अपराध साबित करने वाली DNA रिपोर्ट में गड़बड़ी, हाईकोर्ट ने डायरेक्टर FSL को किया तलब

Neel Tiwari | Jul 22, 2026, 10:28 IST
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अपराध साबित करने वाली DNA रिपोर्ट में गड़बड़ी
अपराध साबित करने वाली DNA रिपोर्ट में गड़बड़ी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले की डीएनए रिपोर्ट में भारी चूक पर भोपाल FSL डायरेक्टर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली में फॉरेंसिक लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • यह मामला एक आपराधिक केस की डीएनए जांच रिपोर्ट से जुड़ा है।
  • कोर्ट को FSL रिपोर्ट में ऐसे नमूने मिले, जिनका केस से कोई संबंध नहीं था।
  • FSL ने इसे टाइपिंग की गलती बताया, लेकिन हाईकोर्ट ने यह जवाब स्वीकार नहीं किया।
  • कोर्ट ने कहा कि ऐसी गलती किसी निर्दोष को सजा या दोषी को राहत दिला सकती है।
  • अब FSL डायरेक्टर को खुद कोर्ट में उपस्थित होकर पूरी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

अपराध साबित करने वाली DNA रिपोर्ट पर उठे सवाल

किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में FSL की DNA रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण सबूत मानी जाती है। यही रिपोर्ट कई बार तय करती है कि आरोपी दोषी है या नहीं। वहीं, जब इसी रिपोर्ट की सटीकता पर सवाल उठ जाएं तो पूरी जांच और मुकदमे की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसी कारण मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर माना है।

डीएनए रिपोर्ट में ऐसी गलती, जिसने कोर्ट को चौंका दिया

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता से जुड़े आर्टिकल बी और सी को रिपोर्ट में किसी दूसरे व्यक्ति के नमूने बताया गया। हैरानी की बात यह रही कि उस व्यक्ति का कोई नमूना जांच के लिए भेजा ही नहीं गया था। कोर्ट ने पूछा कि जब ऐसा कोई नमूना रिकॉर्ड में था ही नहीं, तो रिपोर्ट में उसका उल्लेख कैसे हो गया।



पिछले आदेश में भी कोर्ट ने जताई थी कड़ी चिंता

14 जुलाई की सुनवाई में कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट की कई विसंगतियों पर सवाल उठाए थे। अदालत ने मेडिकल जांच, सैंपल लेने की प्रक्रिया और रिपोर्ट तैयार करने के तरीके पर भी गंभीर टिप्पणी की थी। कोर्ट ने यह भी पूछा था कि घटना के महीनों बाद लिए गए कुछ नमूनों की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की गई।

सिर्फ टाइपिंग गलती कहने से नहीं माने जज

पहले आदेश के बाद FSL भोपाल के डायरेक्टर शशिकांत शुक्ला ने हलफनामा देकर कहा कि यह केवल टाइपिंग की गलती थी। वहीं, 20 जुलाई की सुनवाई में जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विवेक जैन की डिविजन बेंच ने इस जवाब को सिरे से खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता का सवाल हो, तब ऐसी सफाई स्वीकार नहीं की जा सकती। अगर रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी उसे पढ़े बिना हस्ताक्षर करते हैं, तो पूरी FSL व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है।

हाईकोर्ट ने FSL डायरेक्टर को किया व्यक्तिगत तलब

हाईकोर्ट ने FSL भोपाल के डायरेक्टर को 5 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि डायरेक्टर यह बताएंगे कि ऐसी टाइपिंग की गलतियां अब तक कितनी रिपोर्टों में सामने आई हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि यह गलती कैसे हुई और भविष्य में इसे रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है।

जांच अधिकारी भी देंगे जवाब

कोर्ट ने इस मामले की प्रारंभिक जांच के लिए पहले ही 15 दिन का समय दिया था। यह अवधि 31 जुलाई को पूरी होगी। इसलिए अगली सुनवाई 5 अगस्त को रखी गई है। उस दिन जांच अधिकारी और FSL डायरेक्टर दोनों को कोर्ट के सामने उपस्थित होकर पूरी जानकारी देनी होगी।

कोर्ट का साफ संदेश, लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी

हाईकोर्ट ने अपने पहले आदेश में भी स्पष्ट कहा था कि यदि किसी वैज्ञानिक अधिकारी से गलती हुई है तो उसे छिपाया नहीं जाना चाहिए। जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और दोषी के खिलाफ उचित कार्रवाई भी होनी चाहिए।

अदालत का मानना है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट पर न्याय व्यवस्था का बड़ा भरोसा टिका होता है। इसलिए उसमें छोटी दिखने वाली गलती भी बड़े न्यायिक परिणाम ला सकती है।

इस मामले का असर दूसरे मामलों पर भी पड़ सकता है

कोर्ट ने डायरेक्टर से सिर्फ इस केस का जवाब नहीं मांगा है। अदालत ने यह भी पूछा है कि ऐसी टाइपिंग की गलतियां अन्य FSL रिपोर्टों में भी हुई हैं या नहीं। यदि जांच में ऐसी और रिपोर्टें सामने आती हैं, तो कई पुराने मामलों की जांच और सुनवाई भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस मामले को फॉरेंसिक व्यवस्था की जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है।

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