आरटीओ कांस्टेबल सौरभ शर्मा केस में हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
Neel Tiwari | Jun 10, 2026, 18:22 IST
Photograph: (the sootr)
एमपी के चर्चित RTO भ्रष्टाचार मामले के आरोपी सौरभ शर्मा की 60 दिन की अस्थायी जमानत पर हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। शाम तक ऑर्डर आने की उम्मीद।
पांच पाइंट में समझें पूरा मामला
- जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने सौरभ शर्मा की टेंपरेरी बेल पर फैसला सुरक्षित रखा।
- जिला अदालत और हाईकोर्ट पहले उसकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर चुके हैं।
- इस बार पत्नी दिव्या तिवारी की सर्जरी और दो बच्चों की देखभाल को आधार बनाया गया है।
- पहले हाईकोर्ट ने 108 करोड़ की संपत्ति, 51 किलो सोना और मनी लॉन्ड्रिंग के सबूतों का हवाला देकर जमानत ठुकराई थी।
- कानूनी जानकारों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के चलते जमानत मामले में फैसला जल्द अपलोड किया जा सकता है।
60 दिन की अस्थायी जमानत याचिका पर सुनवाई
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हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद किया फैसला सुरक्षित
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सौरभ शर्मा की नियमित जमानत याचिका नहीं, बल्कि अस्थायी जमानत (टेंपरेरी बेल) का आवेदन है। इससे पहले जिला एवं सत्र न्यायालय भोपाल उसकी जमानत याचिका खारिज कर चुका है और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी नियमित जमानत देने से साफ इनकार कर दिया था।
पत्नी की बीमारी और बच्चों की देखभाल बना आधार
सौरभ शर्मा ने यह भी तर्क दिया है कि उसके दो नाबालिग बच्चे अवीर और सुवीर पूरी तरह अपने माता-पिता पर निर्भर हैं। पत्नी के अस्पताल में भर्ती रहने और सर्जरी के बाद रिकवरी के दौरान बच्चों की देखभाल करने वाला कोई अन्य जिम्मेदार सदस्य उपलब्ध नहीं है। इसी मानवीय आधार पर 60 दिन की अस्थायी जमानत मांगी गई है।
बड़ा सवाल: रिश्तेदार और करीबी कहां गए?
ईडी के रिकॉर्ड के अनुसार चेतन सिंह गौर, शरद जायसवाल और रोहित तिवारी जैसी हस्तियां उसकी कंपनियों से जुड़ी थीं। पत्नी दिव्या तिवारी, मां उमा शर्मा, सास रेखा तिवारी और अन्य रिश्तेदारों के नाम पर जमीन, कंपनियां, स्कूल प्रोजेक्ट, पेट्रोल पंप और अन्य संपत्तियां होने का दावा जांच एजेंसियों ने किया था। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि जब कथित तौर पर पूरा आर्थिक साम्राज्य इतने लोगों के सहारे संचालित हो रहा था तो पत्नी के इलाज और बच्चों की देखभाल के लिए कोई आगे क्यों नहीं आ रहा।
पहली बार क्यों खारिज हुई थी हाईकोर्ट से जमानत?
हाईकोर्ट के समक्ष ईडी ने दावा किया था कि महज 28 हजार रुपए मासिक वेतन पाने वाले एक परिवहन आरक्षक ने 108.24 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का साम्राज्य खड़ा कर लिया। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि यह संपत्तियां परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों और विभिन्न कंपनियों के नाम पर अर्जित की गई थीं। अदालत ने माना था कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री आरोपी की सक्रिय भूमिका की ओर संकेत करती है।
51 किलो सोना, 11.60 करोड़ नकदी और 108 करोड़ की जब्ती
इसके अलावा ईडी ने अदालत को बताया था कि कुल 108.24 करोड़ रुपए मूल्य की संपत्ति जब्त, फ्रीज या अटैच की जा चुकी है। इसमें बैंक खातों की राशि, सोना-चांदी, नकदी और विभिन्न संपत्तियां शामिल हैं। जांच एजेंसियों ने इसे ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ यानी अपराध की कमाई बताया था।
सह-आरोपियों और परिजनों के बयानों ने बढ़ाई मुश्किलें
पत्नी दिव्या तिवारी ने कथित तौर पर कहा था कि वह कई कंपनियों में डायरेक्टर जरूर थीं, लेकिन उन्हें आर्थिक लेनदेन और संपत्तियों की खरीद-फरोख्त की जानकारी नहीं थी तथा वह केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करती थीं। इसी प्रकार मां उमा शर्मा और सास रेखा तिवारी के बयानों का भी ईडी ने उल्लेख किया था, जिनमें कई संपत्तियों और बैंक खातों के संचालन में सौरभ शर्मा की भूमिका का दावा किया गया था।
ईडी ने बताया था कैसे बना कथित लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट
जांच में यह भी दावा किया गया कि कुछ कंपनियां और संस्थाएं केवल कागजों पर मौजूद थीं तथा उनके माध्यम से धन को एक खाते से दूसरे खाते में घुमाया जाता था। ईडी ने इसे सुनियोजित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क बताया था।
क्या मानवीय आधार से मिलेगी राहत?
फिलहाल पूरे प्रदेश की नजरें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई हैं। एक ओर 108 करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति, 51 किलो सोना, करोड़ों की नकदी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं, तो दूसरी ओर पत्नी के इलाज और बच्चों की देखभाल का मानवीय पक्ष। अब देखना यह होगा कि हाईकोर्ट इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।
Ed के सामने सौरभ सहित उसकी मां, पत्नी और सह आरोपियों ने यह दिए थे बयान
दिव्या तिवारी (पत्नी) मैं कई कंपनियों में डायरेक्टर जरूर हूं लेकिन कारोबार की जानकारी नहीं है। जमीन, मकान और अन्य निवेश संबंधी निर्णय सौरभ शर्मा लेते थे। मैं केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करती थी। पैसों का स्रोत क्या था, इसकी जानकारी सौरभ शर्मा ही दे सकते हैं।
उमा शर्मा (मां) जयपुरिया स्कूल परियोजना सौरभ शर्मा की पहल पर शुरू हुई थी। मुझे केवल संस्था की चेयरपर्सन बनाया गया था। संस्था और स्कूल के वित्तीय संचालन की जानकारी नहीं थी। अधिकांश निर्णय सौरभ शर्मा ही लेते थे।
रेखा तिवारी (सास) मेरे नाम पर दर्ज कई संपत्तियां वास्तव में सौरभ शर्मा ने खरीदी थीं। बैंक खाते खुलवाने और उनका संचालन भी सौरभ शर्मा के निर्देश पर हुआ। हस्ताक्षरित चेकबुक तक सौरभ शर्मा को सौंप दी गई थी। खाते से किसे भुगतान हुआ, इसकी जानकारी मुझे नहीं थी।
शरद जायसवाल (कंपनी डायरेक्टर और सहयोगी) मेरी आय सीमित थी, लेकिन करोड़ों रुपये के लेनदेन दिखाए गए। कई संपत्तियों की खरीद के लिए धन चेतन गौर के माध्यम से उपलब्ध कराया गया। स्कूल निर्माण परियोजना की निगरानी सौरभ शर्मा के निर्देश पर करता था। इनोवा कार का उपयोग सौरभ शर्मा करता था।
विनय हासवानी (रिश्तेदार) सौरभ शर्मा के ड्राइवर के कहने पर इनोवा कार को सुरक्षित स्थान पर पार्क कराया गया। कार को भोपाल के बरखेड़ी कलां स्थित प्लॉट पर खड़ा कराया गया था। शरद जायसवाल को दिया गया ब्याज मुक्त ऋण भी सौरभ शर्मा की गारंटी पर दिया गया था।
सौरभ शर्मा मेरे खिलाफ झूठा मामला बनाया गया है। घर से मिली नकदी मेरी मां की थी। अधिकांश संपत्तियों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। मैंने केवल परिचितों को ऋण दिलाने में मदद की थी। परिवहन विभाग छोड़ने के बाद मैं मछली व्यापार शुरू करना चाहता था।
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