श्रेय की लड़ाई से सुलगी IAS बिरादरी: दीपाली रस्तोगी के तंज से भड़के प्रमोटी IAS अफसर
Ravi Kant Dixit | Jun 11, 2026, 21:14 IST
Photograph: (thesootr)
मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप से शुरू हुई चर्चा प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के अलग ग्रुप में पहुंच चुकी है। वहां केवल नाराजगी ही नहीं जताई जा रही, बल्कि अलग एसोसिएशन बनाने तक की बातें होने लगी हैं।
मध्यप्रदेश की नौकरशाही में लंबे समय से दबे हुए मतभेद एक बार फिर सतह पर आ गए हैं। इस बार विवाद के केंद्र में हैं प्रदेश की चर्चित आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी। उनकी दो अलग-अलग टिप्पणियों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि डायरेक्ट आईएएस (आरआर) और प्रमोटी आईएएस (पीआर) अफसरों के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुली बहस का रूप ले चुकी है।
स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप से शुरू हुई चर्चा प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के अलग ग्रुप में पहुंच चुकी है। वहां केवल नाराजगी ही नहीं जताई जा रही, बल्कि अलग एसोसिएशन बनाने तक की बातें होने लगी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे विवाद के दो अलग-अलग घटनाक्रम हैं और दोनों में एक समानता दिखाई दे रही है। दोनों मामलों में प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के समर्थकों का आरोप है कि उनके योगदान को वह सम्मान नहीं मिला है, जिसके वे हकदार थे। यह भी कहा जा रहा है कि दीपाली ने दोनों टिप्पणियों जान बूझकर प्रमोटी अफसरों को नीचा दिखाने के लिए की हैं। यह कोई चूक नहीं, बल्कि सोचे समझे तंज हैं।
पहला घटनाक्रम डिंडोरी की प्रसिद्ध गौंड पेंटिंग को मिले जीआई टैग से जुड़ा है। इसके लिए महत्वपूर्ण प्रयास उस समय हुए थे, जब मीनाक्षी सिंह जनजातीय कार्य विभाग में डिप्टी सेक्रेटरी और वन्या की एमडी थीं।
जीआई टैग मिलने के बाद विभाग की तत्कालीन प्रमुख सचिव पल्लवी जैन ने महिला आईएएस अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप में मीनाक्षी सिंह के काम की सराहना करते हुए लिखा कि उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत की है और वे बधाई की पात्र हैं। इसके बाद महिला अधिकारियों ने मीनाक्षी सिंह को बधाइयां देना शुरू कर दिया।
इसी बीच पंचायत विभाग की एसीएस, डायरेक्ट आईएएस दीपाली रस्तोगी की टिप्पणी आई। उन्होंने लिखा कि यह उपलब्धि पूरी तरह एसआरएलएम की सीईओ हर्षिका सिंह के मार्गदर्शन में डिंडोरी कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की पहल से संभव हुई है।
यहीं से चर्चा शुरू हो गई। वजह यह थी कि मीनाक्षी सिंह प्रमोटी आईएएस अधिकारी हैं, जबकि हर्षिका सिंह, डिंडोरी कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ डायरेक्ट आईएएस अधिकारी हैं। महिला अधिकारियों के बीच यह चर्चा चल पड़ी कि क्या मीनाक्षी सिंह के योगदान को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया गया? शनिवार का यह घटनाक्रम अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक दूसरा मामला सामने आ गया है।
दूसरे विवाद की जड़ में छिंदवाड़ा जिले का चर्चित नवाचार ‘वॉश ऑन व्हील्स’ (WoW) है। यह पहल उस समय शुरू हुई थी, जब शीलेंद्र सिंह छिंदवाड़ा के कलेक्टर थे।
यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। भोपाल के जंबूरी मैदान में आयोजित अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती के महिला सशक्तिकरण महासम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी सराहना की थी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिका अकॉलैड्स ने भी इसे अपने अंक में स्थान दिया है। हाल ही में इस अभिनव परियोजना को देश का प्रतिष्ठित इंडिया सैनिटेशन कोएलिशन-फिक्की नेशनल अवॉर्ड भी मिला है।
हाल ही में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और पूर्व केंद्रीय सचिव अनिल स्वरूप ने इस मॉडल पर एक लेख लिखा है। इस आर्टिकल को मध्यप्रदेश कैडर के ही सेवानिवृत्त आईएएस और पूर्व केंद्रीय सचिव आलोक श्रीवास्तव ने आईएएस एसोसिएशन मध्यप्रदेश के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर किया।
पोस्ट के साथ उन्होंने लिखा कि सरकारें अनेक योजनाएं और अभियान शुरू करती हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम पहल ऐसी होती हैं, जो लंबे समय तक प्रभावी ढंग से चलती रहें। छिंदवाड़ा जिले में कलेक्टर के रूप में कार्यरत रहे युवा आईएएस अधिकारी शीलेंद्र सिंह ने जो किया, वह अन्य अधिकारियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।
बस फिर क्या था। ग्रुप में शीलेंद्र सिंह को बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। डायरेक्ट और प्रमोटी, दोनों वर्गों के अधिकारियों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं।
घटनाक्रम में मोड़ तब आया, जब पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव दीपाली रस्तोगी ने उसी पोस्ट पर तंस कसा।
उन्होंने लिखा-
यानी उनके अनुसार यह किसी एक अधिकारी की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि पूरी छिंदवाड़ा टीम का सामूहिक प्रयास था। उन्होंने विशेष रूप से जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी और आईएएस अधिकारी अग्रिम कुमार की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आईटी आधारित पहल का नेतृत्व अग्रिम कुमार ने किया था और बाद में अग्रिम कुमार तथा एनआईसी के सहयोग से इस मॉडल को राज्य स्तर पर भी लागू किया गया।
दीपाली रस्तोगी ने अपनी टिप्पणी में कहीं भी शीलेंद्र सिंह का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने उन्हें बधाई भी नहीं दी। इतना ही नहीं, अग्रिम कुमार का जिक्र करते हुए उन्होंने "young" IAS officer लिखा और "young" शब्द को Quote-Unquote किया। यहीं से विवाद ने नया मोड़ ले लिया।
दीपाली रस्तोगी के कमेंट के बाद आईएएस एसोसिएशन के ग्रुप में शीलेंद्र सिंह को बधाई देने वाले संदेश लगभग बंद हो गए।इसके बाद चर्चा प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के अलग व्हाट्सएप ग्रुप ‘आईएएस पीआर’ में पहुंच गई।
वहां कई अधिकारियों ने इस टिप्पणी को लेकर नाराजगी जताई। कुछ अधिकारियों ने यहां तक सुझाव दिया कि यदि भेदभाव का यही रवैया जारी रहा तो प्रमोटी अधिकारियों को आईएएस एसोसिएशन का ग्रुप छोड़ देना चाहिए।
कुछ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह कोई पहली घटना नहीं है। उनका आरोप है कि डायरेक्ट आईएएस अधिकारियों का रवैया लंबे समय से प्रमोटी अधिकारियों के प्रति उपेक्षापूर्ण रहा है। कई प्रमोटी अधिकारियों का मानना है कि उन्हें बराबरी का अधिकारी नहीं माना जाता। प्रशासनिक निर्णयों और संस्थागत मंचों पर भी उन्हें अलग नजरिए से देखा जाता है।
सूत्रों के अनुसार, इसी कारण अब प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के बीच अलग एसोसिएशन बनाने को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। उनका कहना है कि यदि व्यापक सहमति बनी तो वे अलग संगठन बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
दीपाली रस्तोगी द्वारा अग्रिम कुमार के लिए इस्तेमाल किए गए "young IAS officer" शब्दों ने विवाद को और हवा दे दी।प्रमोटी अधिकारियों का तर्क है कि राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कम से कम 12 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद ही आईएएस कैडर में पदोन्नत हो सकते हैं।
व्यवहारिक रूप से मध्यप्रदेश में यह अवधि 16 से 20 वर्ष तक पहुंच जाती है। ऐसे में प्रमोटी अधिकारियों के लिए ‘यंग आईएएस’ की अवधारणा अलग मायने रखती है।
सूत्रों के अनुसार, इस बहस के दौरान कुछ अधिकारियों ने यह भी टिप्पणी की कि हाल के वर्षों में जिन बड़े विवादों और चर्चित मामलों ने सुर्खियां बटोरी हैं, उनमें अधिकांश मामलों में डायरेक्ट आईएएस अधिकारियों की भूमिका या उनकी पदस्थापना चर्चा में रही है। इसके बाद बहस केवल श्रेय तक सीमित नहीं रही, बल्कि ‘यंग आईएएस’ की परिभाषा तक पहुंच गई।
यह पहला अवसर नहीं है, जब दीपाली रस्तोगी की किसी टिप्पणी ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचाई हो। वे अपने तेवर के लिए जानी जाती हैं। इससे पहले भी एक महत्वपूर्ण बैठक में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के सामने उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी बात रखी थी। उस घटनाक्रम की भी लंबे समय तक चर्चा होती रही थी।
मध्यप्रदेश के प्रशासनिक हलकों में दीपाली रस्तोगी की पहचान एक ईमानदार, विजनरी और रिजल्ट-ओरिएंटेड अधिकारी के रूप में है। इस बार उनकी टिप्पणी ने आईएएस बिरादरी के भीतर वर्षों से मौजूद उस दरार को फिर उजागर कर दिया है, जो समय-समय पर डायरेक्ट और प्रमोटी अधिकारियों के बीच सामने आती रही है।
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स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप से शुरू हुई चर्चा प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के अलग ग्रुप में पहुंच चुकी है। वहां केवल नाराजगी ही नहीं जताई जा रही, बल्कि अलग एसोसिएशन बनाने तक की बातें होने लगी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे विवाद के दो अलग-अलग घटनाक्रम हैं और दोनों में एक समानता दिखाई दे रही है। दोनों मामलों में प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के समर्थकों का आरोप है कि उनके योगदान को वह सम्मान नहीं मिला है, जिसके वे हकदार थे। यह भी कहा जा रहा है कि दीपाली ने दोनों टिप्पणियों जान बूझकर प्रमोटी अफसरों को नीचा दिखाने के लिए की हैं। यह कोई चूक नहीं, बल्कि सोचे समझे तंज हैं।
घटनाक्रम-1 : महिला अधिकारियों के ग्रुप में शुरू हुआ विरोध
जीआई टैग मिलने के बाद विभाग की तत्कालीन प्रमुख सचिव पल्लवी जैन ने महिला आईएएस अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप में मीनाक्षी सिंह के काम की सराहना करते हुए लिखा कि उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत की है और वे बधाई की पात्र हैं। इसके बाद महिला अधिकारियों ने मीनाक्षी सिंह को बधाइयां देना शुरू कर दिया।
इसी बीच पंचायत विभाग की एसीएस, डायरेक्ट आईएएस दीपाली रस्तोगी की टिप्पणी आई। उन्होंने लिखा कि यह उपलब्धि पूरी तरह एसआरएलएम की सीईओ हर्षिका सिंह के मार्गदर्शन में डिंडोरी कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की पहल से संभव हुई है।
यहीं से चर्चा शुरू हो गई। वजह यह थी कि मीनाक्षी सिंह प्रमोटी आईएएस अधिकारी हैं, जबकि हर्षिका सिंह, डिंडोरी कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ डायरेक्ट आईएएस अधिकारी हैं। महिला अधिकारियों के बीच यह चर्चा चल पड़ी कि क्या मीनाक्षी सिंह के योगदान को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया गया? शनिवार का यह घटनाक्रम अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक दूसरा मामला सामने आ गया है।
अब ताजा विवाद : छिंदवाड़ा मॉडल और श्रेय की लड़ाई
यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। भोपाल के जंबूरी मैदान में आयोजित अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती के महिला सशक्तिकरण महासम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी सराहना की थी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिका अकॉलैड्स ने भी इसे अपने अंक में स्थान दिया है। हाल ही में इस अभिनव परियोजना को देश का प्रतिष्ठित इंडिया सैनिटेशन कोएलिशन-फिक्की नेशनल अवॉर्ड भी मिला है।
जब पूर्व केंद्रीय सचिव ने की शीलेंद्र सिंह की तारीफ
पोस्ट के साथ उन्होंने लिखा कि सरकारें अनेक योजनाएं और अभियान शुरू करती हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम पहल ऐसी होती हैं, जो लंबे समय तक प्रभावी ढंग से चलती रहें। छिंदवाड़ा जिले में कलेक्टर के रूप में कार्यरत रहे युवा आईएएस अधिकारी शीलेंद्र सिंह ने जो किया, वह अन्य अधिकारियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।
बस फिर क्या था। ग्रुप में शीलेंद्र सिंह को बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। डायरेक्ट और प्रमोटी, दोनों वर्गों के अधिकारियों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं।
और फिर आया वह कमेंट, जिसने माहौल बदल दिया
उन्होंने लिखा-
It's Chhindwara team's effort. The CEO ZP Agrim Kumar, the "young" IAS officer, has played a very active role. The IT initiative was led by him. We have replicated the initiative at state level with the help of Agrim and NIC.
दीपाली रस्तोगी ने अपनी टिप्पणी में कहीं भी शीलेंद्र सिंह का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने उन्हें बधाई भी नहीं दी। इतना ही नहीं, अग्रिम कुमार का जिक्र करते हुए उन्होंने "young" IAS officer लिखा और "young" शब्द को Quote-Unquote किया। यहीं से विवाद ने नया मोड़ ले लिया।
एक टिप्पणी और थम गया बधाइयों का सिलसिला
वहां कई अधिकारियों ने इस टिप्पणी को लेकर नाराजगी जताई। कुछ अधिकारियों ने यहां तक सुझाव दिया कि यदि भेदभाव का यही रवैया जारी रहा तो प्रमोटी अधिकारियों को आईएएस एसोसिएशन का ग्रुप छोड़ देना चाहिए।
क्या अलग एसोसिएशन बनाने की तैयारी है?
सूत्रों के अनुसार, इसी कारण अब प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के बीच अलग एसोसिएशन बनाने को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। उनका कहना है कि यदि व्यापक सहमति बनी तो वे अलग संगठन बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
‘यंग आईएएस’ शब्द पर भी भड़की बहस
व्यवहारिक रूप से मध्यप्रदेश में यह अवधि 16 से 20 वर्ष तक पहुंच जाती है। ऐसे में प्रमोटी अधिकारियों के लिए ‘यंग आईएएस’ की अवधारणा अलग मायने रखती है।
सूत्रों के अनुसार, इस बहस के दौरान कुछ अधिकारियों ने यह भी टिप्पणी की कि हाल के वर्षों में जिन बड़े विवादों और चर्चित मामलों ने सुर्खियां बटोरी हैं, उनमें अधिकांश मामलों में डायरेक्ट आईएएस अधिकारियों की भूमिका या उनकी पदस्थापना चर्चा में रही है। इसके बाद बहस केवल श्रेय तक सीमित नहीं रही, बल्कि ‘यंग आईएएस’ की परिभाषा तक पहुंच गई।
पहले भी विवादों के केंद्र में रही हैं दीपाली रस्तोगी
मध्यप्रदेश के प्रशासनिक हलकों में दीपाली रस्तोगी की पहचान एक ईमानदार, विजनरी और रिजल्ट-ओरिएंटेड अधिकारी के रूप में है। इस बार उनकी टिप्पणी ने आईएएस बिरादरी के भीतर वर्षों से मौजूद उस दरार को फिर उजागर कर दिया है, जो समय-समय पर डायरेक्ट और प्रमोटी अधिकारियों के बीच सामने आती रही है।
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