हाईकोर्ट फैसले में लिखा- मप्र में चार OBC सीएम, 25 फीसदी मंत्री, प्रतिनिधित्व पर्याप्त, UR से भी मिलते हैं पद

Sanjay Gupta | Oct 09, 2026, 17:45 IST
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OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला
OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला

INDORE. ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) केस में हाईकोर्ट में मप्र सरकार हार गई। ओबीसी के आरक्षण की सीमा 14 फीसदी ही रखने का फैसला हुआ है। इस फैसले की ये बड़ी वजह सामने आई है। फैसले में लिखा गया है कि मप्र में एक चौथाई समय तो ओबीसी सीएम रहे हैं।

जबलपुर हाईकोर्ट जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने ओबीसी आरक्षण पर 159 पेज का आदेश जारी कर दिया। इसमें सरकार को बड़ा झटका लगा है और ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने का कोई असाधारण परिस्थितजन्य कारण नहीं पाया गया है। इस मामले ने सरकार को बुरी तरह से राजनीतिक चोट दी है। इस फैसले का 'द सूत्र' ने अध्ययन किया और इसमें चार सबसे बड़ी वजह सामने आई है।

ओबीसी आरक्षण के लिए यह एक वजह चाहिए थी

ओबीसी आरक्षण की राह में एक ही बड़ी बाधा थी वह था इंदिरा साहनी केस 1992 का। इसमें आरक्षण सीमा 50 फीसदी तय की है। हालांकि, ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने मान्य किया है, लेकिन अतिरिक्त आरक्षण के लिए सरकार को 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तोड़ने के लिए बताना था कि मप्र में असाधारण परिस्थिति है, इसलिए यह जरूरी है।

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OBC आरक्षण पर अभी खत्म नहीं हुई लड़ाई! सुप्रीम कोर्ट जा सकती है मोहन सरकार, द सूत्र ने पहले ही दिए थे संकेत
09 Oct 2026 ,
By Sumit Kumar
OBC Reservation: मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण को लेकर कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। हाई कोर्ट के फैसले को सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
OBC Reservation: मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण को लेकर कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। हाई कोर्ट के फैसले को सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

किस आधार पर हुई 27 फीसदी आरक्षण की मांग...

  1. इसमें बड़ा कारण बताया था कि मप्र में 52 फीसदी ओबीसी आबादी है और पूरा प्रतिनिधित्व नहीं है।
  2. दूसरा कारण बताया गया कि नौकरियों में प्रतिनिधित्तव आबादी के हिसाब से नहीं।
  3. ओबीसी कमीशन की विविध रिपोर्ट खासकर 1983 की महाजन रिपोर्ट को हवाला दिया गया।

चार-चार सीएम, 25 फीसदी मंत्री ओबीसी के

इस मामले में यह बात कि मप्र में ओबीसी को प्रतिनिधित्व बराबर नहीं मिलता है। उनके साथ अन्याय हो रहा है, इस पर मप्र में चार ओबीसी सीएम का तर्क उठा। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ( MP High Court ) के 159 पन्नों के फैसले में लिखा गया है कि मप्र में एक चौथाई समय तो ओबीसी सीएम रहे हैं। यहां चार-चार सीएम ओबीसी के रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उमा भारती फिर बाबूलाल गौर, फिर शिवराज सिंह चौहान और इसके बाद अब डॉ. मोहन यादव सभी ओबीसी से हैं। वहीं यह भी बात लिखी गई कि कैबिनेट में भी 25 फीसदी मंत्री और विधायक ओबीसी वर्ग के हैं।

ऐसे में प्रतिनिधित्व की कोई कमी नहीं है। इस डेटा और इस तथ्य को देखते हुए कि राज्य में राजनीतिक रूप से OBC का दबदबा है। राजनीतिक, शैक्षिक, आर्थिक या सामाजिक क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व की कमी की बात करने का कोई आधार नहीं बनता। सभी पैमाने पर्याप्त प्रतिनिधित्व और कुल मिलाकर स्थिति में सुधार दिखाते हैं।

ऐसे स्वागत योग्य कदमों की सराहना की जानी चाहिए, न कि उन पर अफ़सोस जताया जाना चाहिए। बहुत कुछ किया गया है। फिर भी, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

ओबीसी आरक्षण पर बड़ा झटका: 27% आरक्षण रद्द, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति के निर्देश | Big blow to OBC reservation: 27% reservation cancelled, directions for appointment of unreserved category in 13% hold posts
27% OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को नियुक्ति के निर्देश
09 Oct 2026 ,
By Neel Tiwari
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।

नौकरियों में प्रतिनिधित्व पूरा, सरकार ने पद रिक्त रखे

वहीं नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व की बात कही गई। लेकिन सरकारी आंकड़ों से ही बताया गया कि प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है। पद मंजूर है लेकिन सरकार ने ही पूरे पद नहीं भरे हैं. सरकारी नौकरियों में से लगभग 63.76% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को प्राप्त हैं। इसमें भी पिछड़ा वर्ग के पास 28.16 फीसदी पद है।

मप्र में ओबीसी के लिए स्वीकृत सरकारी पदों की कुल संख्या 1,69,304 है। सभी श्रेणियों में ओबीसी के लिए विशेष रूप से स्वीकृत पदों में से 51.17% पद रिक्त हैं और राज्य द्वारा भरे नहीं गए हैं। यह पद भरने पर सभी पदों पर उनका प्रतिनिधित्व वर्तमान स्तर से दोगुना हो जाएगा।

नौकरियों में ओबीसी
नौकरियों में ओबीसी

यूआर में से भी ओबीसी को मिल रहे पद

वहीं हाईकोर्ट में साल 2014 से लेकर अभी तक की पीएससी व अन्य भर्तियों को लेकर आंकड़े दिए गए। इसमें हाईकोर्ट में भी निकली विविध भर्तियों के आंकड़े दिए गए। इसमें बताया गया कि अनारक्षित के लिए भले ही 50 फीसदी पद रहते हैं। लेकिन सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को केवल 20 से 25 पद ही मिलते हैं।

अनारक्षित में भी एसटी, एससी, ओबीसी कैटेगरी उम्मदीवार मेरिट से सीट लेते हैं। इस तरह 70 से 75 फीसदी पद एसटी, एससी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस के पद जाते हैंं। कई बार ओपन कैटेगरी में सामान्य को केवल 15-20 फीसदी पद ही मिलते हैं।

मध्य प्रदेश राज्य में, कुल 60% सीटें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि 40% सीटें खुली श्रेणी में हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि ओबीसी समुदाय अपने आरक्षण कोटा के माध्यम से 14% सीटें और शेष 20% सीटें खुली प्रतियोगिता से प्राप्त कर रहे हैं।

अनारक्षित केटेगरी से इस तरह ओबीसी को मिलते हैं पद
अनारक्षित केटेगरी से इस तरह ओबीसी को मिलते हैं पद

महाजन आयोग की रिपोर्ट

वहीं, यह बात भी उठी कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा 1996-97 और 2019-20 में की गई सिफारिशें, महाजन आयोग की 1983 की रिपोर्ट पर आधारित हैं। नए सिरे से आंकड़े नहीं आए हैं। इसलिए 2019 के संशोधन अधिनियम के समय, केवल महाजन समिति की 1983 की रिपोर्ट ही उपलब्ध थी। कोटा समकालीन होना चाहिए और पुराना नहीं होना चाहिए।

1983 और 2019 के बीच का समय अंतर काफी लंबा है। उस समय मध्यप्रदेश की जनसंख्या 5.21 करोड़ थी और अब 7.26 करोड़ (साल 2011 के तहत) है। वहीं 2000 में मध्य प्रदेश राज्य का विभाजन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कर दिया गया। अतः 1983 में किया गया सर्वेक्षण को इस समय प्रासंगिक नहीं माना जा सकता।

वहीं, महाजन आयोग में केवल राजनीतिक सदस्य थे और कोई भी विषय-विशेषज्ञ या डोमेन एक्सपर्ट शामिल नहीं था।मध्य प्रदेश स्टेट कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेस एक्ट' (MPSBC एक्ट) की भावना और नियमों के खिलाफ था।

दोनों कानूनों में यह प्रावधान है कि कुछ गैर-सरकारी सदस्य विषय-विशेषज्ञ होने चाहिए या उन्हें पिछड़े वर्गों से जुड़े मामलों में विशेष जानकारी होनी चाहिए। वहीं BRAUSS रिपोर्ट की बात है, यह साल 2019 के बाद की घटना के बाद की रिपोर्ट है, लेकिन इसमें 7.26 करोड़ की आबादी के मुकाबले सिर्फ 10,000 लोगों का सर्वे किया गया।

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09 Oct 2026 ,
By Sanjay Gupta
मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर आज बड़ा फैसला आ सकता है। शुक्रवार को यह मामला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डबल बेंच में सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि लंच के बाद कोर्ट इस मामले में फैसला सुना सकता है।
मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर आज बड़ा फैसला आ सकता है। शुक्रवार को यह मामला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डबल बेंच में सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि लंच के बाद कोर्ट इस मामले में फैसला सुना सकता है।

मप्र में पिछड़े नहीं है ओबीसी

वहीं विविध रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट में आया कि मप्र में ओबीसी उतने पिछड़े नहीं है। यहां पर ग्रेजुएट या उससे ऊंची डिग्री वाले OBC (23.91%) राज्य के कुल औसत (4.4%) से 540% ज़्यादा हैं। यह राष्ट्रीय औसत (5.6%) से भी 420% ज्यादा है।ॉ

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डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था

संविधान सभा की बहसों में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद साफ किया था कि आरक्षण सीटों के एक छोटे हिस्से के लिए ही होगा। ताकि प्रशासन में कुशलता बनी रहे और काबिलियत को आगे बढ़ने का मौका मिले।

वहीं, हाईकोर्ट ने यह भी लिखा कि आरक्षण कोई मुद्दा नहीं है। असल मुद्दा आरक्षण का दायरा है। अगर आरक्षण का दायरा बहुत ज्यादा है, तो यह आर्टिकल 16(1) के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। आरक्षण का दायरा हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

पिछड़ापन और प्रतिनिधित्व की कमी, राज्य सरकारों के लिए सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने के ठोस कारण हो न कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर। इसलिए, अगर किसी मामले में कोर्ट को राज्य के कानून के तहत जरूरत से ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलता है, तो ऐसे कानून को रद्द किया जा सकता है क्योंकि यह संवैधानिक जरूरतों का उल्लंघन होगा।

FAQ:

  1. जबलपुर हाईकोर्ट के 159 पन्नों के आदेश का मुख्य आकर्षण क्या है?
    जबलपुर हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण पर आदेश दिया है कि मध्य प्रदेश सरकार को 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण देने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिससे सरकार को एक बड़ा झटका लगा है।
  2. मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण की मांग के पीछे क्या कारण थे?
    ओबीसी आरक्षण की मांग के पीछे दो मुख्य कारण हैं: एक, मध्य प्रदेश में 52 फीसदी ओबीसी आबादी है और उनके लिए उचित प्रतिनिधित्व नहीं है; दूसरा, सरकारी नौकरियों में ओबीसी का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुरूप नहीं है।
  3. हाईकोर्ट के फैसले का राजनीतिक प्रभाव क्या हो सकता है?
    हाईकोर्ट का यह फैसला सरकार के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक है क्योंकि यह दर्शाता है कि ओबीसी वर्ग के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और सरकार ने इस मामले में अपनी दलीलें साबित करने में असफल रही है।
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