IAS अफसरों के बाद BJP नेताओं को क्लीन चिट देने की तैयारी, स्वेच्छानुदान मामले में बड़ा मोड़
Ramanand Tiwari | Jun 02, 2026, 08:30 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. ग्वालियर स्वेच्छानुदान मामले में IAS अधिकारियों के बाद भाजपा नेताओं को क्लीन चिट मिलने की तैयारी चल रही है। इसमें तत्कालीन महापौर और भाजपा नेताओं को राहत मिलने की संभावना है।
समझें पूरा मामला...
- IAS अधिकारियों को अभियोजन स्वीकृति नहीं देने का प्रस्ताव तैयार हुआ।
- तत्कालीन महापौर और भाजपा नेताओं को राहत मिलने की संभावना।
- लोकायुक्त की सहमति मिलने पर क्लीन चिट का रास्ता साफ होगा।
- मामला 2010-14 की स्वेच्छानुदान सहायता वितरण से जुड़ा।
- विभागीय जांच में भ्रष्टाचार नहीं, केवल प्रशासनिक और प्रक्रियागत अनियमितता।
अब उसी आधार पर तत्कालीन महापौर समीक्षा गुप्ता और अन्य भाजपा नेताओं को भी राहत देने की तैयारी शुरू हो गई है। हालांकि अंतिम फैसला अभी बाकी है। GAD की सहमति के बाद प्रस्ताव लोकायुक्त के पास जाएगा और वहां से मंजूरी मिलने पर ही क्लीन चिट का रास्ता साफ होगा।
नेताओं तक पहुंच सकती है क्लीन चिट
इसी निष्कर्ष के आधार पर विभाग ने पहले तीन IAS अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति निरस्त करने का प्रस्ताव तैयार किया। अब इसी तर्क को आधार बनाकर तत्कालीन महापौर समीक्षा गुप्ता और अन्य जनप्रतिनिधियों को भी राहत देने पर विचार किया जा रहा है।
GAD के फैसले पर टिकी पूरी फाइल
यानी फिलहाल किसी को क्लीन चिट नहीं मिली है, लेकिन फाइल जिस दिशा में बढ़ रही है, उससे राहत के संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं।
लोकायुक्त सहमत नहीं हुआ तो मामला सीएम कमेटी तक पहुंचेगा। इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि लोकायुक्त विभागीय प्रस्ताव से असहमति जताता है तो मामला सीधे शासन स्तर पर जाएगा।
सूत्रों के अनुसार ऐसी स्थिति में फाइल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समन्वय वाली उच्चस्तरीय समन्वय समिति (Coordination Committee) के पास भेजी जा सकती है। यानी अंतिम निर्णय से पहले अभी एक और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पड़ाव बाकी है।
क्या था पूरा विवाद?
किन लोगों पर लगे थे आरोप?
- समीक्षा गुप्ता (तत्कालीन महापौर)
- डॉ. अंजलि रायजादा (तत्कालीन पार्षद)
- वेद प्रकाश शर्मा (तत्कालीन आयुक्त)
- एनबीएस राजपूत (तत्कालीन आयुक्त)
- विनोद शर्मा (तत्कालीन आयुक्त)
विभागीय जांच में कैसे बदला पूरा मामला?
इसके अलावा रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला कि परिषद ने अपने वित्तीय अधिकार पूरी तरह समिति को हस्तांतरित कर दिए थे। यही बिंदु अभियोजन स्वीकृति के खिलाफ सबसे मजबूत आधार बनकर सामने आया।
भ्रष्टाचार नहीं, प्रक्रिया संबंधी अनियमितता का मामला?
46.31 लाख रुपए के वितरण पर उठे थे सवाल
- मामला: ग्वालियर नगर निगम स्वेच्छानुदान सहायता वितरण।
- अवधि: 2010 से 2014।
- कुल राशि: 46.31 लाख रुपए।
- जांच एजेंसी: लोकायुक्त संगठन।
- आरोप: नियम विरुद्ध आर्थिक सहायता वितरण।
- विभागीय निष्कर्ष: प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार प्रमाणित नहीं।
- वर्तमान स्थिति: GAD और लोकायुक्त स्तर पर अंतिम निर्णय बाकी।।
राजनीतिक मायने क्यों बड़े हैं?
दूसरी तरफ यदि लोकायुक्त विभागीय राय से असहमति जताता है तो मामला फिर नए कानूनी और प्रशासनिक विवाद में बदल सकता है।फिलहाल सबसे बड़ी नजर GAD और उसके बाद लोकायुक्त के फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि वही तय करेगा कि यह मामला क्लीन चिट पर खत्म होगा या फिर नए मोड़ के साथ आगे बढ़ेगा।
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