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News in Short
- मुंबई में बीजेपी प्रशिक्षण वर्ग से 'सुविधा साझा हो सकती है, प्रशिक्षण नहीं' का संदेश।
- संगठन में अनुशासन पर जोर, लचीलापन केवल लॉजिस्टिक्स में होगा।
- पार्टी 80-90 लाख कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखती है।
- प्रशिक्षण में समयपालन और कार्यकर्ता की सक्रिय भागीदारी जरूरी।
- क्या इस प्रशिक्षण से मध्य प्रदेश संगठन में बदलाव आएगा, यह देखना है।
News in Detail
मुंबई में बीजेपी के पश्चिम क्षेत्र प्रशिक्षण वर्ग से एक लाइन निकली। यह लाइन मध्य प्रदेश की सियासत में चर्चा का विषय बन गई। यह लाइन है 'सुविधा साझा हो सकती है, प्रशिक्षण नहीं'।
राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने कहा कि भोजन और ठहरने की व्यवस्था साथ हो सकती है। वैचारिक और संगठनात्मक सत्र अलग-अलग होंगे। संदेश साफ है लॉजिस्टिक्स में लचीलापन, अनुशासन में कोई समझौता नहीं। अब यह देखा जाएगा कि यह सख्ती एमपी संगठन की कार्यसंस्कृति को कैसे बदलती है।
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80-90 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुंचने की कवायद
पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण अभियान के तहत पार्टी देशभर में 80-90 लाख कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। मुंबई में आयोजित वेस्टर्न जोन के इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मुंबई के पदाधिकारी शामिल हुए। छह सत्रों और 14 विषयों के जरिए कार्यकर्ता के वैचारिक विकास से लेकर नेतृत्व कौशल तक पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रस्तावना सत्र को शिवप्रकाश ने संबोधित किया, जबकि सवाल-जवाब में संतोष ने संगठनात्मक स्पष्टता का संदेश दिया।
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कवरेज की नई परिभाषा: संख्या नहीं, गुणवत्ता
प्रशिक्षण में समयपालन और अनुशासन पर जोर दिया गया। सत्र तय समय पर शुरू होंगे। हर प्रतिनिधि की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। संगठन में कवरेज का मतलब केवल भीड़ नहीं है। प्रशिक्षित और जिम्मेदार कार्यकर्ता जरूरी है, जो विचार और कार्यपद्धति को जमीन तक ले जाए।
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एमपी के लिए क्या मायने?
मुंबई प्रशिक्षण में मध्य प्रदेश से करीब 25-30 प्रतिनिधि शामिल हुए। सवाल यह है कि क्या ये प्रतिनिधि प्रदेश में संगठनात्मक समन्वय और अनुशासन की नई धारा शुरू कर पाएंगे? हाल के महीनों में प्रदेश इकाई में बयानबाजी और आपसी मतभेदों की चर्चाएं रही हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा भी समय-समय पर संगठनात्मक मर्यादा की बात करते रहे हैं। ऐसे में यह प्रशिक्षण क्या जमीनी स्तर पर व्यवहार और संवाद की शैली बदल पाएगा यही असली कसौटी है।
औपचारिकता या कार्यसंस्कृति में बदलाव?
पार्टी की मंशा साफ है। मंडल से लेकर प्रदेश तक एक समान कार्यपद्धति और स्पष्ट जिम्मेदारी तय हो। अगर प्रशिक्षण के बाद समन्वय मजबूत हुआ, तो संगठन ज्यादा चुस्त और संदेश-केन्द्रित नजर आएगा। लेकिन यदि यह कवायद कागजी साबित हुई, तो बदलाव सीमित रहेगा।
अब परीक्षा मध्यप्रदेश में
मुंबई से जो संदेश निकला, वह संकेतों में नहीं, सीधे शब्दों में था। व्यवस्था साझा हो सकती है, पर संगठन का प्रशिक्षण अलग और अनुशासित रहेगा।
क्या यह पहल अंदरूनी खींचतान पर विराम लगाएगी और संगठन को एक सुर में काम करने की दिशा देगी? या फिर प्रशिक्षण की सीख जमीन पर उतरने से पहले ही ठंडी पड़ जाएगी? फिलहाल इतना तय है। पार्टी नेतृत्व ने मानक तय कर दिए हैं। अब अमल प्रदेश इकाई को करना है।
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