Mothers Day: मां ने सिर्फ जन्म नहीं दिया, किडनी देकर बचाई जान, सबसे ज्यादा डोनर महिलाएं
Kaushiki | May 10, 2026, 10:21 IST
mothers day
एम्स भोपाल में 16 किडनी ट्रांसप्लांट हुए। इनमें 80% डोनर महिलाएं हैं। मदर्स डे पर जानिए कैसे मांएं अपनी किडनी दान कर बच्चों को नया जीवन दे रही हैं।
मदर्स डे पर विशेष:आज (10 मई) पूरा देश मदर्स डे मना रहा है। सोशल मीडिया पर लोग अपनी मां के लिए पोस्ट डाल रहे हैं। मदर्स डे पर हम अक्सर तोहफों की बात करते हैं। लेकिन भोपाल के एम्स अस्पताल से एक इमोशनल रिपोर्ट आई है।
यहां मांएं अपने बच्चों को सबसे बड़ा तोहफा दे रही हैं। वे अपने शरीर का अंग देकर उन्हें जीवनदान दे रही हैं। मां सिर्फ जन्म देने वाली ही नहीं होती है। एम्स भोपाल के आंकड़ों के मुताबिक 80 प्रतिशत किडनी डोनर महिलाएं हैं। यहां किडनी डोनर्स में सबसे ज्यादा संख्या मांओं की है।
एम्स भोपाल में अबतक कुल 16 किडनी ट्रांसप्लांट हुए हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो लगभग 50 प्रतिशत मामलों में मां ही डोनर बनी हैं। जब बच्चे की किडनी फेल हुई, मां सबसे पहले आई। उन्होंने बिना डरे अपने शरीर का हिस्सा दान कर दिया। ये सिर्फ एक सर्जरी नहीं, बल्कि एक बड़ा बलिदान है।
एम्स के यूरोलॉजिस्ट डॉ. केतन मेहरा ने बहुत जरूरी बात बताई है। उन्होंने बताया कि ट्रांसप्लांट में महिलाएं पुरुषों से कहीं आगे हैं। किडनी ट्रांसप्लांट के 80 प्रतिशत डोनर महिलाएं ही होती हैं।
इनमें सबसे बड़ी संख्या में सेल्फलेस मांओं की देखी गई है। मेडिकल साइंस कहता है कि मां-बच्चे का जेनेटिक कनेक्शन गहरा होता है। इस वजह से किडनी मैच होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। सफल ट्रांसप्लांट के लिए यह एक बड़ा प्लस पॉइंट है।
28 साल के पुष्पेंद्र कुर्मी की कहानी सबको भावुक कर देगी। पिछले साल (2025) अगस्त में उनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था। उनकी दोनों किडनी पूरी तरह से खराब हो चुकी थीं। पूरा परिवार उस वक्त बहुत गहरे सदमे में था।
तब उनकी मां कविता कुर्मी ढाल बनकर सामने आईं। उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी किडनी बेटे को दी। पुष्पेंद्र कहते हैं कि उनकी मां ही उनकी असली भगवान हैं। आज वे अपनी मां की वजह से स्वस्थ जिंदगी जी रहे हैं।
किडनी फेल होने पर मरीज डायलिसिस के भरोसे रहता है। बार-बार अस्पताल जाना और सुइयां चुभवाना बहुत दर्दनाक होता है। ऐसे में ट्रांसप्लांट ही सामान्य जीवन का आखिरी रास्ता है।
मां जानती है कि ऑपरेशन के बाद उसे सावधानी रखनी होगी। फिर भी वह अपने बच्चे के सुख के लिए तैयार रहती है। एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने मां (मदर्स डे स्पेशल) के इस जज्बे को सलाम किया है।
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यहां मांएं अपने बच्चों को सबसे बड़ा तोहफा दे रही हैं। वे अपने शरीर का अंग देकर उन्हें जीवनदान दे रही हैं। मां सिर्फ जन्म देने वाली ही नहीं होती है। एम्स भोपाल के आंकड़ों के मुताबिक 80 प्रतिशत किडनी डोनर महिलाएं हैं। यहां किडनी डोनर्स में सबसे ज्यादा संख्या मांओं की है।
एम्स भोपाल की रिपोर्ट
महिलाएं क्यों हैं अंगदान में सबसे आगे
इनमें सबसे बड़ी संख्या में सेल्फलेस मांओं की देखी गई है। मेडिकल साइंस कहता है कि मां-बच्चे का जेनेटिक कनेक्शन गहरा होता है। इस वजह से किडनी मैच होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। सफल ट्रांसप्लांट के लिए यह एक बड़ा प्लस पॉइंट है।
पुष्पेंद्र और मां कविता की स्टोरी
तब उनकी मां कविता कुर्मी ढाल बनकर सामने आईं। उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी किडनी बेटे को दी। पुष्पेंद्र कहते हैं कि उनकी मां ही उनकी असली भगवान हैं। आज वे अपनी मां की वजह से स्वस्थ जिंदगी जी रहे हैं।
डायलिसिस के दर्द से मुक्ति का रास्ता
मां जानती है कि ऑपरेशन के बाद उसे सावधानी रखनी होगी। फिर भी वह अपने बच्चे के सुख के लिए तैयार रहती है। एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने मां (मदर्स डे स्पेशल) के इस जज्बे को सलाम किया है।
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