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Photograph: (the sootr)
News in short
- 7 लाख की लागत से बनी 80 मीटर सीसी सड़क 24 घंटे में तोड़ी गई
- रीवा की आराध्य कंस्ट्रक्शन कंपनी को मिला था ठेका
- PWD ने गुणवत्ता खराब बताकर कारण बताओ नोटिस जारी किया
- साइट सुपरवाइजर ने मटेरियल में कमी से किया इनकार
- मंत्री तक पहुंची शिकायत के बाद मामला दबाने कार्रवाई की चर्चा
Intro
JABALPUR. जबलपुर के गढ़ा क्षेत्र की गुजराती कॉलोनी में लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाई गई सीमेंट कांक्रीट सड़क 24 घंटे भी नहीं टिक पाई। करीब सात लाख की लागत से बनी 80 मीटर सड़क को शिकायतों के बाद बुलडोजर से उखाड़ दिया गया। अब इस मामले में PWD और ठेका कंपनी के बयान एक-दूसरे से टकरा रहे हैं, जिससे कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ठेका कंपनी के साइट सुपरवाइजर बोले- मंत्री जी के आदेश के आगे किसकी चल सकती है।
News in Detail
जबलपुर के गढ़ा की गुजराती कॉलोनी में लोक निर्माण विभाग ने करीब सात लाख रुपए की लागत से 80 मीटर लंबी सीसी सड़क का निर्माण कराया। क्षेत्रीय लोगों को उम्मीद थी कि अब उन्हें बेहतर और टिकाऊ सड़क मिलेगी। लेकिन सड़क बनने के कुछ ही घंटों बाद उसकी सतह पर दरारें दिखने लगीं। स्थानीय नागरिकों ने इसे गंभीरता से लिया और गुणवत्ता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। शिकायतें बढ़ीं और मामला तेजी से तूल पकड़ने लगा। स्थिति यह बनी कि सड़क बनने के 24 घंटे के भीतर ही विभाग ने बुलडोजर चलवाकर उसे उखाड़ दिया।
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द सूत्र ने सीधे PWD से पूछा सवाल
मामले की पड़ताल के लिए “द सूत्र” ने PWD के कार्यपालन यंत्री शिवेंद्र सिंह से संपर्क करने की कोशिश की। उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया, लेकिन मैसेज के माध्यम से जवाब दिया। अपने मैसेज में उन्होंने बताया कि विभागीय इंजीनियर की रिपोर्ट के आधार पर सड़क की गुणवत्ता मानक स्तर से कमजोर पाई गई। इसी कारण ठेकेदार को नोटिस जारी किया गया है और सड़क को दोबारा बनाने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि निर्माण के दौरान निगरानी, टेंडर की शर्तों के पालन और मौके पर तैनात जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर कोई विस्तृत जवाब नहीं दिया गया।
तकनीकी चूक या कमीशन के फेर में जल्दबाजी
विभागीय सूत्रों के मुताबिक निर्माण के दौरान बाइब्रेटर का उपयोग नहीं किया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि सीसी सड़क निर्माण में बाइब्रेटर अनिवार्य होता है। इसके बिना कांक्रीट में हवा के बुलबुले रह जाते हैं, जिससे सड़क कमजोर हो जाती है और जल्दी दरारें पड़ सकती हैं। यदि यह लापरवाही सही पाई जाती है तो यह तकनीकी मानकों की सीधी अनदेखी है।
ठेकेदार का पलटवार: “मटेरियल में कोई कमी नहीं”
इस मामले में “द सूत्र” ने ठेका कंपनी आराध्य कंस्ट्रक्शन के साइट सुपरवाइजर सौरभ दुबे से भी बात की। उन्होंने विभाग के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके मटेरियल में कोई कमी नहीं थी। दुबे के अनुसार सड़क रात में डाली गई थी और अगले दिन कुछ क्रैक दिखे। उन्होंने दावा किया कि यह मटेरियल की खराबी नहीं थी।
उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय जनता ने शिकायत की और स्थानीय पार्षद ने सड़क की वीडियो बनाकर मामला आगे बढ़ाया। यह वीडियो जब लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह तक पहुंची, तो उनके निर्देश पर सड़क को तुरंत तोड़ दिया गया। फोन पर दुबे ने कहा, “जब मंत्री जी का आदेश हो तो फिर क्या किया जा सकता है।”
मंत्री के क्षेत्र में सवालों की गूंज
यह क्षेत्र लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के विधानसभा क्षेत्र में आता है। ऐसे में निर्माण गुणवत्ता को लेकर अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी। अब सवाल उठ रहा है कि क्या विभागीय इंजीनियर और निरीक्षण अधिकारी निर्माण के समय मौजूद थे? यदि सड़क की गुणवत्ता इतनी कमजोर थी, तो यह बात पहले क्यों सामने नहीं आई? चर्चा यह भी है कि सड़क की खराब गुणवत्ता का खुलासा विभागीय निरीक्षण से नहीं बल्कि जनता और स्थानीय पार्षद के स्तर पर हुआ।
15 दिन का अल्टीमेटम और संभावित ब्लैकलिस्टिंग
जानकारी के अनुसार खुद की साख बचाने के लिए PWD के मुख्य अभियंता ने ठेकेदार को 15 दिन का समय दिया है। निर्धारित अवधि में संतोषजनक सुधार नहीं हुआ तो कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मौके पर टूटी सड़क के अवशेष पड़े हैं और स्थानीय लोग विभाग पर अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं।
जनता ने लगा सरकारी सिस्टम पर आरोप
क्षेत्रीय नागरिक अभिषेक पाठक ने कहा कि हाल ही में जबलपुर-भोपाल हाईवे पर शाहपुर रेल ओवरब्रिज ध्वस्त होने की घटना के बाद निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर पहले ही सवाल उठ रहे हैं।
उनका कहना है कि यदि समय रहते निगरानी होती तो सड़क तोड़ने की नौबत नहीं आती। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि सड़क कुछ महीनों बाद खराब होती तो नुकसान और बड़ा होता। ऐसे में अभी कार्रवाई होना बेहतर है।
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असली सवाल अब भी बाकी
यह मामला केवल एक सड़क का नहीं है। यह निर्माण गुणवत्ता, निगरानी तंत्र और जवाबदेही का सवाल है। क्या ठेकेदार की लापरवाही थी?
क्या विभागीय निगरानी कमजोर रही? या फिर जनता के दबाव के बाद जल्दबाजी में कार्रवाई हुई? गढ़ा की यह 24 घंटे वाली सड़क अब शहर में चर्चा का विषय बन चुकी है। दरारें केवल कंक्रीट में नहीं दिखीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली पर भी उभर आई हैं।
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