20 रुपए की रिश्वत में नौकरी से हटाया, लाखों की रिश्वत वाले मामलों का क्या?

रायसेन में जननी एक्सप्रेस ड्राइवर की सेवाएं 20 रुपए मांगने के आरोप में 20 घंटे में खत्म कर दी गईं। यह कार्रवाई पहली नजर में तो न्याय जैसी लगती है, लेकिन इस घटना ने नई बहस भी खड़ी कर दी है कि मगर लाखों रुपए की रिश्वत लेने वाले सरेआम घूम रहे हैं।

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News In Short

  • रायसेन में जननी एक्सप्रेस ड्राइवर की सेवाएं ₹20 मांगने के आरोप में समाप्त
  • सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के सिर्फ 20 घंटे के भीतर कार्रवाई
  • CMHO डॉ. दिनेश खत्री ने तत्काल प्रभाव से आदेश जारी किया
  • प्रशासन ने इसे भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस बताया
  • कार्रवाई ने सख्ती की समानता और चयन पर सवाल खड़े किए

News In Detail 

मध्य प्रदेश में मोहन सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई एक बार फिर चर्चा में है। जननी एक्सप्रेस एम्बुलेंस के एक ड्राइवर की सेवाएं 20 रुपए मांगने के आरोप में खत्म कर दी गईं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के महज 20 घंटे के भीतर फैसला आया और ड्राइवर नौकरी से बाहर हो गया।

सरकार ने इसे ‘जीरो टॉलरेंस’ बताया, लेकिन यह कार्रवाई अब एक बड़े और असहज सवाल को जन्म दे रही है। क्या व्यवस्था में सजा का पैमाना सबके लिए बराबर है, या यह सिर्फ सबसे कमजोर पर ही सबसे तेज चलता है?

एक वीडियो, 20 घंटे और करियर का अंत

रायसेन जिला अस्पताल से जुड़ी जननी एक्सप्रेस एम्बुलेंस (RJ14 PG 0818) के ड्राइवर पर आरोप लगा कि उसने एक प्रसूता के परिजन से 20 रुपए मांगे। वीडियो में ड्राइवर यह कहते सुनाई देता है कि पैसे “राजश्री” के लिए लिए गए। वीडियो वायरल होते ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दिनेश खत्री ने तत्काल प्रभाव से उसकी सेवाएं समाप्त कर दीं। साथ ही संबंधित वेंडर पर भी कार्रवाई की बात कही गई।

यह प्रशासनिक गति अपने आप में असाधारण है क्योंकि न लंबी जांच, न कारण बताओ नोटिस, न चेतावनी। सवाल सिर्फ इतना है कि इतनी तत्परता व्यवस्था में हर जगह क्यों नहीं दिखती?

कागजों में नियम बराबर हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई अलग

प्रशासन का तर्क साफ है रिश्वत की कोई न्यूनतम सीमा नहीं होती। 1 रुपए हो या 20 रुपए, जनसेवा से जुड़े काम के बदले पैसा लेना अपराध है। कागजों में यह बात पूरी तरह सही है, लेकिन कानून सिर्फ लिखे जाने से नहीं, बराबरी से लागू होने से न्याय बनता है। यहीं से यह मामला सिर्फ एक ड्राइवर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम के चरित्र पर सवाल खड़े करता है।

अगर यही सख्ती हर उस जगह दिखाई देती, जहां बड़े पद, बड़ी फाइलें और बड़े आरोप होते हैं, तो शायद यह खबर उदाहरण बनती, लेकिन जब तुलना सामने आती है, तो यह कार्रवाई मिसाल नहीं, बल्कि असमानता की तस्वीर बन जाती है।

जब आरोप बड़े थे, तब कार्रवाई छोटी क्यों थी?

यही स्वास्थ्य विभाग करीब 21 महीने पहले भी गंभीर विवादों में घिरा था। तब CMHO डॉ. दिनेश खत्री पर ही महिला डॉक्टरों और अन्य चिकित्सकों ने भ्रष्टाचार, लिफाफा लेने, अधीनस्थों पर दबाव बनाने और पद हासिल करने को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे।

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, डॉक्टरों ने काम बंद किया, पूरा जिला अस्पताल दो गुटों में बंट गया, लेकिन उस वक्त न कोई सेवा समाप्त हुई, न निलंबन हुआ, न कोई ठोस दंड।

भोपाल से आई टीम ने दोनों पक्षों को बैठाकर “आपस में तालमेल” की सलाह दी और मामला समझाइश में निपटा दिया गया। तब सिस्टम ने नरमी दिखाई, आज उसी सिस्टम ने बेरहमी दिखाई फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सामने एक गरीब ड्राइवर था।

गरीब होना ही सबसे बड़ा अपराध क्यों?

यह सवाल किसी ड्राइवर को निर्दोष साबित करने की कोशिश नहीं है। सवाल सजा के अनुपात और चयन का है। एक ऐसा व्यक्ति, जो आउटसोर्स व्यवस्था में काम करता है, जिसकी आर्थिक हालत कमजोर है, उसकी पूरी आजीविका सिर्फ 20 रुपए के आरोप में छीन ली जाती है। यहां व्यवस्था को खुद से यह पूछना चाहिए।

  • क्या चेतावनी या अंतिम अवसर का कोई विकल्प नहीं था?
  • क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नीचे वालों के लिए है?
  • क्या बड़े पदों पर बैठे लोगों के लिए नियम लचीले हो जाते हैं?

जब जवाब इन सवालों का बराबरी में नहीं मिलता, तो न्याय सिर्फ शब्द बनकर रह जाता है।

कानून अंधा है, लेकिन क्या उसका हाथ सिर्फ गरीब तक ही पहुंचता है?

कहते हैं कानून अंधा होता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि व्यवस्था की आंखें हैसियत पहचानती हैं। बड़े मामलों में जांच सालों चलती है, फाइलें दबती हैं, समझाइश दी जाती है। छोटे आदमी के मामले में वीडियो ही फैसला बन जाता है। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सच में ईमानदार है, तो उसे ऊपर से नीचे तक एक जैसी धार दिखानी होगी। वरना हर ऐसी कार्रवाई यह संदेश देती रहेगी कि सिस्टम में सबसे आसान सज़ा हमेशा उसी को मिलती है, जिसके पास लड़ने की ताकत नहीं होती।

सरकार के लिए यह परीक्षा का वक्त है

यह मामला सरकार के लिए चेतावनी भी है और मौका भी। चेतावनी इसलिए कि अधूरी न्याय प्रक्रिया भरोसा तोड़ती है। मौका इसलिए कि अगर पुराने मामलों की फाइलें खुलती हैं, बड़े नामों पर भी वही सख्ती लागू होती है, तो यही कार्रवाई एक ऐतिहासिक उदाहरण बन सकती है।वरना यह खबर एक सवाल बनकर दर्ज होगी क्या मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है, या सिर्फ गरीबों के खिलाफ त्वरित न्याय?

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