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News in Short
- मध्य प्रदेश में कर्मचारियों के प्रमोशन और ओबीसी के 13% पद होल्ड मामले लंबित हैं।
- 50 हजार से ज्यादा कर्मचारियों के मामले कोर्ट में अटके हुए हैं।
- तिलहन संघ कर्मचारियों का संविलियन और 100% सैलरी के मामले भी लंबित हैं।
- सरकार की समय पर कार्रवाई न करने से प्रशासनिक कार्यों में देरी हो रही है।
- ओबीसी आरक्षण और पदोन्नति के मामलों का समाधान सरकार के स्तर पर हो सकता है।
News in Detail
BHOPAL. अहम मसलों पर सरकार की चुप्पी ने मध्य प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी की रफ्तार मंथर कर दी है। जो मामले सरकार के सीधे दखल से सुलझ सकते हैं वे भी कोर्ट की सुनवाई में सालों से अटके हैं। इसका सीधा असर विभागों के काम पर पड़ रहा है। प्रमोशन में आरक्षण, 100 फीसदी सैलरी, ओबीसी के 13 फीसदी पद होल्ड रखने, तिलहन संघ के कर्मचारियों के संविलियन के अलावा कर्मचारियों के 50 हजार से ज्यादा मामले कोर्ट केस में उलझे हैं। विभागों में काम और योजनाओं के क्रियान्वयन का दायित्व संभालने वाले हजारों कर्मचारी कानूनी लड़ाई में व्यस्त हैं। हर एक केस लड़ने पर सरकार को लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
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मध्यप्रदेश में 7 लाख के आसपास कर्मचारी
मध्य प्रदेश सरकार के विभागों में 6.45 लाख अधिकारी- कर्मचारी प्रशासनिक काम काज संभालते हैं। इन कर्मचारियों के 50 हजार से ज्यादा केस कानूनी पेंचों में उलझे हैं। यानी एक से डेढ़ लाख कर्मचारी नीतिगत समस्याओं और अपनी निजी या सामूहिक मांगों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इसका सीधा असर विभागों के काम पर पड़ रहा है। विभागों की कार्य दक्षता प्रभावित हो रही है क्योंकि इन अधिकारी और कर्मचारियों का ध्यान अपने काम से ज्यादा अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई पर है। द सूत्र ने ऐसे ही मसलों को लेकर पड़ताल की है। ये सभी वे मामले हैं जो सीधे सरकारी मशीनरी से जुड़े हैं और प्रशासनिक व्यवस्था की रफ्तार का रोड़ा बन गए हैं।
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आखिर कहां हो रही चूक ?
बीते 10 साल से मध्य प्रदेश में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस को छोड़कर राज्य के कर्मचारियों को पदोन्नति नहीं मिली है। प्रमोशन में आरक्षण के मामले पर कर्मचारी दो धड़ों में बंटे हुए हैं। यह मामला सालों से कोर्ट की लड़ाई में अटका हुआ है। एक पक्ष पदोन्नति में आरक्षण का विरोध कर रहा है जबकि दूसरा आरक्षण के आधार पर ही प्रमोशन देने का समर्थन करता आ रहा है। सरकार ने इस लड़ाई को खत्म करने के लिए साल 2025 में नई पदोन्नति नीति बनाई लेकिन यहां एक बार फिर सरकार से चूक हो गई। सरकार के प्रयास नाकाफी साबित हुए और कर्मचारियों के बीच सामंजस्य बनाने की चूक ने इस मामले को और भी उलझा दिया है।
हर साल सैकड़ों कर्मचारी पदोन्नति के बिना ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्हें सेवाकाल में एक भी पदोन्नति नहीं मिली है। इस वजह से प्रशासनिक व्यवस्था का भार संभालने वाली इस महत्वपूर्ण कड़ी में गहरी हताशा है। प्रमोशन में आरक्षण केस में लंबी सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से दलीलें तो रखी गई लेकिन पक्ष कमजोर होने से कानूनी लड़ाई लंबी खिंचती चली गई।
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इधर ओबीसी के 13 फीसदी पद होल्ड
मध्य प्रदेश के कर्मचारी जगत से जुड़ा दूसरा सबसे अहम मुद्दा ओबीसी के 13 फीसदी पद होल्ड रखने का है। पांच साल से प्रदेश में हुई 50 से ज्यादा भर्तियों में 9 हजार से ज्यादा पद इस वजह से होल्ड कर दिए गए हैं। यानी इन पदों के लिए भर्ती तो हुई लेकिन रिजल्ट ही जारी नहीं किया गया। इसके कारण हजारों अभ्यर्थियों को यह भी पता नहीं चल सका कि भर्ती में उनका चयन हुआ या नहीं। भर्तियों के बाद विभाग में पद खाली ही रह गए और नए कर्मचारी भी नहीं मिल पाए। यह मामला भी सरकार के स्तर पर सुलझाया जा सकता था। हाईकोर्ट- सुप्रीम कोर्ट में सालों तक सरकार और ओबीसी कैंप के वकील पैरवी करते रहे और 13 फीसदी पद होल्ड होते चले गए।
परिवीक्षा नियम ने अटकाई पूरी सैलरी
साल 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा परिवीक्षा नियमों में किए बदलाव का प्रदेश के कर्मचारी पांच साल से विरोध कर रहे हैं। इस बदलाव ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के हजारों कर्मचारियों से 100 फीसदी वेतन का अधिकार छीन लिया है। उनकी परिवीक्षा अवधि दो से बढ़ाकर तीन साल कर दी गई है। वहीं नियुक्ति के बाद पहले साल उन्हें 70 फीसदी, दूसरे साल 80 फीसदी और तीसरे साथ 90 फीसदी ही वेतन मिल रहा है। प्रदेश में ऐसे करीब एक लाख कर्मचारी हैं जो पूरे वेतन के लिए सरकार और कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
जनवरी 2026 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट विधि विभाग के कर्मचारियों की याचिका पर शत प्रतिशत वेतन देने का आदेश दे चुका है। इस याचिका के अलावा सैंकड़ों याचिकाएं इसी मामले को लेकर कोर्ट में विचाराधीन हैं। हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर सरकार इस मसले का हल निकाल सकती है लेकिन अधिकारियों की बेरुखी की वजह से कर्मचारियों की याचिकाएं कानूनी पेंच में फंसी हुई हैं। पूरा वेतन नहीं मिलने के कारण एक लाख कर्मचारी पूरी दक्षता से विभागीय दायित्व से दूर हैं और इसका खामियाजा विभागीय योजनाओं पर पड़ रहा है, यानी इन योजनाओं के हितग्राही प्रभावित हो रहे हैं।
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सालों बाद भी संविलियन का पेंच
मध्य प्रदेश तिलहन संघ को लगातार घाटे की वजह से तत्कालीन सरकार ने साल 2013 में इसे समाप्त कर दिया था। इस निर्णय के बाद संघ के कर्मचारियों को दूसरे विभागों को सौंप दिया गया लेकिन संविलियन का पेंच सैंकड़ों कर्मचारियों के जी का जंजाल बन गया। सालों तक सरकार इसे नजरअंदाज करती रही। नियमित सेवा के लिए लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद अब भी 700 कर्मचारियों को अन्य नियमित कर्मचारियों के बराबर पांचवा और छठवां वेतनमान नहीं मिला है। ये कर्मचारी बीते चार साल से कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। याचिकाओं से जहां कर्मचारियों की जेब ढीली हो रही है वहीं सरकारी खजाने पर भी बोझ बढ़ रहा है।
मंत्री पर मेहरबानी क्यों ?
भारतीय सेना की अधिकारी पर विवादित टिप्पणी करने वाले मंत्री विजय शाह के मामले पर भी सरकार का रुख स्पष्ट नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद उन पर केस दर्ज किया गया लेकिन तब भी सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया। अब एसआईटी की जांच रिपोर्ट को ढाल बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार को तलब कर चुका है लेकिन अब भी निर्णय को लेकर मध्य प्रदेश सरकार का रुख असमंजस में उलझा है। ऐसे तमाम मामले न केवल सरकार की छवि बिगाड़ रहे हैं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को लचर करने के साथ ही खजाने पर भी आर्थिक बोझ बढ़ा रहे हैं।
समय पर निर्णय से सुलझेंगे केस
कृषि विस्तार अधिकारी संघ के प्रांताध्यक्ष मोहन डामोर का कहना है कि सरकार के स्तर पर समय पर निर्णय न लेने से कई मामले बेवजह कानूनी लड़ाई में उलझ जाते हैं। ओबीसी आरक्षण के विवाद के चलते हजारों पद होल्ड हैं। पदोन्नति और 100 फीसदी सैलरी के मामले भी नीतिगत हैं जिन्हें सरकार कोर्ट की सुनवाई में फंसने से रोक सकती थी। मामलों का सरकार के स्तर पर समाधान होगा तो प्रशासनिक मशीनरी बेहतर काम करेगी। इसका लाभ सरकार और जनता हो मिलेगा।
व्यवस्था के लिए संवेदनशील सरकार
सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव आईएएस अजय कटेसरिया का कहना है अधिकारी और कर्मचारियों के मामलों में सरकार संवेदनशील है। कर्मचारियों के मामलों की प्रकृति एक समान नहीं होती इस वजह से सबके लिए एक जैसा निर्णय नहीं लिया जा सकता। पूरी सैलरी, ओबीसी आरक्षण और पदोन्नति संबंधी मामले नीतिगत हैं और इन पर सरकार के स्तर पर विचार किया जा रहा है। सरकार कर्मचारियों से संबंधित मामलों की सुनवाई और निपटारे की व्यवस्था के लिए प्रयासरत हैं।
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