जबलपुर के पोलीपाथर में अवैध कॉलोनी पर चला बुलडोजर, SP, निगमायुक्त हुए तलब तो रातों रात कार्रवाई
Neel Tiwari | Aug 07, 2026, 15:37 IST
जबलपुर के पोलीपाथर में अवैध कॉलोनी पर चला बुलडोजर
जबलपुर हाईकोर्ट में सीलिंग की भूमि में कॉलोनी निर्माण के मामले में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। साल 2023 से नगर निगम पुलिस और रजिस्ट्री, लाइसेंस विभाग सिर्फ नोटिस नोटिस खेल रहे थे और लगातार सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हो रहा था।
समझें क्या है पूरा मामला...
- जबलपुर के पोलीपाथर में बिना मंजूरी कॉलोनी विकसित करने का मामला है।
- विवादित जमीन में सरकारी सीलिंग भूमि शामिल होने का दावा है।
- नोटिस और निर्माण रोकने के आदेशों के बाद भी सवाल बने रहे।
- एसपी और निगम आयुक्त कोर्ट में तलब हुए तो कार्रवाई तेज हुई।
- अब कलेक्टर को निर्माण और बिक्री की पूरी जांच करनी है।
अफसर तलब तो अचानक गिराए निर्माण
निर्माण रोकने के आदेश भी जारी हुए। जमीन की जांच भी हुई। इसके बावजूद जमीन पर निर्माण को लेकर सवाल बने रहे। 5 अगस्त 2026 को जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने सख्त रुख अपनाया।
हाई कोर्ट ने जबलपुर के पुलिस अधीक्षक और नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया। 6 अगस्त को दोनों अधिकारियों की अदालत में पेशी होनी थी।
वहीं पेशी से पहले ही प्रशासन ने आनन फानन में कार्रवाई शुरू कर दी। अवैध कॉलोनी में दो निर्माण गिराए गए। पुलिस ने बिल्डरों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की।
इस घटनाक्रम ने पुराने सवालों को और गंभीर बना दिया है। सवाल अब यह है कि जिस कार्रवाई के लिए लंबे समय से शिकायतें और आदेश मौजूद थे, वह अफसरों की कोर्ट में पेशी तय होने के बाद ही इतनी तेजी से क्यों हुई।
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सालों तक चलता रहा कागजी दिखावा
नगर निगम ने 2024 में इस अवैध कॉलोनी की जमीनों से जुड़े बिक्री पत्र रजिस्टर करने पर रोक लगाने आवेदन किया। इसके बाद भी रजिस्ट्रार ने 2026 में एक और रजिस्ट्री कर दी।
इस तरह कोर्ट के सामने यह बात भी खुल कर आ गई कि, इस अवैध कॉलोनी को पनपने देने में प्रशासन की पूरी मिली भगत थी।
अनिता महावर की याचिका ने खोला पूरा मामला
उनकी ओर से अधिवक्ता अंशुमन सिंह और आदित्य अवस्थी पेश हुए। याचिका में पोलीपाथर क्षेत्र में बिना वैध अनुमति कॉलोनी विकसित करने के आरोप लगाए गए।
डेविस स्वामी, दीपक चौकसे और हिम्मत पटेल ने मिलकर शासकीय भूमि में कब्जा किया था। याचिका के अनुसार विवादित जमीन के बड़े हिस्से में खसरा नंबर 18/2/1 की जमीन भी शामिल है।
इसे मध्यप्रदेश नगर भूमि सीमा कानून के तहत राज्य सरकार में निहित सीलिंग भूमि बताया गया है। याचिका में इस जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया गया।
मामला केवल निजी जमीन पर निर्माण का नहीं रहा। सरकारी जमीन, कॉलोनी विकास, निर्माण और जमीन की बिक्री सभी सवालों के घेरे में आ गए।
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लाइसेंस बाद में मिला, पहले से निर्माण-बिक्री का सवाल
बाद में 1 मार्च 2024 को लाइसेंस मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बावजूद लाइसेंस से पहले और उसके आसपास निर्माण तथा जमीन की खरीद फरोख्त का सवाल उठाया गया।
वहीं 20 मार्च 2024 को विवादित कॉलोनी के एक प्लॉट की रजिस्ट्री मुकेश रजाक के नाम होने की जानकारी भी रिकॉर्ड में है। यानी लाइसेंस मिलने के कुछ ही समय बाद बिक्री दस्तावेज भी सामने आया।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा किया कि अनुमति और लाइसेंस की स्थिति साफ होने से पहले जमीन पर गतिविधियां कैसे चलती रहीं। यही सवाल आगे चलकर हाई कोर्ट की निगरानी में पहुंचा।
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निगम आयुक्त बदले और पनपती रही अवैध कॉलोनी
इसके बाद 17 फरवरी 2023 को स्वप्निल वानखेड़े ने निगम आयुक्त का पद संभाला। बाद में प्रीति यादव निगम आयुक्त रहीं। उनके कार्यकाल में 18 फरवरी 2025 को नगर निगम की ओर से हाई कोर्ट में जवाब और हलफनामा दाखिल किया गया।
अधिवक्ता सौरभ सुंदर के माध्यम से दाखिल इस जवाब में ग्राम पॉलीफथर के खसरा नंबर 16, 18/1, 18/2, 18/2/1 और 18/3 पर बिना वैध अनुमति कॉलोनी विकास की बात स्वीकार की गई।
इसके बाद सितंबर 2025 में रामप्रकाश अहिरवार निगम आयुक्त बने। यानी अलग-अलग अधिकारियों के कार्यकाल में यह मामला चलता रहा। निगम के रिकॉर्ड में 14 दिसंबर 2023 और 8 जनवरी 2024 के नोटिस का भी उल्लेख है।
16 अक्टूबर 2003 के पुराने पत्र का जिक्र भी सामने आया। इससे यह साफ होता है कि इस जमीन से जुड़ी शिकायतें और कागजी कार्रवाई नई नहीं थीं।
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जांच के बाद भी जमीन पर कार्रवाई सवालों में
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने 24 जून 2024 को आवेदन खारिज कर दिया था। इससे पहले 18 मई 2024 को राजस्व विभाग ने संयुक्त डिमार्केशन किया था।
याचिका के रिकॉर्ड के अनुसार इस कार्रवाई में सरकारी सीलिंग भूमि से जुड़ी स्थिति सामने आई थी। इसके बावजूद जमीन पर निर्माण रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नोटिस और आदेश कागजों तक सीमित रहे। अब हाई कोर्ट की निगरानी में यही सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि इतने आदेशों के बाद भी जमीन पर निर्माण कैसे चलता रहा।
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पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
कोर्ट ने यह जानना चाहा कि पुलिस सहायता उपलब्ध क्यों नहीं हुई। साथ ही नगर निगम से पूछा गया कि पहले के कोर्ट आदेशों के बाद प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
इसी वजह से 5 अगस्त को जस्टिस विशाल मिश्रा ने जबलपुर के एसपी और नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में बुलाया।
इसके बाद 6 अगस्त को दोनों अधिकारी कोर्ट में पेश हुए। इस पेशी से पहले ही निर्माण गिराने की कार्रवाई शुरू हो गई। इसलिए अब सवाल केवल अवैध कॉलोनी का नहीं है। कार्रवाई में हुई देरी और अधिकारियों की भूमिका भी पूरे मामले का अहम हिस्सा बन गई है। कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े
कोर्ट में FIR और ध्वस्तीकरण की जानकारी
कोर्ट को बताया गया कि गौरीघाट थाने में बिल्डरों के खिलाफ अपराध क्रमांक 338 वर्ष 2026 दर्ज किया गया है। यह एफआईआर मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 292-C के तहत दर्ज हुई है।
पुलिस ने मामले को जांच में ले लिया है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि अलग-अलग आदेशों के पालन में अवैध निर्माणों के खिलाफ ध्वस्तीकरण अभियान शुरू किया गया है।
आदेश में दो निर्माण गिराए जाने की जानकारी दर्ज है। एक इमारत को 6 अगस्त को गिराया गया। इसके बाद चार संरचनाएं गिराना बाकी बताया गया।
हालांकि हाई कोर्ट ने फिलहाल बाकी संपत्ति को गिराने से अधिकारियों को रोक दिया। यह रोक अगली सुनवाई तक जारी रहेगी।
आदेश के बाद हुए निर्माण अब जांच केंद्र में
साथ ही 6 अगस्त की सुनवाई में कोर्ट ने राज्य और निगम के अधिवक्ताओं से पूछा कि 15 मई 2025 के बाद कौन से निर्माण हुए। इस सवाल के जवाब में ऐसा रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया जिससे नए निर्माण की पूरी स्थिति साफ होती।
निगम की ओर से 24 जून 2025 के एक पंचनामा का जिक्र किया गया। उसमें स्थल पर निर्माण या विकास कार्य बंद होने की बात कही गई थी।
वहीं यह दस्तावेज 15 मई 2025 के बाद नए निर्माण होने या नहीं होने का पूरा जवाब नहीं देता। अब इसी अवधि की जांच कलेक्टर की टीम करेगी।
निगम पत्र के बाद भी बिक्री कैसे हुई?
निगम ने आगे कोई बिक्री दस्तावेज नहीं करने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद हस्तक्षेपकर्ता की ओर से 2026 में हुए बिक्री दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे गए।
हाई कोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया। अदालत ने कलेक्टर को निर्देश दिया है कि जांच में यह साफ किया जाए कि निगम के पत्र के बाद संबंधित जमीन के बिक्री दस्तावेज कैसे दर्ज हुए।
साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि निर्माण कब पूरे हुए और बिक्री दस्तावेज कब बने। इस तरह अब केवल अवैध निर्माण नहीं, बल्कि पूरी जमीन बिक्री प्रक्रिया भी जांच के घेरे में है।
आदेशों के बाद आखिर हुआ क्या?
रिपोर्ट में निर्माण पूरा होने की तारीख साफ बतानी होगी। बिक्री दस्तावेज की तारीख भी रिपोर्ट में दर्ज करनी होगी। खास तौर पर 10 फरवरी 2025 के निगम पत्र के बाद बिक्री कैसे हुई, इसका जवाब देना होगा।
रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर हाई कोर्ट के सामने पेश करनी है। अगली सुनवाई 31 अगस्त 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।
कोर्ट ने साफ किया है कि रिपोर्ट नहीं आने पर अधिकारियों को अगली तारीख पर फिर पेश होना पड़ सकता है। फिलहाल 15 मई 2025 को दी गई अंतरिम राहत अगली सुनवाई तक जारी रहेगी।
अब सवाल बुलडोजर से ज्यादा उस सिस्टम का
निगम के अपने जवाब में बिना अनुमति कॉलोनी विकास की बात सामने आई। फिर भी निर्माण और बिक्री के सवाल बने रहे। अब एसपी और निगम आयुक्त की कोर्ट में पेशी के बाद कार्रवाई हुई है।
इसीलिए यह सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या प्रशासन केवल कोर्ट की सख्ती के बाद सक्रिय हुआ। हालांकि अभी किसी अधिकारी को कोर्ट ने दोषी नहीं ठहराया है।
प्रशासनिक संरक्षण या मिलीभगत के आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही तय होगी। अगली सुनवाई में कलेक्टर की रिपोर्ट इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होगी।
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