इंदौर में दूषित पानी का तांडव: 15 मौतों के बाद CM का बड़ा एक्शन
Ramanand Tiwari | Jan 03, 2026, 23:19 IST
Photograph: (the sootr)
इंदौर में दूषित पानी से मौतों के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने जल आपूर्ति व्यवस्था की सख्त निगरानी का आदेश दिया है, लेकिन जल गुणवत्ता की समस्या अभी भी बनी हुई है।
BHOPAL.इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद मध्य प्रदेश की जल आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशभर में पानी की गुणवत्ता की सख्त निगरानी के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री ने सभी नगरीय निकायों और संबंधित विभागों को निर्देश दिए हैं कि पानी की गुणवत्ता की मासिक जांच रिपोर्ट अनिवार्य रूप से स्थानीय निकायों को भेजी जाए। लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने को कहा गया है।
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इंदौर में दूषित पेयजल पीने के बाद अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। कई लोग अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं। स्वास्थ्य विभाग ने बीमारों की संख्या और बीमारी के कारणों की जांच शुरू कर दी है।
इंदौर के अलावा प्रदेश के अन्य जिलों में भी दूषित पानी से बीमार होने के मामले सामने आए हैं। अक्टूबर 2025 में बड़वानी जिले के ग्राम सजवानी में 80 से अधिक लोग बीमार पड़े थे। 2024 में मानसून से पहले मंडला और दमोह जिलों में भी जलजनित बीमारियों के मामले दर्ज किए गए। मंडला के मदिया राम गांव में दूषित पानी से दो लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी।
डिंडौरी से कांग्रेस विधायक ओमकार सिंह मरकाम ने विधानसभा में दूषित जलापूर्ति का मुद्दा उठाया था। उन्होंने नरसिंहपुर जिले के बोहानी सहित कई पंचायतों में जल स्रोतों की नियमित जांच नहीं होने की बात कही थी।
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री संपतिया उइके का कहना है कि जल आपूर्ति व्यवस्था में सुधार किया गया है। पंचायत स्तर पर जल जांच के लिए किट और प्रशिक्षण उपलब्ध कराए गए हैं। विभाग के प्रमुख अभियंता संजय कुमार के अनुसार, जल दर्पण पोर्टल के माध्यम से पानी की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतें दर्ज की जा सकती हैं।
राज्य सरकार ने शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। पाइपलाइन, टंकियों और जलापूर्ति परियोजनाओं पर बड़ी राशि खर्च की गई, लेकिन कई क्षेत्रों में लोगों को अब भी साफ पानी नहीं मिल पा रहा है।
शहरी क्षेत्रों में बड़ी आबादी सरकारी जलापूर्ति से नहीं जुड़ी है। जिन इलाकों में नल से पानी पहुंच रहा है, वहां भी पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन इसकी प्रमुख वजह हैं।
कई शहरों में वर्षों पुरानी पाइपलाइनों में रिसाव की स्थिति है। टूटे हिस्सों से गंदगी और ड्रेनेज का पानी लाइन में मिलने की शिकायतें मिल रही हैं, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बनी कई जलापूर्ति योजनाएं पूरी तरह संचालित नहीं हो पा रही हैं। कुछ गांवों में टंकियां बनी हैं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति नहीं हो रही। कई परियोजनाएं शुरुआती चरण के बाद बंद हो गईं।
नियमों के अनुसार जल स्रोतों की मासिक जांच अनिवार्य है, लेकिन कई जिलों में यह प्रक्रिया नियमित नहीं हो रही। विभागीय रिकॉर्ड में जांच दर्ज है, जबकि मैदानी स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है।
प्रदेश की 45,712 ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों को जल जांच किट और प्रशिक्षण दिया गया है। इसके बावजूद कई स्थानों पर इन किटों का नियमित उपयोग नहीं हो रहा है। अधिकतर जगह जांच मानसून तक सीमित रहती है।
प्रदेश में साढ़े छह लाख से अधिक हैंडपंप और हजारों कुएं जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत हैं। जल जांच की जिम्मेदारी हैंडपंप मैकेनिकों और आउटसोर्स एजेंसियों को दी गई है, लेकिन समय पर सैंपल न लेने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
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इंदौर सहित कई जिलों में नल जल लाइनों में ड्रेनेज का पानी मिलने की शिकायतें दर्ज की गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि सुधार नजर नहीं आता।
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शहरी इलाकों में जलापूर्ति की सीमित पहुंच
जर्जर पाइपलाइन से बढ़ा संक्रमण का जोखिम
ग्रामीण क्षेत्रों में बनी कई जलापूर्ति योजनाएं पूरी तरह संचालित नहीं हो पा रही हैं। कुछ गांवों में टंकियां बनी हैं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति नहीं हो रही। कई परियोजनाएं शुरुआती चरण के बाद बंद हो गईं।
जल स्रोतों की नियमित जांच पर सवाल
जांच किट और प्रशिक्षण के बावजूद उपयोग सीमित
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