीं साहब को आराम

अब सिस्टम की एक और हकीकत देखिए। दुर्ग जिला अस्पताल की कहानी इस हफ्ते की सबसे कड़वी सच्चाई रही। इलाज के लिए मिले 2 करोड़ रुपए और खर्च हो गए साहब लोगों के आराम पर। मतलब उनके कमरों में एयर कंडीशनर पर। कोरोना के समय मिला सीएसआर फंड, जो मरीजों की सांसें बचाने के लिए था, वह अफसरों के कमरों की ठंडक बढ़ाने में लग गया। वार्ड गर्म रहे, वेटिंग हॉल में पसीना बहता रहा, लेकिन फाइलों पर काम करने वाले कमरे ठंडे हो गए। यह सिर्फ खर्च का मामला नहीं है, यह प्राथमिकता का मामला है। किसे राहत चाहिए थी? मरीज को या अधिकारी को? और जब हिसाब मांगा गया, तो जवाब आया—प्रक्रिया चल रही है। यानी तीन साल बाद भी फाइलें ही इलाज कर रही हैं। यह वही हफ्ता है, जब एक तरफ दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठे और दूसरी तरफ दवा के पैसे से एसी खरीदे गए। सिस्टम की यह दोहरी तस्वीर शायद किसी रिपोर्ट में नहीं, लेकिन हम लोग लगातार इसे महसूस कर रहे हैं।

मुआवजा चार बार

अस्पताल और एसी कांड के बाद अब बात करते हैं भारतमाला मुआवजे घोटाले की। कहानी इतनी दिलचस्प है कि गणित के प्रोफेसर भी सिर पकड़ लें। एक जमीन, दो मुआवजा। फिर उसी जमीन के नए-नए खसरा नंबर और फिर दोबारा भुगतान। यानी जमीन वहीं, लेकिन कागजों में उसकी जन्मकुंडली बदलती रही और मुआवजा भी। प्रवर्तन निदेशालय के छापों ने जब इस खेल की परतें खोलनी शुरू कीं, तो पता चला कि यह कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरा महाघोटाले का डिजाइन था। जमीन को टुकड़ों में बांटो, खसरा नंबर बदलो, और मुआवजा बढ़ाओ। 29 करोड़ की जमीन 78 करोड़ की हो गई। यह बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, सिस्टम की क्रिएटिव अकाउंटिंग थी। जब ED ने दस्तक दी, तो सिर्फ फाइलें ही नहीं खुलीं, अलमारियों से नकदी और चांदी भी बाहर आ गई। यानी कागजों में कमाया हुआ घर से बरामद हो गया।

सब्सिडी गई, विरोध आया

जहां एक तरफ मुआवजे में ज्यादा का खेल चल रहा था, वहीं मंत्रालय में कम का दुख सामने आ गया। सस्ता खाना खत्म हो गया। करीब 26 साल से चल रही कैंटीन व्यवस्था बदली, और इसके साथ ही इंडियन कॉफी हाउस ने अपना बस्ता बांध लिया। नई कंपनी आई, और सरकार ने कहा-यह सुधार है। असल कहानी सब्सिडी की है। पहले सरकार पैसे देती थी, इसलिए समोसा भी मुस्कुराता था और चाय भी मीठी लगती थी। अब सब्सिडी गई, तो स्वाद भी थोड़ा कड़वा हो गया। और मजेदार बात। जिस कर्मचारी संघ ने शिकायत कर बदलाव की मांग की थी, वही अब विरोध में खड़ा है। यानी पहले कहा-बदलाव चाहिए। अब कह रहे हैं-ऐसा बदलाव नहीं चाहिए। अब नई मांग आई। कैंटीन महिला समूह चलाएं। यानी बहस खत्म नहीं हुई, बस दिशा बदल गई। यह वही सिस्टम है जहां फैसले पहले हो जाते हैं और फिर उनकी व्याख्या शुरू होती है। कर्मचारी अब सिर्फ फाइलों का ही नहीं, मेन्यू का भी हिसाब लगा रहे हैं।

पेपर में राम, सिस्टम में सवाल

गड़बड़झाले में शिक्षा विभाग भी पीछे नहीं है। जब मंत्रालय में मेन्यू बदला जा रहा था, उसी समय स्कूलों में प्रश्नपत्र भी अपने तरीके से प्रयोग कर रहे थे। चौथी कक्षा के पेपर में डॉग के विकल्प में राम लिख दिया गया। अब यह गलती थी या लापरवाही, यह जांच का विषय है, लेकिन असर इतना बड़ा हुआ कि मामला सीधे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंच गया। जांच में जो सामने आया, वह और भी दिलचस्प था। न कोई तय प्रक्रिया, न कोई मॉनिटरिंग। यानी प्रश्नपत्र ऐसे बन रहे थे, जैसे व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड मैसेज। यह सिर्फ एक शब्द की गलती नहीं थी, यह पूरे सिस्टम की कॉपी पेस्ट मानसिकता का उदाहरण था। जहां जिम्मेदारी तय नहीं, और गलती का असर सीधा समाज पर। डीईओ पर कार्रवाई की नौबत आई, तो सिस्टम ने थोड़ी गंभीरता दिखाई। यहां सवाल उठना वाजिब है। अगर एक पेपर में ऐसी गलती हो सकती है, तो बाकी कितनी चीजें चेक हुए बिना चल रही होंगी?

पुलिस गई छापा मारने… गाड़ी ही चोरी हो गई

अगर इस हफ्ते का सबसे फिल्मी सीन चुनना हो, तो जरा गौर फरमाइए .. अंबिकापुर में पुलिस गांजा पकड़ने गई थी। इसी दौरान एक आरोपी पुलिस की ही गाड़ी लेकर भाग गया। जी हां, डीएसपी की बोलेरो। पुलिस मौके पर थी। ऑपरेशन चल रहा था और इसी बीच चोर का ऑपरेशन गाड़ी चोरी सफल हो गया। कुछ देर के लिए ऐसा लगा जैसे स्क्रिप्ट उलटी चल रही हो, जहां चोर भाग रहा है और पुलिस पीछे नहीं, बल्कि पहले अपनी गाड़ी ढूंढ रही है। हालांकि तकनीक ने इज्जत बचा ली। मोबाइल लोकेशन से गाड़ी मिली, आरोपी पकड़ा गया। सोचिए, अगर पुलिस की गाड़ी सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी क्या उम्मीद करे? कहानी यहीं खत्म नहीं होती। रायपुर की एक टीम असम गई थी आरोपी पकड़ने और वहां खुद ही हिरासत में आ गई। यानी इस हफ्ते पुलिस ने अपराधियों से ज्यादा परिस्थितियों से लड़ाई लड़ी। यह हफ्ता पुलिस के लिए किसी आईने से काम नहीं था।

दवा घटिया, अभियान जारी

सरकार ने पूरे आत्मविश्वास से नारा दिया सही दवा, शुद्ध आहार और इसी हफ्ते एक दवा ने सिस्टम की पोल खोल दी। आयरन और फोलिक एसिड की दवा, जो खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए जरूरी है, वह सबस्टैंडर्ड निकली। अब उसे वापस मंगाया जा रहा है। सोचिए, अगर दवा पहले से ही खराब थी, तो जांच कहां थी? और अगर बाद में पता चला, तो तब तक कितने मरीज उसे खा चुके होंगे? यह वही सिस्टम है जहां कागजों में अभियान परफेक्ट होता है। टीम गठित, रिपोर्ट तैयार, निर्देश जारी। असल में लेकिन जमीन पर एक छोटी सी चूक पूरी मेहनत पर सवाल खड़ा कर देती है। पिछले कुछ सालों में ऐसी कई दवाएं फेल हो चुकी हैं। फिर भी अफसर बेशर्मी से अनजान बने रहते हैं। वैसे भी अफसरों को लोगों के जीने-मरने से ज्यादा फर्क कहां पड़ता है। यह घटना बताती है कि समस्या सिर्फ सप्लाई की नहीं, निगरानी की भी है।

ये खबरें भी पढ़ें...

जनगणना ड्यूटी को मना नहीं कर सकते कर्मचारी, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, विकल्प समाप्त

छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: रीमेक का राज, सिस्टम का सन्नाटा और फाइलों का खेल

रेड मारने गए डीएसपी की गाड़ी ले उड़ा चोर, सरेआम पुलिस की कट गई नाक, मुश्किल से पकड़ में आई बुलेरो

छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: अफीम, अफसर और अफरा-तफरी ने मौसम ही नहीं मिजाज भी बदला

Tags:
  • छत्तीसगढ़
  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
  • जनगणना
  • इंडियन कॉफी हाउस
  • अंबिकापुर
  • छत्तीसगढ़ की चिट्ठी
  • जनगणना ड्यूटी
गूगल पर द सूत्र चुनें ! Add as a preferredsource on Google
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें

By Sanjay Dhiman

mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे

By Sanjay Gupta

झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा

By Arun Tiwari

बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग

By Jitendra Shrivastava

Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग

By Jitendra Shrivastava

Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग

By Jitendra Shrivastava

Top News: खबरें काम की... नेपाल में पहाड़ टूटा, भूस्खलन और बाढ़ में 24 की मौत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा- ईरान से जल्द खत्म होगी जंग
मंत्रालय में बड़ा फेरबदल, 38 अनुभाग अधिकारियों की बदली जिम्मेदारी; वित्त-गृह समेत कई विभागों में नई तैनाती

By VINAY VERMA

मंत्रालय में बड़ा फेरबदल, 38 अनुभाग अधिकारियों की बदली जिम्मेदारी; वित्त-गृह समेत कई विभागों में नई तैनाती