हम कांग्रेसी हैं, बीजेपी ने बना दिया मंडल अध्यक्ष, दो नेताओं ने ठुकराए पद
Sanjay Dhiman | Aug 18, 2026, 18:27 IST
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आलीराजपुर में बीजेपी ने प्रदीप गोजा और सुजीत चौहान को मंडल अध्यक्ष बनाया, लेकिन दोनों ने खुद को कांग्रेस कार्यकर्ता बताते हुए पद ठुकरा दिया। जानें पूरा मामला।
आलीराजपुर में बीजेपी ने दो युवा नेताओं को मंडल अध्यक्ष बनाया। दोनों ने खुद को कांग्रेस कार्यकर्ता बताते हुए पद ठुकरा दिया। प्रदीप गोजा और सुजीत चौहान ने वीडियो जारी कर विरोध जताया। उनका कहना है कि नियुक्ति से पहले उनसे कोई बात नहीं हुई। अजा मोर्चा जिलाध्यक्ष सोहन डोडवे ने उनके आरोपों को खारिज किया।
आलीराजपुर जिले में बीजेपी की एक नियुक्ति ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। पार्टी ने अनुसूचित जाति मोर्चा (SC Morcha – Scheduled Caste Wing) के तहत दो मंडल अध्यक्ष बनाए थे। लेकिन दोनों नवनियुक्त नेताओं ने पद लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने वीडियो जारी कर अपनी बात रखी। यह घटना जिले के साथ ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है।
आमतौर पर किसी भी राजनीतिक दल में संगठनात्मक नियुक्तियां काफी सोच-समझकर की जाती हैं। ऐसे मामलों में संबंधित कार्यकर्ता से सहमति लेना एक अहम प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन इस मामले में यह प्रक्रिया विवाद की जड़ बन गई।
भाजपा ने आलीराजपुर मंडल अध्यक्ष पद पर प्रदीप गोजा को चुना था। वहीं नानपुर ग्रामीण मंडल अध्यक्ष पद सुजीत चौहान को दिया गया। यह घोषणा हाल ही में की गई थी। घोषणा के तुरंत बाद दोनों युवाओं ने आपत्ति जताई।
दोनों ने साफ कहा कि वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि उन्हें इस नियुक्ति की कोई जानकारी नहीं दी गई। न तो उनसे चर्चा हुई और न अनुमति ली गई। इससे यह सवाल उठता है कि नियुक्ति सूची किस आधार पर तैयार की गई थी।
इस तरह की घटनाएं जमीनी स्तर पर संगठन की जानकारी और तालमेल पर भी सवाल खड़े करती हैं। जब किसी कार्यकर्ता की राजनीतिक पृष्ठभूमि की पुष्टि नहीं होती, तो नियुक्ति के बाद इस तरह का विवाद सामने आ सकता है।
प्रदीप गोजा और सुजीत चौहान ने वीडियो संदेश जारी किया। उन्होंने बताया कि वे पहले से कांग्रेस से जुड़े हैं और आगे भी जुड़े रहेंगे। उन्हें भाजपा के किसी संगठनात्मक पद पर रहने की कोई इच्छा नहीं है।
दोनों नेताओं ने यह भी कहा कि अगर पार्टी पहले उनसे बात करती तो स्थिति साफ हो जाती। इस घटना के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। किसी को बड़ी जिम्मेदारी देने से पहले उसकी सहमति क्यों नहीं ली गई।
उनका यह भी कहना है कि वीडियो जारी करना उनके लिए जरूरी हो गया था। वे नहीं चाहते थे कि लोगों के बीच उनकी राजनीतिक पहचान को लेकर कोई भ्रम फैले। इसीलिए उन्होंने खुलकर अपनी स्थिति सार्वजनिक की।
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अजा मोर्चा जिलाध्यक्ष सोहन डोडवे ने इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मीडिया से कहा कि किसी भी नियुक्ति में लापरवाही नहीं होती। कार्यकर्ताओं का पुराना रिकॉर्ड देखा जाता है। वरिष्ठ नेताओं से भी बातचीत की जाती है।
डोडवे ने कुछ फोटो और वीडियो का हवाला भी दिया। उनका दावा है कि दोनों युवा पार्टी के कार्यक्रमों में नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं। उनके अनुसार, दोनों मंडल की सूची बनाने में भी शामिल थे। वे लगातार पार्टी के संपर्क में भी थे।
डोडवे के मुताबिक, पार्टी के पास इन दावों से जुड़े सबूत मौजूद हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों नेताओं का व्यवहार पहले अलग था। ऐसे में उनका अचानक विरोध जताना पार्टी के लिए भी हैरानी की बात है।
इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ प्रदीप गोजा और सुजीत चौहान कह रहे हैं कि उनसे कोई सहमति नहीं ली गई। दूसरी तरफ पार्टी का कहना है कि वे लगातार सक्रिय रहे हैं।
ऐसे में सच्चाई क्या है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है। लेकिन इतना जरूर है कि इस विवाद ने आलीराजपुर की संगठनात्मक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इसका असर पार्टी की स्थानीय छवि पर भी पड़ सकता है।
जिलाध्यक्ष ने कहा कि उनके अचानक रुख बदलने की वजह वही बेहतर बता सकते हैं। उन्होंने आगे की रणनीति साफ नहीं की। उनका कहना है कि पार्टी संगठन से जो निर्देश मिलेंगे, उसी अनुसार फैसला लिया जाएगा।
यह मामला अब स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में भाजपा इस पर क्या फैसला लेती है, यह देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस खेमे से भी इस पर प्रतिक्रिया आ सकती है।
फिलहाल दोनों नियुक्तियां विवादों में घिरी हुई हैं। यह देखना बाकी है कि पार्टी इन पदों पर नए सिरे से नियुक्ति करती है या मामला किसी और तरीके से सुलझाया जाता है। स्थानीय कार्यकर्ताओं और जनता की नजर अब पार्टी के अगले कदम पर टिकी हुई है।
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आलीराजपुर जिले में बीजेपी की एक नियुक्ति ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। पार्टी ने अनुसूचित जाति मोर्चा (SC Morcha – Scheduled Caste Wing) के तहत दो मंडल अध्यक्ष बनाए थे। लेकिन दोनों नवनियुक्त नेताओं ने पद लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने वीडियो जारी कर अपनी बात रखी। यह घटना जिले के साथ ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है।
आमतौर पर किसी भी राजनीतिक दल में संगठनात्मक नियुक्तियां काफी सोच-समझकर की जाती हैं। ऐसे मामलों में संबंधित कार्यकर्ता से सहमति लेना एक अहम प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन इस मामले में यह प्रक्रिया विवाद की जड़ बन गई।
क्या हुआ पूरा मामला
दोनों ने साफ कहा कि वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि उन्हें इस नियुक्ति की कोई जानकारी नहीं दी गई। न तो उनसे चर्चा हुई और न अनुमति ली गई। इससे यह सवाल उठता है कि नियुक्ति सूची किस आधार पर तैयार की गई थी।
इस तरह की घटनाएं जमीनी स्तर पर संगठन की जानकारी और तालमेल पर भी सवाल खड़े करती हैं। जब किसी कार्यकर्ता की राजनीतिक पृष्ठभूमि की पुष्टि नहीं होती, तो नियुक्ति के बाद इस तरह का विवाद सामने आ सकता है।
दोनों नेताओं का पक्ष
दोनों नेताओं ने यह भी कहा कि अगर पार्टी पहले उनसे बात करती तो स्थिति साफ हो जाती। इस घटना के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। किसी को बड़ी जिम्मेदारी देने से पहले उसकी सहमति क्यों नहीं ली गई।
उनका यह भी कहना है कि वीडियो जारी करना उनके लिए जरूरी हो गया था। वे नहीं चाहते थे कि लोगों के बीच उनकी राजनीतिक पहचान को लेकर कोई भ्रम फैले। इसीलिए उन्होंने खुलकर अपनी स्थिति सार्वजनिक की।
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मोर्चा जिलाध्यक्ष ने दी सफाई
डोडवे ने कुछ फोटो और वीडियो का हवाला भी दिया। उनका दावा है कि दोनों युवा पार्टी के कार्यक्रमों में नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं। उनके अनुसार, दोनों मंडल की सूची बनाने में भी शामिल थे। वे लगातार पार्टी के संपर्क में भी थे।
डोडवे के मुताबिक, पार्टी के पास इन दावों से जुड़े सबूत मौजूद हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों नेताओं का व्यवहार पहले अलग था। ऐसे में उनका अचानक विरोध जताना पार्टी के लिए भी हैरानी की बात है।
दो अलग-अलग दावे, एक जैसा सवाल
ऐसे में सच्चाई क्या है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है। लेकिन इतना जरूर है कि इस विवाद ने आलीराजपुर की संगठनात्मक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इसका असर पार्टी की स्थानीय छवि पर भी पड़ सकता है।
अब आगे क्या होगा
यह मामला अब स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में भाजपा इस पर क्या फैसला लेती है, यह देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस खेमे से भी इस पर प्रतिक्रिया आ सकती है।
फिलहाल दोनों नियुक्तियां विवादों में घिरी हुई हैं। यह देखना बाकी है कि पार्टी इन पदों पर नए सिरे से नियुक्ति करती है या मामला किसी और तरीके से सुलझाया जाता है। स्थानीय कार्यकर्ताओं और जनता की नजर अब पार्टी के अगले कदम पर टिकी हुई है।
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