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News in short
- 30 साल पुरानी समिति ने 16 सालों के दरमियान किया घोटाला।
- बिना स्वीकृति के ले-आउट पर 20,600 वर्गफुट बंधक भूमि की बिक्री का आरोप।
- IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला पंजीबद्ध।
- मुख्य आरोपी: गया प्रसाद विश्वकर्मा (तत्कालीन अध्यक्ष)।
News in detail
कहते हैं इतिहास कभी पीछा नहीं छोड़ता और पुराने काले कारनामे एक दिन उजाले में आ ही जाते हैं। ठीक ऐसा ही हुआ लाल बहादुर शास्त्री गृह निर्माण सहकारी समिति से जुड़े भूमि घोटाले में। करीब 16 साल तक दबा रहा यह मामला अब आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW), भोपाल की FIR के साथ फिर से सुर्खियों में है। बिना स्वीकृत ले-आउट के आधार पर बंधक जमीन बेचने के आरोपों ने एक पुराने खेल को फिर से जिंदा कर दिया है।
16 साल पुराना मामला फिर जिंदा
इस मामले की शुरुआत सितंबर 2025 में हुई। रमाकांत मिश्रा ने मुख्यालय भोपाल में शिकायत क्रमांक 666/25 दर्ज कराई। शिकायत में आरोप था कि लाल बहादुर शास्त्री गृह निर्माण सहकारी समिति ने भूमि संबंधी अनियमितताएं की थीं। शिकायत को गंभीरता से लेकर जबलपुर इकाई को जांच सौंपी गई। विस्तृत जांच के बाद EOW में FIR दर्ज की गई।
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1983 में बनी समिति, 1989 का अनुबंध बना आधार
लाल बहादुर शास्त्री गृह निर्माण सहकारी समिति का पंजीकरण वर्ष 1983 में हुआ था। समिति का उद्देश्य सदस्यों को आवासीय प्लॉट उपलब्ध कराना था। साल 1989 में समिति ने नगर निगम जबलपुर के साथ एक ले-आउट के आधार पर सिक्योरिटी बॉन्ड का अनुबंध किया। लेकिन जांच में सामने आया कि जिस ले-आउट के आधार पर प्लॉटिंग की गई। उसे नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से कभी विधिवत स्वीकृति नहीं मिली थी।
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बिना मंजूरी के बेची गई बंधक जमीन
जांच में खुलासा हुआ कि तत्कालीन पदाधिकारियों ने मिलीभगत कर लगभग 20,600 वर्गफुट बंधक भूमि को अवैध रूप से बेच दिया। यह भूमि सिक्योरिटी के रूप में बंधक थी, जिसे नियमानुसार बेचा नहीं जा सकता था। बावजूद इसके प्लॉटों की बिक्री कर दी गई। शासन के नियमों को दरकिनार कर दिया गया। इसी तथ्य ने पूरे मामले को धोखाधड़ी की श्रेणी में ला खड़ा किया।
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शासन सहित खरीददारों से धोखा
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि ले-आउट की स्वीकृति न होने के बावजूद प्लॉट बेचकर खरीदारों को वैधता का विश्वास दिलाया गया। इससे न केवल शासन के साथ अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन हुआ, बल्कि आम नागरिकों के साथ भी धोखाधड़ी की गई। वर्षों तक खरीदारों को असलियत की जानकारी नहीं थी।
एक आरोपी की हो चुकी मौत
FIR में गया प्रसाद विश्वकर्मा, जो उस समय समिति के अध्यक्ष थे, को मुख्य आरोपी बनाया गया है। जांच में एक अन्य तत्कालीन अध्यक्ष डीएस दुबे की संलिप्तता भी सामने आई थी। लेकिन उनके निधन के कारण वर्तमान में कार्रवाई मुख्य रूप से गया प्रसाद विश्वकर्मा पर केंद्रित है।
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EOW ने दर्ज की FIR
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। अब जांच एजेंसी संबंधित दस्तावेज, अनुबंध, रजिस्ट्री रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन की गहन पड़ताल करेगी। इस मामले में इतिहास ने एक बार फिर अपना पन्ना खोला है। अब देखना यह है कि इस 16 साल पुराने जमीन खेल में और कौन-कौन से नाम सामने आते हैं। दोषियों पर क्या कानूनी कार्रवाई होती है।
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