जिस पत्थर को सदियों तक पूजते रहे आदिवासी, वो निकला डायनासोर काल का जीवाश्म
Aman Vaishnav | Aug 10, 2026, 13:50 IST
बैगा आदिवासी के देवता निकले जीवाश्म
डिंडोरी में बैगा आदिवासी जिस पत्थर की सालों से पूजा करते आ रहे थे, वह करीब 6.5 करोड़ साल पुराना दुर्लभ कोरल जीवाश्म निकला है। यानी यह उस जमाने का है, जब धरती पर टी-रेक्स और भारत में राजासॉरस नर्मदेंसिस जैसे डायनासोर घूमा करते थे।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में एक पुराना रहस्य सुलझ गया है।
- बैगा जनजाति सदियों से एक पत्थर को पवित्र मानकर पूजती आई है।
- वैज्ञानिक जांच में यह पत्थर 6.5 करोड़ साल पुराना कोरल जीवाश्म निकला।
- यह उस दौर का अवशेष है जब डायनासोर धरती पर घूमते थे।
- पुरातत्व विभाग अब इसे भोपाल के संग्रहालय में प्रदर्शित करने की तैयारी कर रहा है।
अब विज्ञान ने इसे इतिहास का एक अनमोल पन्ना बता दिया है। यह कहानी आस्था और विज्ञान के मिलन की है।
पवित्र पत्थर की सच्चाई
यह पत्थर एक मंदिर जैसी संरचना में स्थित है। यह जगह समनापुर तहसील में आती है। डिंडोरी जिला अपने घने जंगलों और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां के जंगल सदियों से मानव बस्तियों का हिस्सा रहे हैं।
मध्य प्रदेश पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय निदेशालय की टीम डिंडोरी के भूवैज्ञानिक खजाने का दस्तावेजीकरण कर रही थी। टीम ने सबसे पहले इस संरचना की तस्वीरें देखीं।
इसकी परतदार बनावट प्रवाल जैसी दिखी। यह बनावट देखकर कई सवाल उठे। इसके बाद स्थल का निरीक्षण हुआ। कई वैज्ञानिक परीक्षण भी किए गए। जांच में पुष्टि हुई कि यह असल में एक कोरल जीवाश्म है। यह पुष्टि पूरी कहानी का केवल आधा हिस्सा थी।
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6.5 करोड़ साल पुरानी दुनिया
उसी दौर में मेक्सिको के युकातान प्रायद्वीप से एक विशाल क्षुद्रग्रह टकराया। इसके साथ भारत के दक्कन ट्रैप में तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधि भी हुई। दोनों घटनाओं ने मिलकर एक वैश्विक परमाणु शीत ऋतु पैदा की।
इस बदलाव ने करीब 75% जीवन को खत्म कर दिया। यहीं से डायनासोर युग का अंत हुआ। इसके बाद छोटे स्तनधारियों के लिए रास्ता खुला।
डिंडोरी में मिला यह जीवाश्म उसी पुरानी दुनिया की निशानी है। यह जानकारी वैज्ञानिकों के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।
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एएसआई विशेषज्ञ की राय
लोग प्रकृति की पूजा करते थे। एक चट्टान, एक पेड़ या एक पहाड़ पवित्र माना जाता था। बाद में ऐसी जगहों को तीर्थस्थल के रूप में चिन्हित कर दिया जाता था। यह परंपरा पीढ़ियों तक चलती रही।
पुरातत्व आयुक्त मदन कुमार नागरजोगे ने डिंडोरी की भूवैज्ञानिक संपदा के दस्तावेजीकरण का नेतृत्व किया। उनका कहना है कि आदिवासी समुदाय के पास वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे।
फिर भी उनमें यह समझने की सूझ-बूझ थी कि वे कुछ अनमोल की रक्षा कर रहे हैं। यह सूझ-बूझ पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।
बैगा समुदाय और बैगाचक
ये जंगल डिंडोरी के हजारों गांवों में बैगा जीवन के केंद्र में हैं। यहां से समुदाय को भोजन, औषधि और आजीविका मिलती है। यह जगह पारंपरिक ज्ञान को भी पीढ़ियों तक संजोए रखती है।
दस्तावेजीकरण के दौरान और भी दुर्लभ चीजें मिलीं। इनमें वृक्ष जीवाश्म, क्वार्ट्ज, क्वार्टजाइट और क्रिस्टल जैसी संरचनाएं शामिल हैं। घोड़ामाड़ा गुफाओं में आदिवासी समुदायों के साथ काम कर चुकीं स्त्रीरोग विशेषज्ञ प्रियंका घोष ने भी इस पर अपनी राय रखी।
प्रियंका घोष ने डिंडोरी में पाषाण युग के चट्टानी आश्रयों की खोज में मदद की थी। उनका मानना है कि यह खोज एक बड़े रहस्य की एक झलक भर है। उन्होंने कहा कि डिंडोरी एक नृवंशविज्ञान का खजाना है, जो अभी पूरी तरह खुला नहीं है। उनके शब्दों में यह एक छिपा हुआ संदूक है।
एक्सपर्ट कोट्स
मदन कुमार नागरजोगे (पुरातत्व आयुक्त): आदिवासी समुदाय के पास वैज्ञानिक उपकरण भले न रहे हों, लेकिन उनमें यह पहचानने की सूझ-बूझ थी कि उनके पास कुछ अनमोल है और वे उसकी रक्षा कर रहे हैं।
प्रियंका घोष (स्त्रीरोग विशेषज्ञ आदिवासी समुदायों के साथ शोध कार्य): डिंडोरी एक नृवंशविज्ञान का खजाना है। एक छिपा हुआ संदूक जिसे अभी खोला जाना बाकी है।
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