समझें क्या है पूरा मामला
- पुलिस इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल को हाईकोर्ट से बड़ी राहत।
- 2004 में 200 फीट गहरी खाई में उतरकर ट्रक चालक और हेल्पर की बचाई थी जान
- स्क्रीनिंग कमेटी ने बहादुरी को "रूटीन ड्यूटी" बताकर प्रमोशन देने से किया था इनकार।
- हाईकोर्ट ने कहा- ऐसा कार्य सामान्य ड्यूटी नहीं, असाधारण वीरता का उदाहरण है।
- कोर्ट ने 10 फरवरी 2005 से वैचारिक आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन और वरिष्ठता लाभ देने का आदेश दिया।
20 साल पुरानी बहादुरी को मिला न्याय
जबलपुर हाईकोर्ट ने एक ऐसे पुलिस अधिकारी के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो पिछले दो दशकों से अपनी बहादुरी की उचित पहचान के लिए संघर्ष कर रहे थे। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अपनी जान जोखिम में डालकर किया गया असाधारण बचाव अभियान महज उसकी रोजमर्रा की ड्यूटी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इंद्रमणि पटेल की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें 10 फरवरी 2005 से वैचारिक रूप से आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन का लाभ देने का आदेश दिया है।
किसी की हिम्मत नहीं हुई
मामला वर्ष 2004 का है, जब इंद्रमणि पटेल इंदौर जिले के सिमरोल थाने में उप निरीक्षक और थाना प्रभारी के रूप में पदस्थ थे। 22 अप्रैल 2004 की रात भेरूघाट में ईंटों से भरा एक भारी ट्रक अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरा। ट्रक एक पेड़ के सहारे अटक गया था और लगभग 200 फीट गहरी खाई के ऊपर लटका हुआ था। ट्रक के चालक और हेल्पर अंदर फंसे हुए मदद की गुहार लगा रहे थे। स्थिति इतनी खतरनाक थी कि पेशेवर क्रेन ऑपरेटरों ने भी नीचे उतरने से मना कर दिया।
रस्सी के सहारे मौत से मुकाबला
कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, ऐसी भयावह परिस्थितियों में इंद्रमणि पटेल ने खुद एक रस्सी के सहारे खाई में उतरने का निर्णय लिया। उन्होंने न केवल चालक और हेल्पर को सुरक्षित बाहर निकाला बल्कि भारी ट्रक को मोटी रस्सियों से बांधकर उसे और नीचे गिरने से भी रोक दिया। अदालत ने माना कि यदि ट्रक नीचे सड़क पर गिरता तो कई निर्दोष यात्रियों की जान जा सकती थी और बड़ी जनहानि हो सकती थी। कोर्ट ने कहा कि यह कार्य किसी सामान्य पुलिस प्रतिक्रिया से कहीं आगे बढ़कर असाधारण साहस और कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण था।
प्रमोशन की सिफारिश
साहसिक कार्य के बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने सिफारिश की थी। डीआईजी और आईजी स्तर तक ने भी आउट ऑफ टर्न प्रमोशन की अनुशंसा की थी। मध्य प्रदेश पुलिस विनियम 70 ए के तहत प्रमोशन की सिफारिश हुई थी। अधिकारी को स्थानीय स्तर पर सम्मानित किया गया था। गणतंत्र दिवस पर कलेक्टर ने प्रशस्ति पत्र और शील्ड दी थी। ट्रक मालिक ने भी उनके कार्य की सराहना की थी। स्क्रीनिंग कमेटी ने प्रमोशन की अनुशंसा खारिज कर दी थी। केवल पांच हजार रुपये नकद पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया था।
फिर प्रमोशन क्यों नहीं?
अदालत ने अपने आदेश में स्क्रीनिंग कमेटी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि एक ओर राज्य सरकार और विभाग ने उसी घटना के लिए नकद पुरस्कार देकर बहादुरी स्वीकार की, जबकि दूसरी ओर आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन के मामले में उसी कार्य को नियमित ड्यूटी बताकर खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि प्रशासन एक ही तथ्य पर दो विपरीत रुख नहीं अपना सकता। यदि कार्य विशेष पुरस्कार के योग्य था तो उसे साधारण ड्यूटी बताकर प्रमोशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
जान बचाने पर इनकार?
फैसले में अदालत ने यह भी कहा है। रिकॉर्ड में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। टाइपिंग और कंप्यूटर प्रतियोगिताओं में उपलब्धि पर आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया गया है। कोर्ट ने कहा ऐसे मामलों को असाधारण उपलब्धि माना गया है। 200 फीट गहरी खाई में उतरकर त्रासदी टालना भी असाधारण कार्य है। ऐसे कार्य को केवल नियमित कर्तव्य बताना मनमाना प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया विश्लेषण
एमपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के संजय शुक्ला मामले का हवाला देते हुए कहा था कि आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि यदि स्क्रीनिंग कमेटी का निर्णय मनमाना या विकृत हो तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। वर्तमान मामले में कमेटी ने वास्तविक तथ्यों और विनियम 70-ए के मापदंडों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन ही नहीं किया, इसलिए उसका निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।
सीधे प्रमोशन का आदेश
हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता वर्ष 2005 से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मामला पहले भी एक बार पुनर्विचार के लिए भेजा जा चुका था। इसके बावजूद विभाग ने वस्तुनिष्ठ निर्णय नहीं लिया। इसलिए मामले को दोबारा अधिकारियों के पास भेजना न्याय का उपहास होगा। अदालत ने स्क्रीनिंग कमेटी का 28 दिसंबर 2012 का आदेश रद्द करते हुए इंद्रमणि पटेल को 10 फरवरी 2005 से निरीक्षक पद पर वैचारिक आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन, वरिष्ठता तथा अन्य परिणामी लाभ देने के निर्देश दिए हैं।
डीजीपी और चयन समिति भी थीं पक्षकार
इस मामले में याचिकाकर्ता इंद्रमणि पटेल थे। प्रतिवादी क्रमांक एक मध्य प्रदेश शासन था। प्रतिवादी क्रमांक दो पुलिस महानिदेशक डीजीपी थे। प्रतिवादी क्रमांक तीन चयन समिति के अध्यक्ष थे। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है। प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों में प्रक्रिया पूरी करनी होगी। याचिकाकर्ता को आदेश का लाभ देना होगा।
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