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महिला दिवस...महिलाओं का दिन...जैसा कि लोग कहते हैं, पर मेरा मानना है कि सिर्फ एक ही दिन क्यों हो महिलाओं का? हर दिन उनका हो। हर दिन महिलाएं वह सब कर सकें, जो उनके दिल में हो। हर वह सपना पूरा कर सकें, जो उनके मन में हो। कोई जज्बात दबाने न पड़ें। दिल खोलकर जी सकें, वही मेरे लिए सच में महिला दिवस होगा...।
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19 साल की उम्र में तय हो गई शादी
चलिए...मैं खुद अपनी कहानी सुनाती हूं। मेरे पिता एलआईसी में मैनेजर थे। मैं चार बहनों में सबसे बड़ी थी। सो स्वाभाविक है कि हर पिता चाहता है कि नौकरी में रहते ही सभी लड़कियों के हाथ पीले हो जाएं।
इसलिए मां-बाबूजी ने 16 साल की उम्र से ही मेरे लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी थी। दबाव काफी था और मेरे बाद तीन बहनें और थीं। इसलिए ना-ना करते हुए बी.एस.सी सेकंड ईयर में 19 साल की उम्र में मेरी शादी तय हो गई। फिर क्या... 20 की उम्र में शादी हो गई।
पति ने पहचाना हुनर
बी.एस.सी.के बाद जैसा कि हमारे घर में चलन था कि टीचर बनना है। इसलिए मैंने बी.एड.एंट्रेंस पास करके बी.एड.किया और 91% के साथ यूनिवर्सिटी टॉप किया। उसी बीच मेरे पति की नजर मेरे प्री बी.एड.एग्जाम की कॉपियों पर गई। झट से उन्होंने कहा कि तुममें अपनी बात रखने का हुनर है। तुम सिविल सर्विसेज के लिए अच्छे से कोशिश करो। सिविल सर्विसेज प्रीलिम्स के मेरे पहले गुरु भी वही थे।
प्रेग्ननेंसी में की परीक्षा की तैयारी
इसके बाद फिर क्या था...शुरू हो गया तैयारी का दौर...। घर का समर्थन मिला। मेरा आत्मविश्वास था। प्रीलिम्स के बाद मेन्स भी निकल गया और इसी दौरान मैं प्रेग्नेंट हो गई। पता नहीं, समय कैसे निकल गया और 9 महीने बाद 4 फरवरी 2001 को मैं हॉस्पिटल मैं एडमिट हो गई। मुझे आज भी वह दिन अच्छे से याद है। 7 फरवरी को सिजेरियन डिलीवरी से मेरी गुड़िया पैदा हुई।
डिलीवरी के 12 दिन बाद इंटरव्यू
संयोग देखिए कि 19 फरवरी 2001 को पीएससी के इंटरव्यू की डेट आ गई। मेरे पिता ने कहा कि 12 दिन की गुड़िया है। ऊपर से सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। रायपुर से इंदौर तक का सफर है छोड़ दो इस बार। मैंने सोचा कि इतनी कोशिश और मेहनत को यूं बेकार नहीं कर सकती।
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क्योंकि बात मेरे सपने की जो थी और साथ में वह तीन लोग...सबसे पहले मेरी मां, जो शायद अपने अधूरे सपने मेरे माध्यम से जीना चाहती थीं। मां ने कहा, जरूर दो इंटरव्यू, मैं चलूंगी साथ। दूसरे मेरे पति, जिन्होंने कहा कि ये ऑपर्च्युनिटी मत छोड़ना और तीसरी मेरी गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. कमला तिवारी.. जि न्होंने कहा कि परवाह मत करो, अपने एम्बिशन को साकार करो। तीनों मेरे साथ खड़े रहे। 12 दिन की गुड़िया, सिजेरियन डिलीवरी और रायपुर से इंदौर तक का सफर। ये मेरा विल पॉवर ही था कि इंटरव्यू हो गया।
शादी के बाद सब खत्म नहीं होता
फिर आया 7 मार्च 2001...। मैंने देखा कि मेरे साथ तैयारी के दौरान के कुछ दोस्त और पत्रकार घर के बाहर खड़े हैं। उन्हें यूं देखकर मैं हैरान रह गई। फिर पता चला कि एमपी पीएससी का रिजल्ट आ गया है और मैंने टॉप किया है।
यहां से शुरू हुआ इंटरव्यू का सिलसिला...। चाहे सिविल सर्विस क्रॉनिकल हो या प्रतियोगिता दर्पण, दूरदर्शन हो या आकाशवाणी, आज भी वह हैडलाइन याद है... 'शादी के बाद सब खत्म नहीं होता'। वो हैडलाइन उन सभी महिलाओं के लिए एक बड़ा मैसेज थी, जो उड़ना चाहती हैं।
जो साकार करना चाहती हैं अपने सपने। रातों रात मैं महिलाओं की रोल मॉडल बन गई और कितनी ही लड़कियों ने मुझे चिट्ठी लिखी, क्योंकि तब चिट्ठी लिखने का चलन था। लड़कियों ने बताया कि उन्होंने कैसे मुझसे इन्स्पायर होकर अपने सपनों को उड़ान दी है।
आखिर में मेरी सभी से बस यही गुजारिश है कि हर परिस्थिति में आत्मविश्वास और हौसला बनाए रखें। रास्ते और मंजिल मिल ही जाएंगे। सपनों को दबाएं नहीं, जब हर स्त्री खुल के जीएगी, वही मेरे लिए सही मायनों मे महिला दिवस होगा।
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