अब हार्डकोर अपराधियों का दिमाग खंगालेगी सरकार, जानेगी दोबारा क्यों करते हैं अपराध
Aman Vaishnav | Aug 23, 2026, 13:51 IST
हार्डकोर अपराधियों की ब्रेन जांच
मध्य प्रदेश की जेलों में बार-बार अपराध करने वाले कैदियों के व्यवहार को सुधारने के लिए जेल विभाग और राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी ने हाथ मिलाया है। इस रिसर्च का मकसद अपराधियों के हिंसक व्यवहार की वजह जानकर उन्हें भविष्य में फिर से अपराध करने से रोकना है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश जेल विभाग अब हार्डकोर अपराधियों की मानसिक स्थिति समझेगा।
- इसके लिए जेल विभाग ने गुजरात की राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी से हाथ मिलाया है।
- यह यूनिवर्सिटी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है।
- भोपाल सेंट्रल जेल से इस रिसर्च की शुरुआत हो चुकी है।
- सितंबर 2026 से यहां खास 'माइंड-रिफॉर्म सेंटर' भी शुरू होगा।
क्यों जरूरी है यह रिसर्च
जेल विभाग जानना चाहता है कि ऐसे अपराधी बार-बार अपराध क्यों करते हैं। इसके पीछे की मानसिक और व्यवहारिक वजहों को समझना जरूरी माना जा रहा है।
इसके लिए मध्य प्रदेश जेल विभाग ने गुजरात की राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी से करार किया है। यह यूनिवर्सिटी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है।
आरआरयू के विशेषज्ञ अब एमपी की जेलों में बंद हार्डकोर अपराधियों पर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करेंगे। यह अध्ययन उनके दिमागी पैटर्न को समझने पर केंद्रित होगा।
रिसर्च का असली मकसद क्या है
साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि उनका हिंसक बर्ताव किन वजहों से पैदा होता है।
मोमीन का कहना है कि इससे भविष्य में दोबारा अपराध की संभावना कम हो सकती है।
वहीं अगर सही समय पर सही वजह पकड़ में आ जाए, तो कई अपराधियों को सुधरने का मौका मिल सकता है। यही इस पूरी पहल के पीछे की सोच है।
भोपाल जेल से हुई शुरुआत
अब आगे राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स भी इस काम में शामिल होंगे। दोनों मिलकर अपराधियों की गहराई से स्क्रीनिंग करेंगे।
रिसर्च के दौरान कैदियों की आम मानसिक परेशानियों पर खास फोकस रहेगा। इनमें गहरी नींद न आना और जेल के माहौल में एडजस्ट न हो पाना शामिल है।
इसके अलावा कैदियों की बाकी मानसिक और व्यवहारिक दिक्कतों को भी बारीकी से समझा जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से की जाएगी।
समस्या पकड़ में आने पर आगे क्या
इसके लिए दो तरह के तरीके अपनाए जाएंगे। एक तरफ प्राचीन विपासना पद्धति की मदद ली जाएगी।
दूसरी तरफ आधुनिक थैरेप्यूटिक मॉडल का भी इस्तेमाल होगा। इनमें रैशनल इमोटिव बिहेवियर थेरेपी यानी आरईबीटी प्रमुख है।
खास बात यह है कि इस पूरे सिस्टम को चलाने वाले कर्मचारियों को खुद यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने प्रशिक्षित किया है। अब यही प्रशिक्षित स्टाफ बाकी कर्मचारियों को ट्रेनिंग दे रहा है।
इस तरह जेल के भीतर ही एक पूरा सिस्टम खड़ा किया जा रहा है। इससे भविष्य में भी यह प्रक्रिया आसानी से चलती रह सकेगी।
आगे पूरे प्रदेश में लागू होगी योजना
इसके ठीक दो महीने बाद इंदौर सेंट्रल जेल में भी वैसा ही एक सेंटर खोला जाएगा। यानी नवंबर 2026 तक इंदौर में भी यह सुविधा शुरू हो जाएगी।
इन दोनों जगहों पर ट्रायल सफल रहता है, तो यह मॉडल आगे बढ़ाया जाएगा। इसके बाद मध्य प्रदेश की सभी 11 सेंट्रल जेलों में यह योजना लागू कर दी जाएगी।
इस तरह यह पहल सिर्फ भोपाल तक सीमित नहीं रहेगी। धीरे-धीरे यह पूरे प्रदेश की जेल व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।
अगर यह प्रयोग कामयाब होता है, तो आने वाले समय में अपराधियों के सुधरने की दर बढ़ सकती है। इससे समाज में अपराध के मामलों में भी कमी आ सकती है।
बाकी राज्यों के लिए क्यों मायने रखता है
इसी वजह से मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहारिक सुधार पर ध्यान देना जरूरी माना जाने लगा है। मध्य प्रदेश का यह मॉडल इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।
अगर भोपाल और इंदौर में यह ट्रायल सफल रहता है, तो आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इससे सीख सकते हैं। राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों की जेल व्यवस्था में भी इसी तरह के प्रयोग हो सकते हैं।
फिलहाल यह पूरी पहल शुरुआती दौर में है। इसके नतीजे आने वाले महीनों में साफ तस्वीर दे सकते हैं कि क्या मानसिक और व्यवहारिक थेरेपी वाकई अपराधियों को बदल सकती है।
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