राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को नहीं मानती जिताऊ उम्मीदवार, चुनावों के सियासी पेंच में कम मिलता है मौका
Arun Tiwari | Apr 15, 2026, 17:11 IST
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राजनीतिक दलों में महिलाओं को उम्मीदवार के रूप में मौका देने में कमी नजर आ रही है। हाल ही के चुनावों में प्रमुख पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में उदासीनता दिखाई है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 48-53% तक है।
Raipur : आने वाले चुनावों से पहले महिलाओं के (politics )राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्र सरकार और बीजेपी जहां संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की दिशा में कदम बढ़ाने की बात कर रही हैं।
वहीं जमीनी स्तर पर उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं की भागीदारी अभी भी काफी कम दिखाई दे रही है। हाल ही में हो रहे चुनावों में जारी उम्मीदवारों की सूची का विश्लेषण बताता है कि चुनावी मैदान में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षा से बहुत कम है।
पांच प्रमुख चुनावी राज्यों असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में महिलाओं की आबादी मतदाताओं के रूप में 48 से 53 फीसदी के बीच है, लेकिन उम्मीदवारों के रूप में उनकी संख्या 33 फीसदी से बहुत कम है।
बीजेपी की बात करें तो असम में पार्टी ने कुल उम्मीदवारों में सिर्फ 7 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया है। तमिलनाडु में यह आंकड़ा 18.5 फीसदी है।
जबकि पश्चिम बंगाल में 11.5 फीसदी और केरल में करीब 14 फीसदी महिलाओं को उम्मीदवार बनाया गया है। पुडुचेरी में तो बीजेपी ने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।
यह स्थिति दर्शाती है कि राजनीतिक दलों की घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पार्टियां उम्मीदवार चयन में जीतने की क्षमता यानी विनेबिलिटी के आधार पर टिकट देती हैं। इसके बाद जातीय समीकरण और स्थानीय समीकरणों को प्राथमिकता दी जाती है।
जिसमें अक्सर महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उम्मीदवारों का चयन कई मानकों पर होता है
जिसमें जीतने की संभावना सबसे अहम होती है। ऐसे में कई बार उपयुक्त महिला उम्मीदवार नहीं मिलने का तर्क भी दिया जाता है।
तमिलनाडु में बीजेपी ने अपने सहयोगी दल एआईएडीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ा है। यहां बीजेपी ने 27 उम्मीदवारों में से 5 महिलाओं को टिकट दिया है जो लगभग 18.5 फीसदी है।
पश्चिम बंगाल में पार्टी ने 287 सीटों में से 33 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है जो करीब 11.5 फीसदी होता है। वहीं तृणमूल कांग्रेस टीएमसी ने 291 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 52 महिलाओं को मैदान में उतारा है, जो लगभग 18 फीसदी है। केरल में स्थिति कुछ बेहतर जरूर है लेकिन वहां भी आंकड़े संतोषजनक नहीं हैं।
बीजेपी ने 98 सीटों में से 14 महिलाओं को टिकट दिया है जो करीब 14 फीसदी है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने 18 महिलाओं को 12.8 फीसदी और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यूडीएफ ने 12 महिलाओं को यानी 8.5 फीसदी को उम्मीदवार बनाया है।
पुडुचेरी में बीजेपी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन यहां किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया गया। असम में बीजेपी ने 89 उम्मीदवारों में से केवल 6 महिलाओं को टिकट दिया है
जो लगभग 7 फीसदी है। वहीं कांग्रेस ने 101 उम्मीदवारों में से 14 (टिकट वितरण)महिलाओं को टिकट दिया है, जो 13.8 फीसदी के करीब है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लगभग सभी प्रमुख दल महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने में पीछे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की कम भागीदारी के पीछे सामाजिक और ऐतिहासिक कारण भी जिम्मेदार हैं। लंबे समय तक राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व रहा है।
जिसके चलते महिलाओं को अवसर कम मिले। हालांकि अब स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी जा रही हैं। लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर यह बदलाव अभी धीमा है। सामाजिक शोध संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है
कि यदि राजनीतिक दल वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें स्वेच्छा से (महिला आरक्षण 33 प्रतिशत)33 फीसदी टिकट महिलाओं को देने चाहिए। अवसर मिलने पर महिलाएं राजनीति में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
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वहीं जमीनी स्तर पर उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं की भागीदारी अभी भी काफी कम दिखाई दे रही है। हाल ही में हो रहे चुनावों में जारी उम्मीदवारों की सूची का विश्लेषण बताता है कि चुनावी मैदान में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षा से बहुत कम है।
पांच प्रमुख चुनावी राज्यों असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में महिलाओं की आबादी मतदाताओं के रूप में 48 से 53 फीसदी के बीच है, लेकिन उम्मीदवारों के रूप में उनकी संख्या 33 फीसदी से बहुत कम है।
बीजेपी ने 7-14 फीसदी महिलाओं को दिए टिकट
जबकि पश्चिम बंगाल में 11.5 फीसदी और केरल में करीब 14 फीसदी महिलाओं को उम्मीदवार बनाया गया है। पुडुचेरी में तो बीजेपी ने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।
यह स्थिति दर्शाती है कि राजनीतिक दलों की घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
जीतने की क्षमता को प्राथमिकता
जिसमें अक्सर महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उम्मीदवारों का चयन कई मानकों पर होता है
जिसमें जीतने की संभावना सबसे अहम होती है। ऐसे में कई बार उपयुक्त महिला उम्मीदवार नहीं मिलने का तर्क भी दिया जाता है।
चुनावी राज्यों में इतने टिकट
पश्चिम बंगाल में पार्टी ने 287 सीटों में से 33 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है जो करीब 11.5 फीसदी होता है। वहीं तृणमूल कांग्रेस टीएमसी ने 291 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 52 महिलाओं को मैदान में उतारा है, जो लगभग 18 फीसदी है। केरल में स्थिति कुछ बेहतर जरूर है लेकिन वहां भी आंकड़े संतोषजनक नहीं हैं।
बीजेपी ने 98 सीटों में से 14 महिलाओं को टिकट दिया है जो करीब 14 फीसदी है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने 18 महिलाओं को 12.8 फीसदी और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यूडीएफ ने 12 महिलाओं को यानी 8.5 फीसदी को उम्मीदवार बनाया है।
पुडुचेरी में बीजेपी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन यहां किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया गया। असम में बीजेपी ने 89 उम्मीदवारों में से केवल 6 महिलाओं को टिकट दिया है
जो लगभग 7 फीसदी है। वहीं कांग्रेस ने 101 उम्मीदवारों में से 14 (टिकट वितरण)महिलाओं को टिकट दिया है, जो 13.8 फीसदी के करीब है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लगभग सभी प्रमुख दल महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने में पीछे हैं।
राजनीति में रहा पुरुषों का प्रभाव
जिसके चलते महिलाओं को अवसर कम मिले। हालांकि अब स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी जा रही हैं। लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर यह बदलाव अभी धीमा है। सामाजिक शोध संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है
कि यदि राजनीतिक दल वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें स्वेच्छा से (महिला आरक्षण 33 प्रतिशत)33 फीसदी टिकट महिलाओं को देने चाहिए। अवसर मिलने पर महिलाएं राजनीति में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
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