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News In Short
- बस्तर संभाग समेत 19 जिले विवाद के हॉटस्पॉट बने हुए हैं।
- धर्मांतरण, प्रार्थना सभा और मतांतरण को लेकर लगातार तनाव की स्थिति।
- हालात को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पहले से सतर्क रहते हैं।
- बीते 5 साल में 60 से ज्यादा FIR और कई गंभीर मामले दर्ज हुए हैं।
- धार्मिक विवाद प्रशासन और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं।
News In Detail
छत्तीसगढ़ में हिंदू और ईसाई समुदाय के बीच विवाद पिछले कुछ वर्षों से लगातार सामने आ रहे हैं। इन मामलों में अवैध धर्मांतरण, मतांतरण और धार्मिक आयोजनों को लेकर आपसी तनाव देखने को मिलता है। अलग-अलग जिलों में कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि पुलिस और प्रशासन को अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ता है।
धार्मिक आयोजनों और प्रार्थना सभाओं को लेकर कई बार आपत्ति, विरोध और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति बन जाती है। इसी दौरान दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ जाते हैं और विवाद बढ़ जाता है। ऐसे मामलों को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पहले से ही सतर्कता बरतते हैं, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके।
बीते पांच सालों में सामने आए मामलों से यह साफ है कि यह सिर्फ किसी एक दिन या एक कारण तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग इलाकों में लंबे समय से चला आ रहा विवाद है, जो समय-समय पर सामने आता रहता है।
पिछले 5 साल का डेटा
पिछले पांच साल में छत्तीसगढ़ में लगभग 200 से ज्यादा विवाद दर्ज हुए। इसके साथ ही 60 से अधिक FIR भी हुईं। सबसे ज्यादा विवाद बस्तर संभाग के जिलों में देखने को मिले, जिनमें बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर, कांकेर और सुकमा शामिल हैं। इसके अलावा कोरबा, बलरामपुर, महासमुंद, दुर्ग और बिलासपुर में भी टकराव की घटनाएं अक्सर सामने आईं।
इस आंकड़े से स्पष्ट है कि कुछ जिले लगातार विवाद के हॉटस्पॉट बने हुए हैं, जो प्रशासन और पुलिस के लिए चुनौती का कारण बन रहे हैं।
कुछ प्रमुख घटनाओं में शामिल हैं:
- कांकेर: अंतिम संस्कार (दफन) को लेकर विवाद
- बस्तर: प्रार्थना घर और धर्मांतरण पर विवाद
- दुर्ग: ईसाई धार्मिक आयोजनों के दौरान झड़प
- रायपुर: धार्मिक कार्यक्रम और मतांतरण को लेकर विवाद
प्रमुख विवाद वाले जिले
छत्तीसगढ़ के कुछ जिले टकराव के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। इनमें-
- कांकेर: अंतिम संस्कार को लेकर विवाद
- बस्तर: प्रार्थना घर और धर्मांतरण
- नारायणपुर: परिवारों में धर्म परिवर्तन को लेकर तनाव
- कोंडागांव: हर रविवार तनाव
- सुकमा: धर्म परिवर्तन के कारण विवाद
- सरगुजा (अंबिकापुर): प्रार्थना सभा और मतांतरण
- बिलासपुर: प्रार्थना सभा और मतांतरण
- दुर्ग: धार्मिक आयोजनों पर विवाद
- धमतरी: अंतिम संस्कार और धर्मांतरण
- रायपुर: धार्मिक कार्यक्रम और मतांतरण
एक खबर के मुताबिक सबसे ज्यादा विवाद बस्तर संभाग में और कुछ अन्य जिलों में देखा गया है।
धर्मांतरण और मतांतरण क्या है?
धर्मांतरण का मतलब है किसी व्यक्ति का नया धर्म अपनाना। इसके लिए जिला प्रशासन को 60 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य है। मतांतरण का मतलब है किसी व्यक्ति की आस्था या विश्वास में बदलाव। यह अक्सर गरीब और कमजोर वर्ग के बीच देखने को मिलता है। कई बार गरीब या जरूरतमंद लोगों को आर्थिक मदद, नौकरी, विवाह या अन्य प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है।
नया कानून और ड्राफ्ट
छत्तीसगढ़ में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 पहले से ही लागू है। इस कानून के तहत बलपूर्वक धर्मांतरण पर 1 साल की कैद या 5,000 रुपए जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
फरवरी 2024 में सरकार ने इसका नया ड्राफ्ट तैयार किया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि प्रलोभन, बल, विवाह या कपटपूर्ण तरीके से धर्म परिवर्तन करना अवैध होगा।
नए कानून के लागू होने के बाद, किसी भी धर्म परिवर्तन से पहले सूचना देना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य है कि कानून का उल्लंघन करने वालों पर सख़्त कार्रवाई की जा सके।
ईसाई मतदाताओं का राजनीतिक और सामाजिक महत्व
छत्तीसगढ़ की कुल आबादी लगभग 2.55 करोड़ है, जिनमें ईसाई समुदाय लगभग 4.90 लाख (लगभग 1.92%) है। संख्या कम होने के बावजूद, राज्य की 19 विधानसभा सीटों पर ईसाई मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, खासकर जशपुर जिले में। इसी कारण, ईसाई समुदाय की गतिविधियां और रविवार को होने वाली प्रार्थना सभाओं पर प्रशासन और राजनीतिक दलों की लगातार निगरानी रहती है।
पिछले पांच साल में सामने आए आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि धर्मांतरण, मतांतरण और प्रार्थना सभाओं को लेकर विवाद अब सामान्य घटना नहीं रहे। खासकर बस्तर संभाग और अन्य संवेदनशील जिलों में हालात बार-बार बिगड़ रहे हैं, जिससे कानून-व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। अब केवल निगरानी या अलर्ट रहने से काम नहीं चलेगा। ज़रूरत है कि राज्य सरकार और प्रशासन ठोस और सख़्त कार्रवाई करे, ताकि जबरन या अवैध तरीकों से होने वाले धर्म परिवर्तन पर रोक लगे और कानून का डर साफ तौर पर दिखे।
एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर समय रहते कड़े फैसले और स्पष्ट कार्रवाई नहीं की गई, तो ऐसे विवाद आगे चलकर और बड़े टकराव का रूप ले सकते हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह केवल हालात संभालने तक सीमित रहे या स्थायी समाधान के लिए सख़्त कदम उठाए।
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