भोपाल नगर निगम की मिलीभगत? जिंसी स्लॉटर हाउस से मुंबई भेजा गया गोमांस

भोपाल के जिंसी स्थित नगर निगम स्लॉटर हाउस में गोवंश के वध का बड़ा खुलासा हुआ है। दस्तावेजों के अनुसार नगर निगम प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। भैंस के नाम पर गोमांस को प्रमाणित कर मुंबई भेजने का खेल खेला गया।

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Aman Vaishnav
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News In Short

  • पशु चिकित्सा अधिकारी ने 85 भैंसों के वध का संदिग्ध प्रमाणपत्र जारी किया।
  • पुलिस के जरिए लिए गए मांस के सैंपल में लैब जांच के दौरान गोमांस की पुष्टि हुई है।
  • बैतूल के रास्ते 160 गोवंश के बछड़े गुपचुप तरीके से स्लॉटर हाउस लाए गए थे।
  • भोपाल नगर निगम ने कूलिंग व्यवस्था का बहाना बनाकर संदिग्ध कंटेनर को जब्त नहीं किया।
  • वध से पहले और बाद में होने वाले अनिवार्य स्वास्थ्य परीक्षण पर गंभीर सवाल।

पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. बेनीप्रसाद गौर द्वारा 17 दिसंबर 2025 ने एक पत्र जारी किया था। इस पत्र में डॉक्टर ने आधिकारिक रूप से प्रमाणित किया कि स्लॉटर हाउस में पिछले दो सप्ताह के दौरान 15 वर्ष से अधिक उम्र की 85 भैंसों का वध किया गया है। इसी प्रमाणपत्र को आधार बनाकर मांस को फ्रोजन मीट के रूप में पैक करके मुंबई भेजने की वैधानिक अनुमति दी गई थी।

सैंपल रिपोर्ट में गोमांस का खुलासा

हैरानी की बात यह है कि जिस खेप को डॉक्टर ने भैंस का मांस बताकर प्रमाणित किया था, पुलिस द्वारा उसी खेप से लिए गए सैंपल में गोमांस की पुष्टि हुई है। लैब रिपोर्ट आने के बाद सारा सच अब साफ हो चुका है। जिंसी स्लॉटर हाउस में या तो अवैध रूप से गायों का वध किया गया या फिर नगर निगम ने जानबूझकर गलत सर्टिफिकेट जारी किया। यह स्पष्ट है कि मांस के प्रकार को लेकर जानबूझकर गलत प्रमाणन जारी किया गया।

बछड़ों की तस्करी का बैतूल कनेक्शन

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 15 और 16 दिसंबर की दरमियानी रात दो अलग-अलग वाहनों के जरिए लगभग 160 गोवंश के बछड़े स्लॉटर हाउस के अंदर लाए गए थे। ये वाहन बैतूल के रास्ते होते हुए भोपाल पहुंचे थे। बताया जा रहा है कि इन्हीं बछड़ों का लगभग 26 टन मांस कंटेनर के जरिए मुंबई भेजने की तैयारी थी, जिसे बाद में पकड़ा गया।

रात का हंगामा और पुलिस की कार्रवाई

17 दिसंबर की रात जब यह 26 टन मांस कंटेनर में भरकर ले जाया जा रहा था, तब हिंदू संगठनों ने पुलिस कंट्रोल रूम के पास इसे रोक लिया। गोमांस होने की प्रबल आशंका पर वहां काफी हंगामा हुआ। हंगामे को बढ़ता देख जहांगीराबाद थाना पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मांस के सैंपल लिए और उन्हें जांच के लिए लैब भेजा, लेकिन आगे की कार्रवाई संदिग्ध रही।

पुलिस और निगम की रहस्यमयी ढिलाई

गोमांस की आशंका होने के बावजूद पुलिस ने उस कंटेनर को जब्त नहीं किया, बल्कि उसे नगर निगम के सुपुर्द कर दिया। नगर निगम प्रशासन ने यह तर्क दिया कि उनके पास मांस को सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। इसलिए कंटेनर को जाने दिया जाए। ताज्जुब की बात यह है कि वह कंटेनर पूरी तरह कूलिंग सिस्टम से लैस था। मांस खराब होने का कोई डर नहीं था। यदि कंटेनर जब्त होता तो गोमांस मुंबई नहीं पहुंच पाता।

अनिवार्य परीक्षण और नियमों का उल्लंघन

नियमानुसार, स्लॉटर हाउस में किसी भी मवेशी को काटने से पहले उसका एंटी मार्टम और कटने के बाद पोस्ट मार्टम परीक्षण नगर निगम के पशु चिकित्सक द्वारा किया जाना अनिवार्य है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब डॉक्टर ने स्वयं जांच की थी, तो वह गाय और भैंस के मांस में फर्क क्यों नहीं कर पाए? क्या बिना किसी वास्तविक जांच के ही भैंस का प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया था?

Sootr Knowledge

  • सतर्कता: किसी भी मांस उत्पाद को खरीदने से पहले उस पर लगे वैध सील और लैब सर्टिफिकेट की जांच जरूर करें।

  • अधिकार: अवैध वध की सूचना तुरंत स्थानीय पुलिस और पशुपालन विभाग को दें।

पूरा मामला जानने के लिए ये खबर भी पढ़िए...

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आगे क्या

इस खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिर सकती है। नगर निगम की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

यह मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मिलीभगत का संकेत देता है। गोवंश वध पर प्रतिबंध के बावजूद सरकारी तंत्र की नाक के नीचे यह खेल चलता रहा।

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