इंदौर के बिल्डर मालपानी बंधुओं और नगरीय प्रशासन विभाग के IAS का विवाद हाईकोर्ट पहुंचा, गंभीर आरोप
Sanjay Gupta | Jun 25, 2026, 14:04 IST
इंदौर के बिल्डर मालपानी बंधुओं और नगरीय प्रशासन विभाग के IAS का विवाद हाईकोर्ट पहुंचा
इंदौर के एक बड़े ग्रुप तिरूमाला के मालिक निलेश मालपानी की 21 मार्च की एक पोस्ट ने भोपाल तक हड़कंप मचा दिया था। इसमें नगरीय प्रशासन विभाग के दो IAS को लेकर विवादित टिप्पणी की गई थी। अब यह लड़ाई हाईकोर्ट पहुंच गई है।
इंदौर के तिरूमाला ग्रुप के मालिक और शुभ-लाभ रियलिटी के डायरेक्टर निलेश मालपानी ने 21 मार्च को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी। इसमें उन्होंने नगरीय प्रशासन विभाग के IAS अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे।
उनका आरोप था कि सिस्टम में भ्रष्टाचार फैला हुआ है और अधिकारी महीनों फाइल को दबाए बैठे रहते हैं। लाखों रुपए की मांग की जाती है। दरअसल अक्टूबर 2025 से उनके कॉलोनी लाइसेंस को मंजूरी नहीं मिलने से वह भड़के हुए थे। इस पोस्ट के बाद भी उनका लाइसेंस नहीं हुआ है और अब मामला हाईकोर्ट की इंदौर बेंच तक पहुंच गया है। इसमें शासन से जवाब मांगा गया है।
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मालपानी ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि कुछ अधिकारी पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। इससे शहर का विकास रुक गया है। उनका कहना था कि इससे सरकार को करोड़ों का राजस्व समय पर नहीं मिल पा रहा और हजारों लोगों को रोजगार भी नहीं मिलगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि जो लाइसेंस 15 दिन में मिल जाना चाहिए, उसे अधिकारी 5-6 महीने तक अटका कर बैठे रहते हैं और कोई सुनवाई नहीं होती। उनके मुताबिक शहर के कई बिल्डर और कॉलोनाइजर इस वजह से परेशान हैं और लगातार दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि लोग समय पर टैक्स तो जमा करते हैं, लेकिन काम कराने के लिए परेशान होना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने वाला कोई सिस्टम क्यों नहीं है। उनका दावा था कि इससे लोगों को करोड़ों का नुकसान हो रहा है और काम जानबूझकर रोका जा रहा है।
अब मनोज और निलेश मालपानी दोनों ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कॉलोनी लाइसेंस की मांग की है। इस मामले में उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार, पीएस नगरीय प्रशासन, आयुक्त और अपर आयुक्त नगरीय प्रशासन को पक्षकार बनाया है।
याचिका में कहा गया है कि नियम के मुताबिक 30 दिन के अंदर लाइसेंस मिल जाना चाहिए, लेकिन अधिकारियों ने जानबूझकर और पद का दुरुपयोग करते हुए इसे रोक दिया। उनका कहना है कि उन्होंने 27 अक्टूबर को आवेदन दिया था, इसके बाद 6 दिसंबर, 30 दिसंबर और 13 मार्च को उनसे कुछ आपत्तियां (क्वेरी) भी मांगी गईं। सभी जरूरी काम पूरा करने के बावजूद अब तक लाइसेंस जारी नहीं किया गया है।
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याचिका के दस्तावेजों में मालपानी ने यह भी बताया है कि उन्होंने अप्रैल में अधिकारियों को “डिमांड फॉर जस्टिस” नोटिस दिया था। इसमें उन्होंने गंभीर आरोप लगाए और नगर निगम व कलेक्टोरेट दोनों को भी इसमें शामिल किया।
उनका कहना है कि पूरे मामले में जानबूझकर सत्ता का दुरुपयोग किया गया है। आरोप है कि निगम और कलेक्टोरेट के साथ बैक डोर से बातचीत कर अनावश्यक आपत्तियां लगवाई गईं।
उन्होंने यह भी दावा किया है कि इस वजह से उन्हें करीब 25 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। साथ ही उनका कहना है कि बिना किसी अधिकार के पद का गलत इस्तेमाल किया गया है और पूरा मामला दुर्भावनापूर्ण तरीके से किया गया है।
लाइसेंस का काम अटकने के बाद मालपानी ने अपने रिश्तेदार रिटायर्ड IAS जेएम मालपानी के जरिए भी मामला आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। इसके तहत एक आईएएस अधिकारी से मुलाकात भी की गई थी। फोन पर बात भी कराई गई थी।
लेकिन उस समय अधिकारी हाईकोर्ट के एक केस में व्यस्त थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने अधीनस्थों को जरूरी कागजी कार्रवाई जल्द पूरी करने के निर्देश दे दिए हैं। वह इस मामले को तीन-चार दिन बाद देख पाएंगे।
यह बात मालपानी को ठीक नहीं लगी। इसके बाद निलेश मालपानी ने मार्च में सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली, फिर “डिमांड फॉर जस्टिस” नोटिस भेजा और आखिर में यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
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उनका आरोप था कि सिस्टम में भ्रष्टाचार फैला हुआ है और अधिकारी महीनों फाइल को दबाए बैठे रहते हैं। लाखों रुपए की मांग की जाती है। दरअसल अक्टूबर 2025 से उनके कॉलोनी लाइसेंस को मंजूरी नहीं मिलने से वह भड़के हुए थे। इस पोस्ट के बाद भी उनका लाइसेंस नहीं हुआ है और अब मामला हाईकोर्ट की इंदौर बेंच तक पहुंच गया है। इसमें शासन से जवाब मांगा गया है।
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पोस्ट में यह लिखा मालपानी ने
उन्होंने आरोप लगाया कि जो लाइसेंस 15 दिन में मिल जाना चाहिए, उसे अधिकारी 5-6 महीने तक अटका कर बैठे रहते हैं और कोई सुनवाई नहीं होती। उनके मुताबिक शहर के कई बिल्डर और कॉलोनाइजर इस वजह से परेशान हैं और लगातार दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि लोग समय पर टैक्स तो जमा करते हैं, लेकिन काम कराने के लिए परेशान होना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने वाला कोई सिस्टम क्यों नहीं है। उनका दावा था कि इससे लोगों को करोड़ों का नुकसान हो रहा है और काम जानबूझकर रोका जा रहा है।
अब हाईकोर्ट में लगाए गंभीर आरोप
याचिका में कहा गया है कि नियम के मुताबिक 30 दिन के अंदर लाइसेंस मिल जाना चाहिए, लेकिन अधिकारियों ने जानबूझकर और पद का दुरुपयोग करते हुए इसे रोक दिया। उनका कहना है कि उन्होंने 27 अक्टूबर को आवेदन दिया था, इसके बाद 6 दिसंबर, 30 दिसंबर और 13 मार्च को उनसे कुछ आपत्तियां (क्वेरी) भी मांगी गईं। सभी जरूरी काम पूरा करने के बावजूद अब तक लाइसेंस जारी नहीं किया गया है।
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निगम और कलेक्टोरेट को भी घेरा
उनका कहना है कि पूरे मामले में जानबूझकर सत्ता का दुरुपयोग किया गया है। आरोप है कि निगम और कलेक्टोरेट के साथ बैक डोर से बातचीत कर अनावश्यक आपत्तियां लगवाई गईं।
उन्होंने यह भी दावा किया है कि इस वजह से उन्हें करीब 25 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। साथ ही उनका कहना है कि बिना किसी अधिकार के पद का गलत इस्तेमाल किया गया है और पूरा मामला दुर्भावनापूर्ण तरीके से किया गया है।
रिटायर्ड IAS रिश्तेदार से भी लगवा चुके एप्रोच
लेकिन उस समय अधिकारी हाईकोर्ट के एक केस में व्यस्त थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने अधीनस्थों को जरूरी कागजी कार्रवाई जल्द पूरी करने के निर्देश दे दिए हैं। वह इस मामले को तीन-चार दिन बाद देख पाएंगे।
यह बात मालपानी को ठीक नहीं लगी। इसके बाद निलेश मालपानी ने मार्च में सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली, फिर “डिमांड फॉर जस्टिस” नोटिस भेजा और आखिर में यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
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