इंदौर बेंच से छिपाया था 21 दिन पुराना फैसला, वकील पर 50 हजार का जुर्माना

Neel Tiwari | May 09, 2026, 17:23 IST
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अधिवक्ता दिनेश सिंह चौहान पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। वकील ने इंदौर बेंच से पहले का आदेश छिपाकर अंतरिम राहत ले ली थी। जानिए पूरा मामला...

News in short

  • जबलपुर हाईकोर्ट ने अधिवक्ता दिनेश सिंह चौहान पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।
  • कोर्ट ने माना कि 6 अप्रैल 2026 का अंतिम आदेश इंदौर बेंच से छुपाया गया।
  • इंदौर हाईकोर्ट से 27 अप्रैल को प्राथमिक शिक्षकों को अंतरिम राहत मिली थी।
  • मामला प्राथमिक शिक्षक भर्ती में “स्पेशल डीएलएड” और 5% RCI बोनस अंक से जुड़ा है।
  • तथ्यों को छुपाकर राहत लेना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग - HC।

News in detail

प्राथमिक शिक्षक भर्ती में 5% बोनस अंक और श्रेणी परिवर्तन मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाया। कोर्ट ने एक अधिवक्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पाया कि 6 अप्रैल 2026 का आदेश इंदौर पीठ से छुपाया गया था। 27 अप्रैल को अंतरिम राहत हासिल की गई। जस्टिस विशाल धगत ने इसे गंभीर मामला माना।



हाईकोर्ट ने दिखाया सख्त रुख

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्यपीठ ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती मामले में सख्त टिप्पणी की। जस्टिस विशाल धगत की सिंगल बेंच ने एक अधिवक्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने पाया कि 6 अप्रैल 2026 का आदेश इंदौर पीठ से छुपाया गया। 27 अप्रैल 2026 को अंतरिम राहत प्राप्त की गई। कोर्ट ने इसे तथ्यों को छुपाना माना।

क्या है पूरा मामला, कैसे शुरू हुआ विवाद

यह विवाद प्राथमिक शिक्षक भर्ती परीक्षा में श्रेणी चयन से जुड़ा है। कई अभ्यर्थियों ने ऑनलाइन आवेदन में खुद को स्पेशल डीएलएड श्रेणी में दर्ज किया था। इस श्रेणी के उम्मीदवारों को 5 प्रतिशत RCI बोनस अंक मिलते हैं। बाद में अभ्यर्थियों ने दावा किया कि आवेदन में त्रुटि हुई। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में श्रेणी बदलने और बोनस अंक हटाने की अनुमति मांगी गई।

हाईकोर्ट ने राहत देने से किया था इनकार

जस्टिस विशाल धगत की कोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को WP 11655/2026 मामले में कहा था कि उम्मीदवारों को आवेदन सुधारने की समयसीमा के भीतर ही त्रुटि सुधारनी चाहिए थी। कोर्ट ने माना कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने और परिणाम आने के बाद श्रेणी बदलने की अनुमति देना "गेम के नियम बदलने" जैसा होगा।

कोर्ट ने कहा कि यदि सभी को श्रेणी बदलने की अनुमति दी गई, तो कर्मचारी चयन मंडल के लिए परीक्षा प्रक्रिया संभालना मुश्किल होगा। इसी कारण याचिका खारिज कर दी गई।

हवाला देकर मांगी जा रही थी राहत

याचिकाकर्ताओं ने दिसंबर 2025 के दीपक परमार मामले का हवाला दिया। उस मामले में कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में सुधार की अनुमति दी थी। जस्टिस धगत ने स्पष्ट किया कि वह आदेश सीमित परिस्थितियों के लिए था। कोर्ट ने कहा कि उस फैसले को सभी मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता। हर उम्मीदवार की स्थिति अलग हो सकती है।



इंदौर पीठ से छुपाई गई जबलपुर की खारिज याचिका

जबलपुर हाईकोर्ट के 6 अप्रैल वाले अंतिम आदेश के बावजूद इंदौर पीठ में नई याचिका दायर की गई। जिसकी सुनवाई फाइनल ऑर्डर के 21 दिन बाद 27 अप्रैल 2026 को हुई। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दिनेश सिंह चौहान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। याचिका में इंदौर पीठ को यह जानकारी नहीं दी गई कि इसी मुद्दे पर जबलपुर पीठ पहले ही अंतिम फैसला दे चुकी है।

इंदौर हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि केवल RCI प्रमाणपत्र नहीं होने के आधार पर अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी निरस्त न की जाए। यह राहत 21 दिन पहले जबलपुर पीठ द्वारा पारित आदेश की जानकारी के बिना दी गई थी।



मामला फिर जबलपुर पहुंचा

बाद में यही विवाद WP 9316/2026 रोशनी ठाकुर एवं अन्य बनाम राज्य के रूप में जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि समान मुद्दे पर पहले की याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। लेकिन इंदौर पीठ के समक्ष यह जानकारी नहीं रखी गई।

जस्टिस विशाल धगत ने कहा कि अधिवक्ता दिनेश सिंह चौहान लगातार ऐसे मामलों में ऑनलाइन पेश हो रहे थे। वह बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ऐसे में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें पूर्व आदेशों की जानकारी नहीं थी।

बिना वकालतनामा पेश हुए कर रहे थे पैरवी

कोर्ट ने यह भी पाया कि अधिवक्ता इस मामले में बिना वकालतनामा दाखिल किए पेश हुए थे। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिका स्वयं डिफेक्टिव स्थिति में दायर की गई थी। कोर्ट ने माना कि तथ्यों को छुपाकर इंदौर पीठ से राहत प्राप्त की गई। इसलिए यह न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला बनता है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अधिवक्ता पर 50 हजार रुपए की लागत लगाते हुए राशि हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी, जबलपुर में जमा करने का निर्देश दिया।

पुराने आदेश बताना क्यों जरूरी

वकील पर जुर्माना: नई याचिका दायर करते समय याचिकाकर्ता को लंबित या निपट चुके मामलों की जानकारी अदालत को देनी होती है। यदि पूर्व आदेश छुपाकर दूसरी अदालत से राहत ली जाए, तो इसे "फोरम शॉपिंग" और "कंसीलमेंट ऑफ फैक्ट्स" माना जाता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायालय इस तरह के मामलों को गंभीरता से देखता है। इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। यह विरोधाभासी आदेशों की स्थिति पैदा कर सकता है।

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