ओबीसी आरक्षण अब क्या होगा मोहन सरकार का अगला कदम? नया अध्यादेश या एक्ट का मास्टर स्ट्रोक बदलेगा पूरा खेल!

Sanjay Gupta | Oct 12, 2026, 12:30 IST
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ओबीसी आरक्षण पर मोहन सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां
ओबीसी आरक्षण पर मोहन सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां

ओबीसी आरक्षण के मामले में हाईकोर्ट के फैसले से बीजेपी सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इससे पहले भी आरक्षण से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके हैं। इनमें से एक मामला अब तक लंबित बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अब मोहन सरकार क्या मास्टर स्ट्रोक चलाएगी? क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई बड़ा दांव चलेंगे?

मध्यप्रदेश में ओबीसी की आबादी 52 फीसदी होने का दावा किया जाता है। इसी की राजनीति में अब बीजेपी सरकार उलझ गई है। हाईकोर्ट ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने वाले कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है। अब सरकार इस फैसले पर रोक लगवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। हालांकि 2003 से जुड़ा एक मामला पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। उस पर अब तक फैसला नहीं आने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मोहन सरकार अब क्या करेगी?

ओबीसी आरक्षण पर बड़ा झटका: 27% आरक्षण रद्द, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति के निर्देश | Big blow to OBC reservation: 27% reservation cancelled, directions for appointment of unreserved category in 13% hold posts
27% OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को नियुक्ति के निर्देश
09 Oct 2026 ,
By Neel Tiwari
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।

नया अध्यादेश लाओ और सदन में नया एक्ट

मध्यप्रदेश में बीजेपी साल 2003 से (15 माह छोड़कर) सत्ता में रही है। इस दौरान बीजेपी सरकार ने ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के लिए कोई नया कानून नहीं बनाया। अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास बड़ा दांव चलने का मौका हो सकता है।

सरकार चाहे तो नया अध्यादेश लाकर ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने की कोशिश कर सकती है। इसके बाद विधानसभा का सत्र शुरू होने पर नया विधेयक पेश किया जा सकता है। विधानसभा से इसे पारित कराकर कानून बनाने का रास्ता अपनाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए जरूरी संवैधानिक शर्तों को पूरा करना होगा।

इसके लिए यह करना जरूरी

इसके लिए मोहन सरकार को दो जरूरी काम करने होंगे। बताया जा रहा है कि इन्हीं दो कमियों की वजह से 2019 का ओबीसी आरक्षण कानून हाईकोर्ट में नहीं टिक पाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इसमें आंकड़े पुराने दिए गए। साल 1983 की महाजन रिपोर्ट के आंकड़े ही प्रमुख रूप से सामने आए। साथ ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से कोई सलाह नहीं ली गई, जबकि संवैधानिक रूप से भी यह लिया जाना जरूरी था। साल 2019 में जब एक्ट आया उस समय के तत्कालीन कोई आंकड़े ओबीसी को लेकर नहीं थे। यानी कि बीजेपी सरकार को यह लेना होंगे।

दूसरी अहम बात कही कि सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी नहीं दिखी। खुद सरकार ने ही ओबीसी के लिए तय पद रिक्त रखे हैं। इसके भी विस्तृत आंकड़े सरकार को देना होंगे और बताना होगा कि नौकरियों में प्रतिनिधित्व की कमी है।

1992 के इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को लेकर अहम फैसला दिया था। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों का ठोस आधार होना जरूरी है। ऐसे में मोहन सरकार को भी नए कानून के लिए यह साबित करना होगा कि मध्यप्रदेश में ऐसी कौन सी खास परिस्थितियां हैं जिनके आधार पर 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण दिया जाना चाहिए।

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INDORE. मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद थी। अब इसी फैसले के बाद बड़े संकट की घंटी बज गई है। एमपी लोक सेवा आयोग (MPPSC) और कर्मचारी चयन मंडल (ESB) की आने वाली भर्तियों और परीक्षा परिणामों पर इसका असर पड़ सकता है।
INDORE. मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद थी। अब इसी फैसले के बाद बड़े संकट की घंटी बज गई है। एमपी लोक सेवा आयोग (MPPSC) और कर्मचारी चयन मंडल (ESB) की आने वाली भर्तियों और परीक्षा परिणामों पर इसका असर पड़ सकता है।

एमपी में ओबीसी आरक्षण की यह चौथी कोशिश थी

मध्यप्रदेश में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने की कोशिश पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी तीन बार ऐसा प्रयास किया जा चुका है। खास बात यह है कि चारों कोशिशें कांग्रेस सरकार के समय हुई थीं। आइए जानते हैं कि कब-कब आरक्षण बढ़ाने की कोशिश हुई और मामला कहां अटक गया।

साल 1995: उस समय मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के लिए बिल पास किया। हालांकि राष्ट्रपति ने इसे वापस लौटा दिया। इसकी वजह इंदिरा साहनी केस और आरक्षण की 50 फीसदी सीमा बताई गई।

साल 2002: दिग्विजय सिंह सरकार ने एक बार फिर ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की कोशिश की। इसके लिए दोबारा 27 फीसदी आरक्षण का बिल पास किया गया। हालांकि इस बार भी राष्ट्रपति ने बिल वापस लौटा दिया।

साल 2003: तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रस्ताव के जरिए ओबीसी को सीधे 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया। इसके बाद मामला अदालत पहुंच गया। साल 2014 में हाईकोर्ट ने मनीष मिश्रा केस में इस फैसले को रद्द कर दिया। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह मामला अब तक लंबित बताया जा रहा है।

साल 2019: इस बार मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। सरकार ने अध्यादेश लाकर ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और अदालत ने इस पर रोक लगा दी। करीब सात साल तक कानूनी लड़ाई चली। आखिरकार 9 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट ने 27 फीसदी आरक्षण वाले कानून को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया।

यानी मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की चार कोशिशें हो चुकी हैं। हर बार कानूनी अड़चनें सामने आईं। अब सवाल है कि मोहन सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाएगी?

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