गोविन्द सिंह राजपूत को हाईकोर्ट से राहत, रिट खारिज, नामांकन में संपत्ति छुपाने के लगे थे आरोप
Neel Tiwari | Aug 02, 2026, 15:09 IST
भाजपा विधायक गोविंद सिंह राजपूत
एमपी हाई कोर्ट ने भाजपा विधायक गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ झूठी जानकारी देकर नामांकन दाखिल करने के आरोप वाली रिट याचिका खारिज कर दी। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की खंडपीठ ने साफ कहा कि चुनाव से जुड़े विवाद चुनाव याचिका के जरिए ही उठाए जा सकते हैं।
समझें क्या है पूरा मामला...
- सुरखी सीट से हारे उम्मीदवार नीरज शर्मा ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
- आरोप था कि गोविंद सिंह राजपूत ने नामांकन में पूरी संपत्ति की जानकारी नहीं दी।
- याचिका में चुनाव आयोग को कार्रवाई के निर्देश देने की मांग की गई थी।
- हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाद रिट से नहीं, चुनाव याचिका से तय होते हैं।
- इसी तरह के आरोपों वाली एक दूसरी याचिका अभी भी हाई कोर्ट में लंबित है।
गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से राहत
खंडपीठ ने साफ कहा कि चुनाव या नामांकन से जुड़े विवादों के लिए कानून में अलग व्यवस्था है। ऐसे मामलों में सीधे रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने बताया चुनाव विवाद का सही कानूनी रास्ता
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 भी चुनाव विवादों के निपटारे का स्पष्ट तरीका बताता है। इसलिए चुनाव परिणाम या नामांकन को चुनौती केवल चुनाव याचिका से ही दी जा सकती है।
क्या था नीरज शर्मा का आरोप
चुनाव में भाजपा उम्मीदवार गोविंद सिंह राजपूत विजयी हुए थे। हार के बाद नीरज शर्मा ने आरोप लगाया कि विधायक ने नामांकन पत्र और शपथ पत्र में अपनी संपत्तियों की पूरी जानकारी नहीं दी। उनका कहना था कि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए।
चुनाव आयोग को दिया था आवेदन
बाद में इसी शिकायत पर निर्णय कराने के लिए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई। याचिका में चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश देने की मांग भी की गई थी।
कोर्ट में क्या दलील दी गई
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी उपस्थित हुए। चुनाव आयोग की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ शर्मा ने पक्ष रखा।
विधायक गोविंद सिंह राजपूत की ओर से अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे ने दलीलें दीं। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पहले याचिका के सुनवाई योग्य होने पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की रिट
धारा 80-A हाई कोर्ट को ऐसी याचिकाओं की विशेष अधिकारिता देती है। वहीं धारा 81 चुनाव याचिका दायर करने की समय सीमा भी तय करती है।
कोर्ट ने कहा कि जब प्रभावी वैधानिक उपाय पहले से मौजूद है, तब रिट याचिका का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग को शिकायत पर निर्णय देने का निर्देश भी इस रिट में नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर याचिका को गलत कानूनी धारणा पर आधारित मानते हुए खारिज कर दिया गया।
इस फैसले का बड़ा संदेश
यदि कोई उम्मीदवार नामांकन, चुनाव परिणाम या शपथ पत्र को चुनौती देना चाहता है, तो उसे चुनाव याचिका का रास्ता अपनाना होगा। रिट याचिका ऐसे मामलों का विकल्प नहीं बन सकती।
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