गांव से शहर तक बदल रहा खाने का तरीका: कार्बोहाइड्रेट कम, फल और प्रोटीन पर बढ़ा जोर, जानिए कैसे बदल रही भारतीयों की थाली
Arohi Raj | Sootr Creatives | Oct 26, 2026, 13:45 IST
भारतीयों की थाली में बड़ा बदलाव होता नजर आ रहा है। अब कार्बोहाइड्रेट अनाज की जगह प्रोटिन और फल का सेवन बढ़ रहा है।
भारत में लोगों के खाने का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है। अब थाली में सिर्फ रोटी, चावल और अनाज नहीं हैं। फल, दूध, अंडे और नॉनवेज खाने वाले परिवारों की संख्या भी बढ़ रही है। बीते 12 साल में खानपान की आदतों में यह बदलाव साफ दिखा है। गांवों में अब लोग पहले के मुकाबले हर महीने करीब 17% कम अनाज खा रहे हैं।
दूसरी ओर, फल खाने वाले ग्रामीण परिवारों की हिस्सेदारी 93% तक पहुंच गई है। दूध, दही, पनीर और दूसरे फूड आइटम्स पर भी खर्च बढ़ा है। चाय-नाश्ते और रेडी-टू-ईट फूड की खपत भी बढ़ रही है। ऐसे में सवाल है कि भारतीयों की थाली क्यों बदल रही है? क्या अब लोग कार्बोहाइड्रेट से ज्यादा प्रोटीन और फल पर जोर दे रहे हैं? आंकड़ों से समझिए खानपान में आए इस बदलाव की पूरी कहानी।
भारतीय खाने में अनाज की बड़ी भूमिका होती थी। रोटी, चावल और दूसरे अनाज रोज के खाने का मुख्य हिस्सा थे। अब इनके मुकाबले अन्य फूड आइटम्स की खपत बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक, गांवों में पहले के मुकाबले हर महीने अनाज की खपत 2011-12 में 11.23 किलो थी। अब यह घटकर 9.35 किलो रह गई है। यानी इसमें करीब 17% की कमी आई है। शहरों में भी अनाज की खपत करीब 14% घटी है।
इसका मतलब यह नहीं है कि लोग रोटी और चावल खाना छोड़ रहे हैं। बल्कि उनकी थाली में दूसरी चीजों की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अब लोग फल, दूध और अन्य फूड आइटम पर भी खर्च कर रहे हैं।
भारतीयों की खाने की आदतों में सबसे बड़ा बदलाव फलों की खपत में दिख रहा है। गांवों में फल खाने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 68% से बढ़कर 93% हो गई है। शहरों में यह आंकड़ा 84% से बढ़कर 96% पहुंच गया है। इससे पता चलता है कि अब फल पहले से ज्यादा परिवारों के खाने का हिस्सा बन रहे हैं। दूध और दूध से बने उत्पादों की खपत भी बढ़ी है।
गांवों में दूध, दही और पनीर खाने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 84% से बढ़कर 95% हो गई है। शहरों में यह आंकड़ा 95% से बढ़कर 98% पहुंच गया है। अंडे और नॉनवेज खाने वाले परिवार भी बढ़े हैं। गांवों में इनकी हिस्सेदारी 54% से बढ़कर 75% हो गई है। शहरों में यह आंकड़ा 59% से बढ़कर 73% पहुंच गया है।
खाने की थाली में बदलाव सिर्फ फूड आइटम तक सीमित नहीं है। प्रोटीन मिलने के स्रोत भी बदल रहे हैं। पहले लोगों को प्रोटीन का बड़ा हिस्सा अनाज से मिलता था। अब दूध, अंडे, मछली और मांस जैसे दूसरे स्रोतों की भूमिका बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, गांवों में अनाज से मिलने वाले प्रोटीन की हिस्सेदारी 58% से घटकर 46% रह गई है। वहीं, अंडे, मछली और मांस से मिलने वाले प्रोटीन की हिस्सेदारी 6.7% से बढ़कर 12.4% हो गई है।
गांवों में प्रति व्यक्ति रोजाना मिलने वाला प्रोटीन पहले 60.7 ग्राम था। अब यह बढ़कर 61.8 ग्राम हो गया है। शहरों में यह मात्रा 60.3 ग्राम से बढ़कर 63.4 ग्राम पहुंच गई है।
इससे पता चलता है कि लोग अब प्रोटीन के लिए अलग-अलग फूड आइटम्स पर निर्भर हो रहे हैं। हालांकि, सिर्फ प्रोटीन की मात्रा बढ़ने से पूरे खाने की गुणवत्ता तय नहीं होती। संतुलित आहार में अन्य पोषक तत्व भी जरूरी हैं।
खाने की आदतों में बदलाव के पीछे लोगों की खर्च करने की क्षमता भी एक वजह है। आंकड़ों के मुताबिक, गांवों में एक व्यक्ति का हर महीने का औसत खर्च एक हजार 430 रुपए से बढ़कर दो हजार 79 रुपए हो गया है।
इसमें करीब 45% की बढ़ोतरी हुई है।
शहरों में प्रति व्यक्ति हर महीने होने वाला कुल खर्च दो हजार 630 रुपए से बढ़कर तीन हजार 632 रुपए पहुंच गया है। यहां बढ़ोतरी करीब 38% रही है। खर्च बढ़ने से परिवारों के लिए खाने की अलग-अलग चीजें खरीदना आसान हो सकता है। इसके अलावा, सरकार की मुफ्त राशन योजना से लोगों को अनाज खरीदने पर कम पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इससे वे दूसरी खाने-पीने की चीजें खरीदने के लिए पैसे बचा सकते हैं। हालांकि, खर्च बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। महंगाई और दूसरी जरूरतों पर होने वाला खर्च भी परिवारों के बजट को प्रभावित करता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोगों की थाली में बदलाव के साथ खाने-पीने पर खर्च करने का तरीका भी बदल रहा है। अब चाय, नाश्ते, प्रोसेस्ड फूड और तैयार फूड आइटम पर खर्च बढ़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, शहरों में खाने के बजट का करीब 28% हिस्सा इन चीजों पर खर्च हो रहा है। गांवों में यह हिस्सेदारी करीब 21% है।
शहरों में एक व्यक्ति इस श्रेणी पर हर महीने औसतन 776 रुपए खर्च करता है। वहीं, अनाज पर यह खर्च करीब 263 रुपए बताया गया है।
इससे पता चलता है कि बाजार में मिलने वाले तैयार फूड आइटम भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन रहे हैं। हालांकि, प्रोसेस्ड फूड की हर चीज पौष्टिक नहीं होती। इसलिए खाने का चुनाव करते समय उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है।
खाने की बदलती पसंद के साथ देश में दूध और अंडों का उत्पादन भी बढ़ा है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014-15 में देश में दूध का उत्पादन करीब 146.6 मिलियन टन था। साल 2024-25 में यह बढ़कर करीब 248.8 मिलियन टन हो गया।
इसी अवधि में अंडों का उत्पादन भी बढ़ा है। रिपोर्ट में इसका आंकड़ा सात हजार 848 करोड़ से बढ़कर 14 हजार 911 करोड़ बताया गया है।
प्रोडक्शन बढ़ने से इन फूड आइटम्स की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे लोगों के लिए दूध और अंडे जैसे फूड आइटम खरीदना आसान हो सकता है।
FAQs
कार्बोहाइड्रेट फूड की खपत क्यों घट रही है?
इसका मतलब यह नहीं है कि लोग रोटी और चावल खाना छोड़ रहे हैं। बल्कि उनकी थाली में दूसरी चीजों की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अब लोग फल, दूध और अन्य फूड आइटम पर भी खर्च कर रहे हैं।
फल खाने वाले परिवारों की संख्या बढ़ी
गांवों में दूध, दही और पनीर खाने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 84% से बढ़कर 95% हो गई है। शहरों में यह आंकड़ा 95% से बढ़कर 98% पहुंच गया है। अंडे और नॉनवेज खाने वाले परिवार भी बढ़े हैं। गांवों में इनकी हिस्सेदारी 54% से बढ़कर 75% हो गई है। शहरों में यह आंकड़ा 59% से बढ़कर 73% पहुंच गया है।
प्रोटीन के लिए अनाज पर निर्भरता घटी
गांवों में प्रति व्यक्ति रोजाना मिलने वाला प्रोटीन पहले 60.7 ग्राम था। अब यह बढ़कर 61.8 ग्राम हो गया है। शहरों में यह मात्रा 60.3 ग्राम से बढ़कर 63.4 ग्राम पहुंच गई है।
इससे पता चलता है कि लोग अब प्रोटीन के लिए अलग-अलग फूड आइटम्स पर निर्भर हो रहे हैं। हालांकि, सिर्फ प्रोटीन की मात्रा बढ़ने से पूरे खाने की गुणवत्ता तय नहीं होती। संतुलित आहार में अन्य पोषक तत्व भी जरूरी हैं।
खाने पर खर्च करने की क्षमता भी बढ़ी
इसमें करीब 45% की बढ़ोतरी हुई है।
शहरों में प्रति व्यक्ति हर महीने होने वाला कुल खर्च दो हजार 630 रुपए से बढ़कर तीन हजार 632 रुपए पहुंच गया है। यहां बढ़ोतरी करीब 38% रही है। खर्च बढ़ने से परिवारों के लिए खाने की अलग-अलग चीजें खरीदना आसान हो सकता है। इसके अलावा, सरकार की मुफ्त राशन योजना से लोगों को अनाज खरीदने पर कम पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इससे वे दूसरी खाने-पीने की चीजें खरीदने के लिए पैसे बचा सकते हैं। हालांकि, खर्च बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। महंगाई और दूसरी जरूरतों पर होने वाला खर्च भी परिवारों के बजट को प्रभावित करता है।
रेडी-टू-ईट फूड पर भी बढ़ रहा खर्च
शहरों में एक व्यक्ति इस श्रेणी पर हर महीने औसतन 776 रुपए खर्च करता है। वहीं, अनाज पर यह खर्च करीब 263 रुपए बताया गया है।
इससे पता चलता है कि बाजार में मिलने वाले तैयार फूड आइटम भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन रहे हैं। हालांकि, प्रोसेस्ड फूड की हर चीज पौष्टिक नहीं होती। इसलिए खाने का चुनाव करते समय उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है।
दूध और अंडों का उत्पादन भी बढ़ा
इसी अवधि में अंडों का उत्पादन भी बढ़ा है। रिपोर्ट में इसका आंकड़ा सात हजार 848 करोड़ से बढ़कर 14 हजार 911 करोड़ बताया गया है।
प्रोडक्शन बढ़ने से इन फूड आइटम्स की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे लोगों के लिए दूध और अंडे जैसे फूड आइटम खरीदना आसान हो सकता है।
FAQs
- भारत में अनाज की खपत में पिछले 12 सालों में क्या बदलाव आया है?
गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक अनाज की खपत करीब 17% घटी है, जबकि शहरों में यह लगभग 14% कम हुई है। - क्या भारतीय परिवार अब पहले से ज्यादा फल खा रहे हैं?
हां, गांवों में फल खाने वाले परिवारों की हिस्सेदारी 68% से बढ़कर 93% हो गई है, और शहरों में यह आंकड़ा 84% से बढ़कर 96% पहुंच गया है। - अनाज की खपत में कमी का मतलब क्या है?
नहीं, अनाज की खपत में कमी का मतलब यह नहीं है कि लोग रोटी-चावल खाना छोड़ रहे हैं, बल्कि उनकी थाली में अन्य खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़ रही है।
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