दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति नहीं, राज्य सरकार करे देखभाल: हाईकोर्ट

Jitendra Shrivastava | Jun 02, 2026, 16:27 IST
Share
abortion rape victim
Photograph: (thesootr)

BHOPAL. नाबालिग गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता की गर्भपात याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने शिशु के जीवन और किशोरी की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

समझें पूरा मामला...

  • 31 सप्ताह की गर्भावस्था में याचिका खारिज।
  • मेडिकल रिपोर्ट बनी फैसले का आधार।
  • गंभीर एनीमिया से जूझ रही किशोरी।
  • राज्य सरकार को देखभाल के निर्देश।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता (Rape Victim) की गर्भपात याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 31 सप्ताह की गर्भावस्था को देखते हुए गर्भसमापन की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने माना कि गर्भस्थ शिशु (Fetus) में जीवन विकसित हो चुका है। साथ ही मेडिकल रिपोर्ट में किशोरी की स्वास्थ्य स्थिति को जोखिमपूर्ण बताया गया। अदालत ने राज्य सरकार को पीड़िता और बच्चे की देखभाल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मामला दुष्कर्म पीड़िता (Rape Victim) नाबालिग किशोरी से जुड़ा है। किशोरी 31 सप्ताह की गर्भवती थी। उसने गर्भपात (Abortion) की अनुमति मांगी थी। अदालत ने याचिका पर विस्तृत सुनवाई की। इसके बाद गर्भसमापन की अनुमति देने से इनकार किया।

अदालत ने कहा कि गर्भस्थ शिशु (Fetus) का विकास काफी आगे बढ़ चुका है। इस स्थिति में गर्भपात की अनुमति देना शिशु के जीवन को समाप्त करने जैसा होगा। कोर्ट ने यह भी माना कि चिकित्सा रिपोर्ट गंभीर संकेत दे रही है।

शादी का झांसा और दुष्कर्म

जानकारी के अनुसार मामला मंडला जिले का है। आरोपित युवक ने शादी का वादा किया था। इसके बाद उसने किशोरी से कई बार संबंध बनाए। इस दौरान किशोरी गर्भवती हो गई। बाद में मामला पुलिस तक पहुंचा।

गर्भावस्था निर्धारित कानूनी सीमा से आगे निकल चुकी थी। इसलिए मामला हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अदालत ने सभी तथ्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया।

मेडिकल रिपोर्ट बनी आधार

सुनवाई के दौरान विशेषज्ञ चिकित्सक समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत हुई। रिपोर्ट में किशोरी की स्थिति चिंताजनक बताई गई। उसका हीमोग्लोबिन स्तर केवल 7.5 ग्राम पाया गया। यह गंभीर एनीमिया (Severe Anemia) की स्थिति मानी जाती है।

डॉक्टरों ने बताया कि गर्भपात की प्रक्रिया जोखिमपूर्ण हो सकती है। इससे किशोरी के जीवन पर खतरा बढ़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि गर्भस्थ शिशु स्वस्थ और जीवित है। इन्हीं तथ्यों को अदालत ने अपने निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बनाया।

सुप्रीम कोर्ट का उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पूर्व निर्णय का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि 24 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था में गर्भसमापन केवल विशेष परिस्थितियों में संभव है।

ऐसी परिस्थितियों में मां के जीवन को गंभीर खतरा होना चाहिए। या फिर भ्रूण में असाध्य चिकित्सीय विकार होना आवश्यक है। वर्तमान मामले में ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई। इसलिए अदालत ने गर्भपात की अनुमति नहीं दी।

सरकार को सौंपी जिम्मेदारी

फैसले के साथ अदालत ने राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि किशोरी को आवश्यक चिकित्सा सुविधा मिले। अस्पताल में उचित निगरानी सुनिश्चित की जाए। प्रसव तक सभी जरूरी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएं।

अदालत ने बच्चे के जन्म के बाद भी जिम्मेदारी तय की। सरकार को बच्चे की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करना होगा। यह निर्देश पीड़िता के हितों को ध्यान में रखकर दिया गया।

गोद देने का विकल्प खुला

अदालत ने भविष्य के लिए भी रास्ता खुला रखा है। यदि पीड़िता या परिवार बच्चे का पालन-पोषण नहीं करना चाहता, तो वे कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे को गोद देने (Adoption) संबंधी नियम लागू होंगे।

कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करने के लिए दोबारा अदालत का रुख कर सकते हैं। इससे बच्चे के भविष्य और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होगी।

फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला गर्भपात कानून (Abortion Law) और बाल संरक्षण से जुड़ी बहस को नई दिशा देता है। अदालत ने शिशु के जीवन और पीड़िता के स्वास्थ्य दोनों पहलुओं पर विचार किया। मेडिकल रिपोर्ट को प्रमुख आधार बनाया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति अलग होती है। इसलिए अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों और चिकित्सकीय राय के आधार पर निर्णय लेती हैं। यह फैसला भी उसी सिद्धांत को दर्शाता है।

ये खबरें भी पढ़ें...

MP में बढ़ता स्कूल का खर्च: फीस से ज्यादा भारी पड़ रहा किताब और यूनिफॉर्म का दाम

ट्विशा शर्मा सुसाइड केस: पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह और बेटे समर्थ की न्यायिक हिरासत 16 जून तक बढ़ी

सीएम मोहन यादव ने जिसे बताया कांग्रेस का भागा दूल्हा, वह अक्षय बम बीजेपी में आकर भी अधर में

मोहन कैबिनेट से 48 लाख परिवारों को मिला बड़ा तोहफा, मुफ्त होगी संपत्तियों की रजिस्ट्री



Tags:
  • सुप्रीम कोर्ट
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
  • Rape Victim
  • राज्य सरकार
  • गर्भपात
गूगल पर द सूत्र चुनें ! Add as a preferredsource on Google
छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कलेक्ट्रेट घेराव, पुलिस से झूमाझटकी, भूपेश बघेल बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें

By Arun Tiwari

छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कलेक्ट्रेट घेराव, पुलिस से झूमाझटकी, भूपेश बघेल बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें
मध्य प्रदेश में 1 अक्टूबर से राशन दुकानें बंद, राशन विक्रेता संघ ने 5 मांगों पर दी चेतावनी

By Sandeep Kumar

मध्य प्रदेश में 1 अक्टूबर से राशन दुकानें बंद, राशन विक्रेता संघ ने 5 मांगों पर दी चेतावनी
IAS आशीष टिकरिहा को जनसंपर्क संचालक का अतिरिक्त प्रभार, वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी भी रहेगी

By VINAY VERMA

IAS आशीष टिकरिहा को जनसंपर्क संचालक का अतिरिक्त प्रभार, वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी भी रहेगी
राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पासपोर्ट पर पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं

By Ashish Bhardwaj

राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पासपोर्ट पर पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं
पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई

By Arun Tiwari

पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
भोपाल की सेज यूनिवर्सिटी में छात्रों का हंगामा: हॉस्टल मेस के खाने में कीड़े मिलने का आरोप, अब खाद्य विभाग करेगा जांच

By Jitendra Shrivastava

भोपाल की सेज यूनिवर्सिटी में छात्रों का हंगामा: हॉस्टल मेस के खाने में कीड़े मिलने का आरोप, अब खाद्य विभाग करेगा जांच
UPI एमडीआर पर सुप्रीम कोर्ट का रोक से इनकार: 15 अक्टूबर से दुकानदारों को देना होगा 0.4 फीसदी चार्ज

By Sanjay Dhiman

UPI एमडीआर पर सुप्रीम कोर्ट का रोक से इनकार: 15 अक्टूबर से दुकानदारों को देना होगा 0.4 फीसदी चार्ज